बनारस की मीडिया में जबदस्त हलचल है. तीन प्रमुख अखबारों के संपादकों के बदल जाने से उनके चेले-चपाटी-शिष्य सहमे हुए हैं. कि अब उनका क्या होगा? कैसे उनकी नैया पार लगेगी. बनारस में भी इसको चटखारा लेकर कहा-सुना जा रहा है. अमर उजाला में तो बदलाव एक परिपाटी थी, पर दैनिक जागरण और राष्ट्रीय सहारा में संपादकों के चेलों ने मान रखा था कि यह अटल और शाश्वत सत्य है कि कुर्सी उन लोगों के आका के पास ही रहेगी. इसलिए ये लोग अपने आकाओं को प्रसाद चढ़ाकर या नाना प्रकाश से खुश रखकर ही अपनी नौकरी पक्की समझते थे. परन्तु समय के कुटिल चक्र ने इन लोगों पर मुश्किलों का पहाड़ ढा दिया है.
बनारस के जिन तीन अखबारों के संपादक बदले गए हैं वे हैं दैनिक जागरण, अमर उजाला और राष्ट्रीय सहारा. दैनिक जागरण के संपादकीय प्रभारी राघवेंद्र चड्ढा को उनके भाई की करतूत की वजह से काशी से गंगा किनारे ही स्थिति दूसरे शहर जाना पड़ा. प्रबंधन ने उन्हें कानपुर भेज दिया. उनकी जगह लखनऊ से तेज तर्रार पत्रकार आशुतोष शुक्ल को बनारस भेजा गया है. अमर उजाला के संपादक डा. तीर विजय सिंह का तबादला रूटीन के तहत किया गया, फिलहाल गाजियाबाद से युवा पत्रकार कुमार अभिमन्यु को बनारस भेजा जा रहा है. पर राष्ट्रीय सहारा में तो अपनों पर स्नेह दिखाना ही संपादक स्नेह रंजन के लिए भारी पड़ गया. पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के लिए अखबार में गाली छपने के बाद प्रबंधन ने अपना स्नेह छीन लिया और इनको बेसहारा छोड़ दिया.
खैर, यह तो रही बदलाव की बात. अब बात मुद्दे की. दैनिक जागरण में संपादकीय प्रभारी की हुकूमत चलती थी. इस हुकूमत में कई चेले-चपाटी जन्में. कई गुलाम-जोकर-बेगम भी पैदा हुईं. बदलाव जहां दुनिया का शाश्वत सत्य है वहीं इन चेले-चपाटियों ने मान लिया था कि इस कुर्सी का अटल रहना शाश्वत सत्य है क्योंकि धृतराष्ट्र के जमाने में सब कुछ अपना है. इस हुकूमत में पत्रकार कम जमीन-जायदाद बेचने खरीदने वाले बंधु ज्यादा पनपे. इन बंधुओं नीचे से लेकर ऊपर तक सबको खुश रखा. ''खबर भले छूट जाए पर खरीद-बिक्री किसी कीमत पर नहीं छूटनी चाहिए'' काम करने वाले बंधु अखबार से ज्यादा प्रभारी जी के लिए लॉयल रहे. जब उपर से बदरहस्त मिला तो जमीन के साथ अखबार को भी बेचने लगे. अच्छी तरक्की हुई. बढि़या कमाई हुई. अब इस तरह के चेले चपाटी परेशान हैं. सहमें हैं. कि खबर तो कभी लिखी नहीं, जमीन-जायदाद बेचा, अखबार बेचा. अब खबर लिखेंगे तो कैसे?
