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अमर उजाला, जम्‍मू : राजनीति से तंग होकर कई लोग दे चुके हैं इस्‍तीफा

 

अमर उजाला, जम्‍मू में राजनीति का जोर चल रहा है। रवेन्‍द्र श्रीवास्तव के आने के बाद कार्यालय में दो गुट बन गए। आज तक इस कार्यालय में कभी राजनीति हाबी नहीं हुई थी। लेकिन अब तो जोर से चल रही है। कार्यालय में दो गुट बन गए है। जो एक दूसरे की टांगों को खींच रहे है। इससे सबसे ज्यादा नुकसान संस्थान को हो रहा है। क्योंकि अनुभवी लोग संस्थान को छोड़ कर जा रहे है। पिछले तीन सालों में एक दर्जन से अधिक लोग संस्थान को छोड़ चुके है। यह सभी लोग पुराने ओर अनुभवी है। आने वाले दिनों में एक डीएनई भी जाने वाले है। क्योंकि उन्हें भी तंग किया जा रहा है। खबर है कि वह किसी स्थानीय अखबार में संपादक के तौर पर ज्वाइन करने वाले हैं।

 

अमर उजाला, जम्‍मू में राजनीति का जोर चल रहा है। रवेन्‍द्र श्रीवास्तव के आने के बाद कार्यालय में दो गुट बन गए। आज तक इस कार्यालय में कभी राजनीति हाबी नहीं हुई थी। लेकिन अब तो जोर से चल रही है। कार्यालय में दो गुट बन गए है। जो एक दूसरे की टांगों को खींच रहे है। इससे सबसे ज्यादा नुकसान संस्थान को हो रहा है। क्योंकि अनुभवी लोग संस्थान को छोड़ कर जा रहे है। पिछले तीन सालों में एक दर्जन से अधिक लोग संस्थान को छोड़ चुके है। यह सभी लोग पुराने ओर अनुभवी है। आने वाले दिनों में एक डीएनई भी जाने वाले है। क्योंकि उन्हें भी तंग किया जा रहा है। खबर है कि वह किसी स्थानीय अखबार में संपादक के तौर पर ज्वाइन करने वाले हैं।
 
इसकी शुरुआत गोविंद चौहान से हुई। उन्‍हें राजनीति का शिकार बनाकर भेजा गया। वह अकेले क्राइम जैसी बड़ी बीट पर काम करते थे। उनके बाद चार लोगों को संस्थान ने क्राइम बीट पर लगाया। उन्हें बाहर भेजने में भरपूर राजनीति की गई। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वह कार्यालय के दूसरे गुट के साथ थे। इसके लिए उन्होंने प्रबंधन से बात भी की थी। जिसके बद उन्हें चंडीगढ़ में तबादला करके भेजा गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने दैनिक भास्कर जम्‍मू में सीनियर रिपोर्ट के रुप में ज्वाइन कर लिया।
 
उनके अलावा संजय पाठक जो कि संस्थान में शुरु से जुड़े हुए थे। लाचिंग के समय से संस्थान में नौकरी कर रहे थे। राजनीति के चलते उनका तबादला किया गया। श्रीवास्तव का मकसद उन्हें किसी तरह बाहर का रास्ता दिखाना था। तबादला होने के बाद पाठक ने नई जगह पर ज्वाइन नहीं किया। उन्होंने संस्थान को छोड़ कर एक स्थानीय अंग्रेजी समाचार पत्र में ब्यूरो चीफ पद पर ज्वाइन कर लिया। उन्होंने भी इस राजनीति की शिकायत प्रबंधन से की थी। बताया जा रहा है कि उन्होंने इसके लिए कोर्ट में भी अर्जी दी है।
 
योगेश शर्मा जो कि डीएनई थे। उन्हें भी तंग किया जाता था। उन्हें बिना किसी कारण गलत जगहों पर लगाया जाता था। क्योंकि संपादक का मकसद सिर्फ उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना था। उन्होंने भी राजनीति से तंग आकर पिछले साल लुधियाना में भास्कर को ज्वाइन कर लिया। अपने साथ वह डेस्क के भवेश मिश्रा को भी ले गए। दोनों की तंग होकर गए थे। उसके बाद हीरानगर के रिपोर्टर गोपाल शर्मा ने संस्थान को छोड़ा। उसके पीछे कारण भी यही था कि उन्हें तंग किया जा रहा था। उन्‍होंने संस्थान के प्रबंधन को पत्र लिखा और संस्थान को छोड़ दिया था।
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