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हे पत्रकारों-संपादकों! नमाज़ अता नहीं की जाती

इसे पत्रकारों, सम्पादकों की लापरवाही कहा जाए, भूल कहा जाए या जानबूझ कर की जा रही शरारत कहा जाए कि कुछ हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू शब्दों का लगातार गलत प्रयोग किया जा रहा है और हद यह है कि बार बार ध्‍यान दिलाए जाने पर भी इस में सुधार नहीं किया जा रहा है। ऐसा एक मामला नमाज के बारे में है, जब भी कभी ईद, बकरीद, जुमा अलविदा या किसी की नमाज़े जनाज़ा के बारे में खबर दी जाती है तो अधिकांश हिंदी के बड़े अखबार नमाज़ अदा करने के स्थान पर, ‘नमाज़ अता करना’ लिखते हैं।

इसे पत्रकारों, सम्पादकों की लापरवाही कहा जाए, भूल कहा जाए या जानबूझ कर की जा रही शरारत कहा जाए कि कुछ हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू शब्दों का लगातार गलत प्रयोग किया जा रहा है और हद यह है कि बार बार ध्‍यान दिलाए जाने पर भी इस में सुधार नहीं किया जा रहा है। ऐसा एक मामला नमाज के बारे में है, जब भी कभी ईद, बकरीद, जुमा अलविदा या किसी की नमाज़े जनाज़ा के बारे में खबर दी जाती है तो अधिकांश हिंदी के बड़े अखबार नमाज़ अदा करने के स्थान पर, ‘नमाज़ अता करना’ लिखते हैं।

नमाज़ इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है, जो हर मुसलमान पर फर्ज़ है जिसे अदा करना हर मुसलमान के लिए अनिवार्य है। आज से नहीं बल्कि बरसों से अखबार नमाज़ अता कराने की गलती करते आ रहे हैं। अपने को एनसीआर का बड़ा खबार कहने वाला नवभारत टाइम्स पहले नमाज़ अदा की ही लिखता था, मगर अब काफी समय से वह भी नमाज़ अता करना लिख रहा है। अमर उजाला भी नमाज अता कराता था, जब गोविंद सिंह एनसीआर के सम्पादक थे तो उनका ध्‍यान इस ओर दिलाया गया तो कुछ समय के लिए ठीक लिखा जाने लगा, मगर उनके जाते ही फिर नमाज़ अता की जाने लगी और ध्‍यान दिलाने के बाद भी इस गलती को नहीं सुधारा गया। दैनिक जागरण ने तो तय ही कर रखा है कि वह बार-बार ध्यान दिलाने के बाद भी गलती का सुधार नहीं करेगा और नमाज़ अता ही कराता रहेगा।

उर्दू का एक और शब्द 'खि़लाफ़त' है जिस का हिंदी वाले विरोध के लिए प्रयोग करते हैं। खिलाफत का सम्बंध खलीफा की परंपरा से है न कि विरोध से। आजादी की लड़ाई के दौरान खिलाफत आंदोलन इतिहास में दर्ज है, जिस में गांधी जी ने भी सक्रिय भागीदारी की थी। विरोध के लिए खिलाफ शब्द का प्रयोग तो ठीक है मगर खिलाफत किसी भी दशा में उचित नहीं है, क्योंकि खिलाफत लिखने से अर्थ का अनर्थ हो जाता है। असल में हम ने खिलाफ के आधार पर खिलाफत शब्द बना लिया है जबकि इस के लिए उर्दू में मुखालिफत है जो कठिन शब्द है इसलिए अच्छा यही है कि विरोध के लिए खिलाफत शब्द का प्रयोग ही न किया जाए।