इतना ही नहीं कीचड़ से भी मोती चुनने वाली इस हुकूमत में आरटीओ विभाग से आउटसाइडर के रूप में फाइलों को निकालने वाले लोग भी जागरण के पत्रकार बन गए. खबरें लिखीं कम बेचा ज्यादा. शून्य से शुरू किया और करोड़पति बन गए. यह सब चमत्कार कैसे हुआ ये तो भगवान जाने पर इन्होंने शाश्वत सत्य को मानते हुए सभी को खुश रखा. कि भगवान प्रसन्न तो सब कुशल मंगल. पर समय के फेर ने ऐसे लोगों को भी परेशान कर दिया है. अखबार के कुछ जिलों के ''जिलाधिकारी'' भी परेशान हैं कि सत्ता में तो उन लोगों के मौज थे. अब कहीं सत्ता बदलाव के बाद उन लोगों को भी वेटिंग में ना शामिल कर लिया जाए. वाराणसी यूनिट में ''साधो'' भी परेशान हैं. हुकूमत के सबसे खास या कह सकते हैं कि नाक के बाल थे. अब इन्हें भी उखड़ने का दर्द होने की संभावना जताई जा रही है, तब से ही बेचारे परेशान हैं. जुगाड़ लगा रहे हैं. पर पुराना रिकार्ड मुसीबत बना हुआ है.
इनके अलावा भी ''शाश्वत सत्य'' में विश्वास रखने वाला कुछ चिन्हित लड़ाके सहमे हुए हैं. कि जाने किस घड़ी वक्त का मिजाज बदल जाए. नए संपादकीय प्रभारी के तेवर के बारे में सुनकर ही इन लोगों के होश उड़े हुए हैं. हां, इस बदलाव से अगर कोई खुश नजर आ रहा है तो वह विपक्षी खेमा. हुकूमत के दौरान अलग-थलग पड़ा रहा यह खेमा खुश है. प्रसन्न है. मुरझा चुके चेहरों पर रौनक लौट आई है. इन्हें भी बदलाव के बादल उमड़ते-घुमड़ते दिखने लगे हैं. गांडीव रख चुका विपक्षी खेमा अपने तीर-कमान सही करने में जुट गए हैं. हालांकि लखनऊ के कुछ साथी बताते हैं कि तेजतर्रार आशुतोष शुक्ल जाते ही लाठी नहीं भाजेंगे. वो समझेंगे-बूझेंगे तब जाकर निशाना लगाएंगे. हालांकि इस बदलाव से उस तबके पर कोई फर्क नहीं पड़ा है जो इनका-उनका में नहीं बल्कि सत्ता के साथ चिपके रहने में विश्वास करता है. उसे पता है कि निशाना कैसे लगता है. ऐसे सभी निश्चिंत हैं.
अब बात अमर उजाला की. डा. तीर विजय सिंह का बदलाव तो रूटीन का तबादला है. पर इनके राज में भी अपने-परायों की खूब बोलबाला था. यहां जागरण जितना तो नहीं, पर नियमानुसार जितनी इज्जत से कमाई हो सकती थी, सभी चहेतों ने की. अमर उजाला में एक रिपोर्टर पर जमीन के मामले को छोड़कर किसी पर बड़े आरोप तो नहीं लगे पर रंगीन मिजाजी की चर्चाएं खूब उड़ी. संपादक के खास थे तो बच गए. खैर, इस खेल में तो एक पूर्व संपादक भी बनारस में काफी सुर्खियां बटोर चुके हैं. बनारस का बच्चा-बच्चा उस कहानी को जानता है. तो जागरण की तरह यहां पूरी तरह अंधेरगर्मी नहीं थी, पर सत्ता से जो टकराया उसे जाना पड़ा. जाते-जाते संपादक जी अपने लोगों को सेट करते गए. कई ऐसे लोगों को भी अमर उजाला का ''जिलाधिकारी'' बना डाला जो जुम्मा-जुम्मा साल-डेढ़ साल से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. जाने से पहले अपने लोगों को सही डेस्कों पर भी बैठा गए. ताकि नए संपादक को तत्काल कुछ करने को बचे ही ना. बहरहाल, नए संपादक भी तेजतर्रार माने जाते हैं. इनोवेटिव हैं. तो माना जा रहा है कि वो भी इन तीरों का जवाब अपने तरीके से दे ही देंगे. इसी को लेकर पुराने संपादक के खास परेशान हैं और बहुत ही परेशान हैं. यहां भी विपक्षी खेमा खुश है, जैसा हर जगह होता है.
