: फोटो जर्नलिस्ट ने शुरू किया अपना व्यवसाय : जब कल लोग उन्हें खादी मेला में साड़ी का स्टाल लगाए देखा तो चौक गए. बीस साल तक लोगों को लगातार शूट करने वाले व्यक्ति का यह रूप देखकर चौंकना लाजिमी भी था. इतने समय तक बेहिचक आम जनता, नेता, अधिकारी, विधायक, सांसद, मंत्री तक को शूट करने वाले अनूप कुमार शील पिंटू का नया रंग उसके साथियों को ही आश्चर्यचकित कर रहा था. कभी लोगों पर फ्लैश चमकाने वाले पिंटू आज खुद उन्हीं फ्लैशों की जद में थे. थोड़े सकुचाए, थोड़े हिचकिचाते पर चेहरे पर गर्व के भाव से लबरेज. चोरों-चाटुकारों की नौकरी छोड़ने का सकून भी साफ झलक रहा था.
पर इन बीस सालों में बहुत कुछ खो जाने का दर्द भी छलक रहा था. यहां बात हो रही हैं फोटो पत्रकार अनूप कुमार शील पिंटू की. जिन्होंने बनारस की फोटो पत्रकारिता में अपने जीवन के बीस महत्वपूर्ण साल अखबारों के नाम कर दिया. अपने दर्द-गम-खुशी के बीच लोगों के दुख से लेकर उनके सुख-खुशी-हंसी-सपने-उत्साह को अपने कैमरे के भीतर कैद करने वाले पिंटू अब शायद फ्लैश नहीं चमकाएंगे. अखबारों में प्रकाशित होने वाली उनकी बोलती तस्वीरे साफ बताती थीं कि यह बंदा कितना कल्पनाशील है. इस पेशे में शायद कल्पना बहुत महत्व रखता है, तभी तो हम अपने विचारों को बेधड़क कलम या कैमरे से उकेर पाते हैं. पिंटू भी इतने ही कल्पनाशील थे, जितना की एक बेहतर पत्रकार हो सकता है. तभी तो उनको पिछले साल ही फोटोग्राफी के लिए सम्मानित किया गया था.
पर आश्चर्य कि पिछले साल ही श्रेष्ठ फोटो जर्नलिस्ट का पुरस्कार पाने वाले पिंटू को अपना काम ठीक से नहीं आता. जी हां, यही आरोप लगाकर तो पिंटू को उनके दो अन्य साथियों के साथ बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. पिंटू हिंदुस्तान, बनारस के फोटो जर्नलिस्ट थे. दस सालों से अखबार को सेवा दे रहे थे, पर इनके काम की समझ शायद पुराने प्रबंधकों-संपादकों को नहीं थी. नए संपादक-प्रबंधक अत्यन्त विद्वान हैं, जो इनके काम की कमी को ढूंढ लिया और बाहर का रास्ता देख लेने को कह दिया. ये नए लोग वहीं हैं जो किसी की पिछवाड़े लात मारकर भगाने को हमेशा तैयार रहते हैं. हर पल-हर घड़ी. ये इतने बड़े विद्वान हैं कि इनके अंदर की इंसानियत मर चुकी है. ये आज के चरम बाजारू विद्वान हैं. आपने इनके सामने सिर नहीं झुकाया तो कलम कराने के लिए तैयार रहिए चाहे काम खराब करने के बहाने, चाहे अनुशासनहीनता के बहाने, चाहे गलती हो जाने के बहाने.
जस्टिस काटजू ऐसे ही नहीं भड़क रहे हैं इस कथित मीडिया मैनेजरों की करनी पर. ऐसे ही नहीं उनकी नजर में ये पेशा निम्नतर है. कुछ मीडिया मैनेजरों को छोड़ दे तो पत्रकारिता की एक बड़ी आबादी, ऐसे ही रोज मर-खप रही है. इनकी हालत असंगठित क्षेत्र के मजदूरों से भी गई-बीती है. मजदूर भी कम से कम अपने तरीके से काम करते हैं, भले ही उनके पास लेबर कानून या अन्य कानून इस्तेमाल करने के अधिकार न हों, पर वे अपने शर्तों पर काम करते हैं. सुबह दस बजे काम शुरू करते हैं तो शाम को पांच बजे काम बंद. इसके बाद उन्हें न तो उनके मालिक रोक सकते हैं ना तो कोई और जब तक कि वे खुद न रुकना चाहें. पर पत्रकार, क्षमा करें स्ट्रिंगर ये असंगठित क्षेत्र के मजदूर नहीं बल्कि बंधुआ मजदूर होते हैं. प्रबंधन जब चाहे, जैसे चाहे, जितना समय चाहे, इनसे काम ले सकता है. ज्यादातर को तो एक दिन की छुट्टी भी नहीं मिलती है. और जब चाहा पिछवाड़े लात मारकर भगा दिया. कोई कानून नहीं, कोई न्याय नहीं. कहीं कोई सुनवाई नहीं.
