Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

आजम साहब, ये जम्‍हूरियत ही है कि इस बयान के बाद भी आप आजाद हैं

: मुसलमानों का रहनुमा बनने की गला काट प्रतियोगिता चल निकली है : सपा-ए-आजम, आजम खां साहब का 17 अप्रैल को अखबारों में प्रकाशित यह बयान बेहद तकलीफदेह लगा कि ‘‘अगर कोई जम्हूरियत और कानून का मुल्क होता तो पूर्व राज्यपाल टीवी  राजेश्‍वर को दिल्ली के लाल किले पर ले जाकर झंडा फहराने वाली जगह पर फांसी दे दी जाती।’’ मैंने उनको विधान-सभा में बहुत उम्दा किस्म की तकरीर करते हुए सुना है और जाती तौर पर उनसे मुलाकात करके मैंने इसके लिए उनको मुबारकबाद भी दी है, लेकिन उनकी तंगनजरी और सियासत की बिसात पर कुछ भी दांव पर लगा देने की जेहनियत से नावाकिफ था। अफसोस सद अफसोस।

: मुसलमानों का रहनुमा बनने की गला काट प्रतियोगिता चल निकली है : सपा-ए-आजम, आजम खां साहब का 17 अप्रैल को अखबारों में प्रकाशित यह बयान बेहद तकलीफदेह लगा कि ‘‘अगर कोई जम्हूरियत और कानून का मुल्क होता तो पूर्व राज्यपाल टीवी  राजेश्‍वर को दिल्ली के लाल किले पर ले जाकर झंडा फहराने वाली जगह पर फांसी दे दी जाती।’’ मैंने उनको विधान-सभा में बहुत उम्दा किस्म की तकरीर करते हुए सुना है और जाती तौर पर उनसे मुलाकात करके मैंने इसके लिए उनको मुबारकबाद भी दी है, लेकिन उनकी तंगनजरी और सियासत की बिसात पर कुछ भी दांव पर लगा देने की जेहनियत से नावाकिफ था। अफसोस सद अफसोस।

अपने बयान से गोया वह यह कहना चाहते हैं कि इस मुल्क में जम्हूरियत नहीं है और यहां कानून का राज नहीं है। मोहतरम आजम साहब भी जरूर जानते होंगे कि यह देश जिसमें वह निवास करते हैं, विश्व का सबसे बड़ा और सबसे मजबूत लोकतांत्रिक देश है इस बात को कहने के लिए दूसरी बार सोचने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। जहां तक कानून के शासन की बात है तो उसको लागू करने की जिम्मेदारी उन जैसे नेताओं और उनके अधीन काम करने वाली नौकरशाही पर निर्भर है कि वह किस तरह से सोचते हैं। उनकी निगाह में क्या चीज सबसे ऊपर है- खून से सींची गई एक महान देश की कदरें या उनकी फौरी तौर पर मुनाफा देने वाली राजनीति। इस देश के संविधान ने सभी नागरिकों को बहुत अधिकार दे रखे हैं। हम अपने अधिकारों के प्रति तो बहुत सचेत हैं लेकिन हमारे कुछ कर्तव्य भी हैं, हम जानते तक नहीं। हमें अगर चीजों को बरतने का शऊर नहीं है तो यह हमारी कमजर्फी और कमनसीबी है, चीज का इसमें कोई दोष नहीं है। जम्हूरियत की सबसे बड़ी अलामत है-चुनाव। जनता के हाथों में यह अधिकार कि वह सत्ता किसको सौंपना चाहती है कोई मामूली अधिकार नहीं है। इस एक अधिकार को पाने के लिए विश्व के कितने देश के नागरिक छटपटा रहे हैं और कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। 

मोहतरम आजम साहब जौहर विश्वविद्यालय के आजीवन कुलपति बनाए जाने वाले थे। राजनीतिक कारणों से या किन्हीं वैधानिक दिक्कतों के कारण अगर विश्वविद्यालय से संबन्धित विधेयक पास नहीं किया गया तो उनके हिसाब से देश में जम्हूरियत नहीं है। वहीं विधेयक अगर पारित हो गया होता तो देश में जम्हूरियत हो जाती। वाह! ये ‘तीखे तेवर’ दिखाते समय वह भूल गए कि यह जम्हूरियत की ही सौगात है कि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के राज्य में सर्वोच्च पदस्थापित व्यक्ति की गरिमा को पैरों तले रौंदने के बावजूद वह आजादी की सांस ले रहे हैं। कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है, पड़ोसी मुल्क में कोई ऐसा बयान देकर देखे कि क्या होता है? यह जम्हूरियत ही है जो अन्ना हजारे के आन्दोलन को संभव होने देता है और उस एक व्यक्ति के पीछे चल रहे जन सैलाब की शक्ति को पहचानता और उसकी परवाह करता है।