अब बात राष्ट्रीय सहारा की. यहां तो नए संपादक के आने के बाद से लोगों पर स्नेह बरसना ही कम हो गया है. साथियों पर जरूरत से ज्यादा स्नेह पहले वाले संपादक को महंगा पड़ गया. अखबार में किसी साथी ने बहनजी के लिए गाली लिख दी. प्रबंधन ने स्नेह दिखाते हुए तड़ाक से बलि ले ली. वैसे इनको माला-फूल तो पहले से ही पहनाए जाने की तैयारी चल रही थी, पर उचित मुहूर्त नहीं मिलने से बलि का दिन तय नहीं हो पा रहा था. किसी साथी ने मुहूर्त उपलब्ध कराई और प्रबंधन ने बिना मौका चुके बाहर का रास्ता दिखा दिया. यहां भी कई साथी मान रहे थे कि यह कुर्सी बदलाव के शाश्वत नियम के विपरित है. अब अपने खास साथियों पर स्नेह उड़ेल के बेसहारा क्या हुए इनके साथी तो जैसे राष्ट्रीय बेसहारा हो गए. काम किया नहीं था. तो परेशानी तो आनी ही थी. जिन्होंने मजा लिया था अब उन्हें यह नौकरी सजा लग रही है. बताया जा रहा है कि नए संपादक मनोज तोमर काम को लेकर इतने सजग हैं कि हर टेबल पर पहुंच रहे हैं. सबकी क्लास लग रही है. अब जिन्हें काम करना नहीं आता, वो बेचारे परेशान हैं.
इस अखबार में तो शुरू से ही भाई-भतीजावाद हावी था. भाई थे तो काम नहीं करेंगे. भतीजा हैं तो बस दाम लेंगे. बाकी काम करने वाले तो थे. अब कहा जा रहा है कि इसी भाई-भतीजावाद से परेशान किसी दूसरे भाई ने बहनजी को गरिया दिया. उसने छोड़ा आग्नेय अस्त्र था. निशाने पर कोई और था. पर कोई तकनीक अचानक इंप्रूव हो गई और यह ब्रह्मास्त्र बन गया. शिकार संपादक और दूसरे लोग हो गए. इस बदलाव से भाई-भतीजा तो दुखी थे, पर जो खुश थे, उनकी भी खुशी जा चुकी है. उस जमाने में काम का दबाव भले ही पहले भी था, जैसे तैसे काम कर ही लेते थे. पर अब तो नए संपादक ने पूंगी बजा दी है. कोई अपना- कोई पराया नहीं. सभी टेबल पर पहुंच जा रहे हैं. सबको टाइट कर रहे हैं. कॉपी-पन्ना भी देख रहे हैं. जहां गलती दिखी नहीं कि क्लास भी ले रहे हैं. हालांकि भाई लोग को संपादक की यह तेजी पच नहीं रही है. वो कह रहे हैं – संपादकजी इसलिए तेजी दिखा रहे हैं और कॉपी देख रहे हैं कि ससुरा कवनो अखिलेश को ना गरिया दे. खैर.
बनारस के इन तीनों अखबारों में सत्ता से नजदीकी रखने वाले अपनी-अपनी किस्मत को लेकर आश्वास्त नहीं है. जितनी मुंह उतनी बातें. नए लोगों के आने के बाद तो बदलाव होंगे हीं, चाहे आज हो चाहे कुछ समय बाद हो. वैसे भी बदलाव के सबसे ज्यादा चांस जागरण में दिख रहा है, जहां नियमानुसार तीन साल एक ही जगह पर टिकना मना हो गया है. अब देखना है कि नए संपादक पुराने सत्ता के खास रहे लोगों से कैसे निपटते हैं, क्योंकि ये पुरनिया अपने आकाओं के लिए नई सत्ता के सामने चुनौती तो बनेंगे ही बनेंगे. बहरहाल, चरण चांपने वाले किसी भी मुश्किल में अपना रास्ता बना ही लेते हैं. वे किसी राजा के नहीं बल्कि सत्ता के गुलाम होते हैं. इन संस्थानों में भी ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है.
भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह की रिपोर्ट.





