निर्मल बाबा ने जो अब तक किया इसके लिए वो अपनी गति को प्राप्त होंगे… लेकिन दहाड़े मार-मारकर विधवा विलाप करने वाले ये न्यूज़ चैनल या उनके मालिकान, जो मोटी रकम लेकर उनके समागम को विज्ञापन के रूप में चला रहे हैं… वो कहाँ तक जायज है? ..अगर बाबा पैसे पैसे कमा रहा है तो आप क्या कर रहे हैं, विज्ञापन की आड़ में आपको सिर्फ पैसो से मतलब है… दिखाया क्या जा रहा है इस से कोई वास्ता नहीं आपका?
दुनिया एक बड़े बाजार के रूप में तब्दील हो चुकी है… यहाँ कुछ बचा है तो सिर्फ बाजार… ना इंसान ना आत्मा… ना संवेदना… और ना ही सच और झूठ को परखने की ताकत… इन न्यूज़ चैनल में वर्तमान समय में ज्यादातर सम्पादक रीढ़विहीन हैं… जो अपनी मोटी रकम के साथ खुश हैं… टीआरपी बढती रहे कमाई होती रहे, मालिकान खुश रहें बस इनकी कुर्सी सलामत रहेगी… जनता को परोसने के नाम पर ये कुछ भी परोस देंगे… फिर बोलेंगे कि लोग खा रहे हैं तो हम परोस रहे हैं… ऐसा क्यों नही सोचते कि आप परोस रहे हैं इसलिए लोग खाने को मजबूर हैं… वैसे भी अब आपके न्यूज़ चैनल में न्यूज़ कहाँ मिलती है उसे तो दर्शकों को रिमोट के जरिये खोजना पड़ता है कि शायद किसी चैनल पर न्यूज़ आ रही हो… आप अपने में झांकिए आप क्या दिखाते हैं न्यूज़ के नाम पर… क्या आप भूत प्रेत और जाने क्या-क्या… क्या तब आपको अपनी जिम्मेदारी का भान नहीं होता है? …आप किस मुंह से बाबा को गलत ठहराने में जुटे हैं?
चलिए निर्मल बाबा को छोडिये… क्या आपके चैनल पर आने वाले एक निर्मल बाबा ही इस तरह के व्यक्ति हैं? …तो फिर वो जो लाल किताब वाले सफ़ेद शूट में स्क्रीन पर दिखते हैं वो कौन हैं.. ऐसे जाने कितने तथाकथित भद्र लोगों को आपने अपने चैनल पर पाल रखा है… इन्हें भी अगर छोड़ दें तो आप गंडा, ताबीज और यंत्र जो बेचवा रहे हैं वो क्या है? …क्या वो आपका भला काम है? ..अगर अंग्रेजों ने दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति के जरिये हमें मानसिक गुलामी देने का काम किया है तो आज आप क्या कर रहे हैं? …कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आपकी आत्मा भी बाजार में बिक चुकी है …आपको कुछ दिखाई नही देता सिवाय अपने मालिक.. (जिनके पास आप दुधारू गाय के रूप में गिरवी हैं)..टीआरपी और बाजार के सिवा… आप अपने को देश का जिम्मेदार नागरिक मानते हैं? और देशवासियों को अंधविश्वास और ताबीज.. यंत्रों में फंसा रहे है… अगर देश के नेता हमारे देश कि प्रगति में बाधक हैं तो आप भी कम जिम्मेदार नहीं… आप पर जागते रहने कि जिम्मेदारी है..और जगाने की भी पर आप तो खुद ही अपने मालिकान की गोद में सो रहे हैं… मीडिया की ताक़त को दुरूपयोग होने से बचाइये… खुद भी जागिये और लोगों को जगाइए देश को विकासशील नहीं विकसित बनाइए… हो सके तो कुछ शर्म भी करिए… अगर आ जाय तो!
लेखकर दिनकर श्रीवास्तव पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.