म्यामांर में आन सू की नामक जो फूल खिला है हम जरा उसकी तरफ देखें तो पाएंगे कि बहुमत पाने के बावजूद जम्हूरियत से महरूम रखे जाने की पीड़ा क्या होती है और उसको पाने के लिए किए जाने वाले संघर्ष का जज्बा कैसा होना चाहिए। चीन के थियान मन चौक को भला कोई भी हस्सास शख्स कैसे भूल सकता है जहां नागरिक अधिकारों को पाने के लिए सीने पर  गोलियां खाने वाले अपने खून से धरती पर इतिहास लिख रहे थे और उन्हें उनके  सीनों से ही निकाल कर यह खून मुहैय्या करा रहे थे जम्हूरियत के दुश्मन। यह जम्हूरियत ही है कि आजम साहब ने ऐसा बयान दिया और लगभग सभी अखबारों ने उसे उनकी फोटो सहित प्रमुखता से छापा। जहां जम्हूरियत नहीं है वहां खुदा न करे आजम साहब को कभी रहना पड़े। न सिर्फ हम उन चीजों की कद्र करना नहीं सीख पाए जो हमें मिली हुई हैं, हम अपने आसपास से भी कुछ सबक नहीं लेना चाहते। 

बात दरअस्ल और कुछ नहीं है। बात सिर्फ इतनी है कि मुसलमानों का रहनुमा बनने की ऐसी गलाकाट प्रतियोगिता चल निकली है कि किसी को कुछ सूझ नहीं रहा है कि ऐसा वह क्या कर दे कि उनका अलमबरदार बन जाए। एक कांग्रेस के दिग्गी राजा थे जिन्होंने अपने बयानों से पार्टी की लुटिया डुबो दी। सपा में वही भूमिका आजम साहब ने संभाल ली है। सबको फायर ब्रांड नेता बनने का इतना शौक चर्राया है कि इतना सोचने की भी मोहलत नहीं कि क्या कहें और क्या न कहें। मौलाना बुखारी से उनके मतभेद अपनी जगह, उस बुग्ज को निकालने के लिए उन्हें अपने तरकश से कुछ और जहरबुझे तीर निकालने चाहिए वह सब मंजूर है लेकिन किसी की कही ये बात हमेशा दिमाग में रहनी चाहिए कि बोलने से पहले सौ बार और गुस्से में बोलने से पहले हजार बार सोचना चाहिए।

बुखारी साहब ‘ताज पहनाया जा सकता है तो उतारा भी जा सकता है’ जैसा मगरूर बयान देकर सपा पर अहसान लाद रहे हैं कि उनकी बदौलत मुसलमानों का वोट पाकर सपा सत्ता में आई है इसलिए उनको उनका हिस्सा मिलना चाहिए और आजम साहब जौहर विश्वविद्यालय का विधेयक लटकाए रखने और बाद में उसे राष्‍ट्रति को मंजूरी के लिए भेजे जाने को साजिश बताते हुए यह आहोजारी कर रहे हैं कि अगर विश्वविद्यालय विधेयक समय पर राज्यपाल ने पास कर दिया होता तो मुस्लिम कौम का अब तक कितना भला हो चुका होता। दोनों महिमा मण्डित लोग मुसलमानों को हांके जा सकने वाले रेवड़ से ज्यादा कुछ नहीं समझते। और उस कौम का भेड़-बकरी बने रहने में ही मुस्लिम राजनीति करने वालों का फायदा है। जम्हूरियत तो सबको आगे बढ़ने के पूरे मौके फराहम करती है। देश की जम्हूरियत कोई ठहरा हुआ पानी नहीं है जिसमें सड़ांध आने लगे, यह एक निरन्तर प्रगतिशील और प्रवहमान चेतना है जो अपने में नित नये आयाम जोड़ती चल रही है। कभी कोई ख्वाब में भी सोच सकता था कि दस रुपये के टिकट के दम पर आप सीना ठोंक कर सरकार से कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकेंगे और सरकार जानकारी देने पर विवश हो जाएगी। यह जम्हूरियत का उदारमना चेहरा है जो हर नागरिक को जानने का अधिकार देती है।  

बहरहाल, यह राजनीति है और यह ऐसे ही चलती है। मेरा सरोकार न बुखारी साहब से है और न आजम साहब से, लेकिन मेरा गहरा सरोकार अपने उस देश से जरूर है जहां जम्हूरियत की गहरी जड़ें हैं और कानून का शासन भी है। जम्हूरियत न होती तो प्रदेश की नाराज जनता बसपा को सिंहासन से नीचे उतार कर सपा को गद्दी पर न बैठा पाती, हमारे आजम साहब जिसमें काबीना मंत्री हैं। अपने इस बयान के लिए आजम साहब प्रदेश की जनता से माफी तो खैर क्या ही मांगेंगे, अगर वह मन ही मन अपने कहे पर पशेमान भी हो जाएं तो वही बहुत होगा।

लेखक नवनीत मिश्र कथाकार हैं. इनके छह संग्रह प्रकाशित हो गए हैं. ये लगभग साढ़े तीन दशकों से आकाशवाणी में उद्घोषक और समाचार वाचक के रूप में जुड़े रहे हैं. इनकी कई कहानी संग्रह और कहानियों को पुरस्‍कृत किया जा चुका है. इनकी पुस्‍तक 'वाणी आकाशवाणी' को भारतेंदु हरिश्‍चंद्र पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया जा चुका है. इनसे संपर्क 09450000094
 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

 

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...