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मीडिया में काफी कुछ गलत हो रहा है

न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने पूरे मीडिया को एक ही धरातल पर रखते हुए उसकी तीखी आलोचना की है। इस पर एडीटर्स गिल्ड की काफी तीखी प्रतिक्रिया रही है। काटजू अपनी पूरी जिंदगी फैसला सुनाते आए हैं, मगर इस दफा लगा जैसे कि उन्हें अपनी बात अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील तरीके से रखनी चाहिए थी। यह सही है कि मीडिया में काफी कुछ गलत हो रहा है। इसे ठीक करने के लिए एक बहस की शुरुआत की जा सकती है।

न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने पूरे मीडिया को एक ही धरातल पर रखते हुए उसकी तीखी आलोचना की है। इस पर एडीटर्स गिल्ड की काफी तीखी प्रतिक्रिया रही है। काटजू अपनी पूरी जिंदगी फैसला सुनाते आए हैं, मगर इस दफा लगा जैसे कि उन्हें अपनी बात अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील तरीके से रखनी चाहिए थी। यह सही है कि मीडिया में काफी कुछ गलत हो रहा है। इसे ठीक करने के लिए एक बहस की शुरुआत की जा सकती है।

हालात में सुधार के लिए आमराय बनाने की जरूरत है, न कि ऐसी बहस छेड़ी जाए जिससे इस दिशा में शुरू किए गए प्रयास पटरी से ही उतर जाएं। किसी मसले को उठाना जितना जरूरी है उससे कहीं अधिक जरूरी है कि उसे सही तरीके से उठाया जाए। ऐसा न हो कि हम बढिय़ा मौका खो दें। मसले को इस तरीके से उठाना चाहिए कि आम लोगों का ध्यान भी उस ओर जाए। आज की तारीख में किसी मसले के प्रति आम लोगों का ध्यान आकृष्ट कर पाना और फिर उसे बनाए रख पाना बहुत आसान नहीं रह गया है।

अगर न्यायमूर्ति काटजू ने मीडिया के बारे में अपनी राय व्यक्त करते हुए निम्‍नलिखित जैसे शब्दों का प्रयोग किया होता तो शायद उनकी इतनी जबरदस्त आलोचना नहीं होती। वह कह सकते थे कि कई सारे ऐसे पत्रकार इस पेशे में आ रहे हैं जो जानकारी के मामले में कच्चे हैं और खबरों के प्रकाशन या प्रसारण के पहले पूरा अध्ययन नहीं करते। उन्हें तो बस खबरें प्रकाशित या प्रसारित करने की जल्दबाजी रहती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 24 घंटे बिना रुके चलने वाले खबरिया चैनलों की वजह से ऐसे हालात पैदा हो गए हैं कि घटनाओं को जस का तस दिखाना पड़ रहा है, जबकि मीडिया जगत के पास यह जानने का समय भी नहीं होता कि आखिर कोई घटना क्यों घटी। घटना के मूल में जाने का वक्त तो उसके पास है ही नहीं। वे अब शोध में समय बरबाद नहीं करना चाहते।

अपनी समझ बढ़ाने के लिए हम जरा इस पर एक सरसरी निगाह डाल लेते हैं कि स्वतंत्रता के बाद मीडिया किस तरह उभरा है। मीडिया की शुरुआत उन लोगों के साथ हुई जो इसे एक जज्बे की तरह देखते थे। कई पढ़े-लिखे युवा लोग जिनके पास जानकारी की तो कोई कमी नहीं थी, मगर वे डिग्री से वंचित रह गए थे, वे सबसे पहले इस पेशे में उतरे थे। दरअसल स्वतंत्रता की लड़ाई में वे पूरी तरह व्यस्त रहे और उन्हें इसी क्रम में कई बार जेल भी जाना पड़ा जिस वजह से वे डिग्री नहीं हासिल कर पाए और अपना करियर बनाने से चूक गए। ये ही युवा स्वतंत्रता के बाद अखबारों के साथ जुड़े। 50 और 60 के दशक में मीडिया राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बन कर खुश था। नेताओं के बयान, परियोजनाओं के बारे में विकास की खबरें, योजना आवंटन और लक्ष्यों के बारे खबरें छापकर उन्हें खुशी होती थी।