नवभारत टाइम्स सरल हिंदी शब्दों के लिए भी अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करता है, मगर सरल अंग्रेजी शब्दों का उसे सही पता शायद नहीं है। सीवर का मैन होल होता है मगर नवभारत टाइम्स सहित लगभग सभी हिंदी अखबार इसे मेनहोल लिखते आ रहे हैं, कई बार मेनहाल भी लिख दिया जाता है। अखबार ही नहीं अब तो खबरिया चैनलों के कई नासमझ पत्रकार भी मेन होल कहने लगे हैं। पिछले दिनों गाजियाबाद में एक बच्चा सीवर के मैनहोल में गिर गया। न्यूज रूम में बैठी एंकर बार-बार मैनहोल कह रही थी मगर मौके पर मौजूद संवाददाता ने एंकर के उच्चारण पर भी ध्‍यान नहीं दिया और अंत तक मेनहोल ही बोलता रहा, ऐसा उस ने एक बार ही नहीं बल्कि चार-पांच बार किया था।

युगल और जोड़ा पर्यायवाची शब्द हैं, मगर हमारे कुछ मित्र खबर लिखते समय प्रेमी युगल जोड़ा ही लिखते आ रहे हैं। एक संवाददाता का ध्‍यान जब इस ओर दिलाया गया तो उसका कहना था कि क्या करें युगल जोड़ा लिखने की आदत पड़ गई है, अब इस आदत को ठीक तो नहीं कहा जा सकता। अपने एक मित्र जमीन पर गिरने और धराशायी होने में अंतर न मान कर खबर में लिखते हैं कि पुलिस द्वारा पानी की बौछार छोड़ने पर नेता जी जमीन पर गिर कर धराशायी हो गए। औरत उर्दू का शब्द है और इस का बहुवचन मस्तूरात होता है मगर हम हिंदी वाले प्रायः औरतें लिखते हैं जो अनुचित है। अच्छा यही है कि हम औरत न लिख कर महिला लिखें और अगर हिंग्रेजी से ही प्रेम है तो लेडी भी लिखा जा सकता है।

मुझे याद है नवभारत टाइम्स में जब माथुर जी संपादक थे तो वह इस प्रकार की तथा वर्तनी की अन्य अशुद्धियों पर बहुत ध्‍यान देते थे तथा इन अशुद्धियों का शुद्ध रूप लिख कर नोटिस बोर्ड पर लगा देते थे। माथुर साहब के इस प्रयास का परिणाम यह हुआ था कि अखबार में हिंदी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग शुद्ध रूप में होने लगा था, मगर उन के बाद किसी संपादक ने इस पर ध्‍यान नहीं दिया। अन्य अखबारों में तो यह परंपरा विकसित ही नहीं हो सकी और अब हिंग्रेजी का मोह इतना हो गया है कि ये बातें बहुत छोटी नजर आने लगी हैं।

कई पत्रकार मित्रों से इस बारे में पूछा गया तो सब का यही कहना था कि ये तो छोटी-मोटी ‘स्पैलिंग मिस्टेक’ हैं अब इन पर अखबार में कोई ध्यान नही नही देता। अब पाठक काफी समझदार हो गए हैं वह समझ जाते हैं कि हम क्या कह रहे हैं। बात तो किसी हद तक ठीक है मगर पाठक के समझदार होने का मतलब यह तो नहीं कि हम नासमझ हो जाएं और अपनी नासमझी के चलते नमाज को अता कराते रहें, मैनहोल को मेनहोल या मेनहाल लिखते रहें, औरतें लिखते रहें और प्रमी युगल को युगल जोड़ा लिखते रहें। पाठक समझदार है वह बात समझ जाता है मगर इस के साथ ही पाठक यह भी तो समझ जाता है कि गलती करने वाला पत्रकार कितना लापरवाह या मूर्ख है।

लेखक डा. महर उद्दीन खां वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा कई संस्‍थानों में उच्‍च पदों पर रह चुके हैं.  उनसे संपर्क उनके मोबाइल नम्‍बर 09312076949 या ई मेल [email protected]  के जरिए किया जा सकता है.

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