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जनसंदेश टाइम्‍स के नकारे अब ‘लोकपाल’ का शिकार करने के लिए घात लगाए हैं

आदरणीय यशवंतजी, जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर में जो कुछ हो रहा है वह काफी दुखदायी है. हालत यह है कि चाटुकार किस्म के लोगों को तो बख्‍श दिया गया है और काम करने वाले जूनियर लोगों को निकला जा रहा है. उनकी छंटनी की जा रही है. शैलेन्द्र मणि शायद यह नहीं समझ पा रहे कि चाटुकारिता से अखबार नहीं चलता. अब ये सारे नकारे नए अखबार को अपना शिकार बनाने के लिए घात लगाये बैठे हैं.

आदरणीय यशवंतजी, जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर में जो कुछ हो रहा है वह काफी दुखदायी है. हालत यह है कि चाटुकार किस्म के लोगों को तो बख्‍श दिया गया है और काम करने वाले जूनियर लोगों को निकला जा रहा है. उनकी छंटनी की जा रही है. शैलेन्द्र मणि शायद यह नहीं समझ पा रहे कि चाटुकारिता से अखबार नहीं चलता. अब ये सारे नकारे नए अखबार को अपना शिकार बनाने के लिए घात लगाये बैठे हैं.

वर्तमान में जनसंदेश टाइम्‍स में दो लोग ऐसे हैं जिनका धंधा पानी कहीं और है और वे जन सन्देश में भी काम करके वेतन उठा रहे हैं. इनमे से तो एक स्वयंभू विदेश मामलों के जानकार हैं और दूसरे स्टार न्यूज़ के स्ट्रिंगर. आश्चर्य है कि शैलेन्द्र मणि और जनसंदेश प्रबंधन ने ऐसे लोगों को बाहर क्यूँ नहीं निकाला. कम से कम जो ईमानदारी से काम कर रहा था उसकी तो नौकरी बच जाती. यहाँ पर एक और महिला पत्रकार हैं जो पहले जागरण के बच्चा अखबार में थीं और उसे छोड़ने के बाद भी उस अखबार का नाम भुना कर इवेंट मैनेजमेंट का काम करती थीं. इनका यह काम अब जनसंदेश के बैनर तले चल रहा है. इस काम में इनको जनसंदेश टाइम्‍स के कुछ वरिष्ठ और ठरकी किस्म के पत्रकारों का वरदहस्त प्राप्त है.

अंदरखाने से खबर मिल रही है कि यहाँ का स्टाफ और आदरणीय शैलेन्द्र मणि गोरखपुर के व्यवसायी जालान, जो कि हिंदुस्तान के फ्रेंचाइजी हैं, उनके नए अखबार का इंतज़ार कर रहे हैं (संभवतः जिसका नाम लोकपाल है). जनसंदेश टाइम्‍स के नकारे अब शायद नए अखबार का बंटाधार करेंगे. जन्संदेश में हालत यह हैं कि इंटीरियर डेकोरेशन का बिल जो कि १५ लाख रुपये आया था, उसका अभी तक भुगतान नहीं हुआ है. सैलरी बचाने के नाम पत्रकारों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. जागरण में अपने सेवाएँ दे चुके सेवानिवृत्त पत्रकारों को जनसन्देश में लाया गया और फिर उन्हें जलील करके निकाल दिया गया, यह है शैलेन्द्र मणि का असली चेहरा और उनके चाटुकारों के फ़ौज की कारस्तानी.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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