पांच से दस हजार पाने वाला ये पत्रकार कानूनी पचड़े-लड़ाइयों में पड़ेगा या कि खाने-पीने-परिवार की जिम्मेदारी में आगे की सोचेगा. वैसे भी इस देश में 'समरथ का कोई दोष ही नहीं होता है'. इसमें एक बेरोजगार पत्रकार क्या उखाड़ सकता है. नरेंद्र बरहजी पढ़े-लिखे पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, वाराणसी के मठाधीशों को इनकी विद्वता रास नहीं आई, बाहर कर दिया. इन्होंने वकालत भी पढ़ रखी थी, सो लेबर कोर्ट में मुकदमा कर दिया. साल भर से ज्यादा हो गया अब तक इस मामले में कोई फैसला नहीं आया. तारीख पर तारीख… तारीख पर तारीख और बेचारे परेशान हैं. क्योंकि अखबारों के इन ताकतवर मैनेजरों ने अब सबकुछ मैनेज कर रखा है. योगेश गुप्त पप्पू एवं अजय मुखर्जी ने इन पत्रकारों की लड़ाई लड़ी तो जागरण ने अपने पूरे टीम को ही प्रेस क्लब से इस्तीफा दिलवा दिया. क्या करिएगा आप. अब या तो ज्यादातर पत्रकार नपुंसक हो गए हैं या फिर नौकरी कर रहे हैं. सिर्फ उनकी सोच अब अपने तक ही रह गई है.
ऐसे में इक्का-दुक्का पत्रकार अगर आवाज उठा रहे हैं तो उनकी आवाज नक्कार खाने की तूती ही साबित हो रही है. अनूप एवं उनके दो साथी भी कई साल की सेवा के बाद हटा दिए गए. इन लोगों ने भी आगे खड़ी मुश्किलों और परिवार को देखते हुए लड़ाई लड़ने की बजाय नए रास्ते तलाशने की कोशिशें शुरू कर दी. सौरभ बनर्जी एवं देवेंद्र सिंह अपने लिए नए रास्तों की तलाश कर रहे हैं, पत्रकारिता की उसी अंधेरी राहों पर, जहां पता नहीं कब, कहां ठोकर लग जाए. अनूप ने अपने लिए नए रास्ते तलाश लिए. उन्होंने अब पत्रकारिता की बाहर से भौकाली और अंदर से खाली दुनिया को बाय कर दिया. अब वे खुद का व्यवसाय करने की ठान चुके हैं. शुरुआत भी उन्होंने बनारस में लगे खादी मेले से कर दी है. अनूप शील ने 1992 में आज से अपने फोटो जर्नलिस्ट के करियर की शुरुआत की थी. 1999 तक यहीं रहे. 2000 में हिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया तब से वहीं थे. स्ट्रिंगर बनकर. यानी एक दिन नौकरी बीत गई तो सौभाग्य. खैर दस सालों बाद वह दिन भी आ गया जब उनका सौभाग्य काम नहीं किया और उन्हें यहां से विदाई लेनी पड़ी.
अनूप शील अब साड़ी के व्यवसाय में उतर गए हैं, पर उनके चेहरे पर बीस साल ऐसे ही खो जाने की कसक भी दिखती है. अनूप शील का इस नए काम के बारे में कहना है कि बीस सालों की नौकरी के बाद भी परिवार को ठीक से चला पाना संभव नहीं था. नौकरी में कोई स्थिरता नहीं थी. फिर कहीं नौकरी ढूंढता तो ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ता. सात-आठ हजार रुपये में गुजारा ठीक से करना मुश्किल था. हालांकि फोटो जर्नलिज्म मेरा पैशन भी था, पर जिस तरह की स्थितियां इस पेशे में हैं, उसमें केवल पैशन से काम नहीं चलता है. खाने के पैसा भी जरूरी है. काम आता है तब भी बिना चमचागिरी किए नौकरी नहीं बचनी है. अब सोचा कि फिर नौकरी करने से बढि़या है अपना कुछ काम किया जाए. बंगाली हूं. घर-परिवार तथा रिश्तेदारी में कई लोग बंगाली साड़ी का कारोबार करते हैं. उन लोगों से पूछा सलाह मशविरा किया तो लोग सहयोग करने को तैयार हो गए.
उन्होंने बताया कि इसके बाद शुरुआत की बात आई तो यहां-वहां से कुछ पैसा जुटाया. खादी मेला की तैयारियां चल रही थीं, इसी में स्टाल बुक करा लिया और आज से इस नए काम की शुरुआत कर दी. नया काम है. रिस्पांस भी थोड़ा बहुत मिल रहा है. लोग आ रहे हैं पूछ रहे हैं. एक नया अनुभव मिल रहा है. अब सोच रहा हूं कि बीस साल पहले यह काम शुरू किया होता तो आज से ज्यादा अच्छी स्थिति में होता. मैं सात-आठ हजार पगार वाले तीन चार सहयोग रख चुका होता. जीवन स्तर बढि़या होता. इसके बावजूद पत्रकारिता का रोमांच अलग है. पर जरूरत और पत्रकारिता पेश्ो की दिक्कतों के बीच नया काम अच्छा लग रहा है. उम्मीद है कि अब चीजें ठीक हो जाएंगी.