राष्ट्रीय राजनीति में कलह बढऩे लगी तो इंदिरा गांधी ने अखबारों पर अंकुश लगा दिया। इसके पीछे स्वाभाविक वजह न्यूजप्रिंट के आयात पर विदेशी मुद्रा खर्च को रोकना बताया गया, मगर यह रोक मीडिया की स्वतंत्रता पर नकेल कसने के लिए थी। फिर आपातकाल का दौर आया। भारतीय प्रेस 1977 के बाद से फलने-फूलने लगा। अस्सी के दशक के शुरुआत से ही आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हो चुकी थी और भारत में भी बड़े बदलाव देखे गए। इसी दौर में उपभोक्ता की खोज हुई। यहीं से आर्थिक पत्रकारिता की शुरुआत हुई। कारोबारी पत्रिकाएं और सामान्य अखबारों में कारोबार जगत की खबरें आने लगीं। मीडिया का मुख्य ध्यान राष्ट्रीय निर्माण से हटकर शख्सियतों और ब्रांडों की ओर हो गया। आर्थिक पत्रकारिता की वजह से ही पहली बार पत्रकार अपेक्षाकृत सम्मानजनक तनख्वाह पा सके और युवाओं का रुझान पत्रकारिता की ओर बढ़ा। अब पत्रकारिता भी विकल्प के तौर पर एक पेशा बन कर उभर चुका था।

नई आर्थिक नीतियों के प्रभावी होने के बाद 90 के दशक की शुरुआत में बड़े पैमाने पर आर्थिक बदलावों की बयार चली थी। आर्थिक नीतियों में बदलाव और सेबी, नैशनल स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉजिटरीज के अस्तित्व में आने और डीमैट खातों ने देश में कारोबार करने का तरीका ही बदल डाला। इन्होंने कारोबारी पत्रकारिता का चेहरा भी बदल दिया। 90 के दशक का अंत होते होते मीडिया द्वारा स्टिंग ऑपरेशन करने का चलन बढ़ा और 24 घंटे समाचार प्रसारित करने वाले न्यूज चैनलों का उद्भव हुआ।

आर्थिक उदारवाद के बाद अब कारोबारी पत्रकारिता तथ्य आधारित, अच्छा शोध और संतुलित होती है। खुदरा और विदेश पोर्टफोलियो में बढ़ते निवेश के कारण लगातार होने वाले सख्त स्टॉक विश्लेषण कारोबारी पत्रकारिता के लिए काफी फायदेमंद साबित हुए हैं। इस समय के दौरान पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित क्षेत्र राजनीतिक पत्रकारिता में भी ठहराव जैसी स्थिति देखने को मिल रही है। लेकिन एक बड़ा बदलाव फिर आ रहा है। सिर्फ राजनीतिक पत्रकारिता नहीं बल्कि पूरी सार्वजनिक जगह में दोबारा बदलाव आने वाला है, जिसकी तीव्रता और असर समय के साथ साथ और बढ़ेगा। समाज और तकनीक ने लगातार मीडिया को बदला है, न कि मीडिया ने समाज को। अब भारत की आम जनता, अन्ना हजारे और उनकी टीम द्वारा शुरू किए गए एक और बड़े आंदोलन से गुजर रही है। ऐसे में मीडिया की भी जवाबदेही तय की जाएगी। नीरा राडिया टेप कांड और प्रेस परिषद की खुद की रिपोर्ट में पेड न्यूज का नतीजा है कि उत्तर प्रदेश के एक विधायक को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। ये नतीजे ही भविष्य में समाज की दिशा तय करेंगे।

मीडिया के लिए नियामकीय व्यवस्था दो में से किसी एक तरीके से बदल सकती है। न्यायमूर्ति काटजू की सिफारिशों को मानते हुए सरकार प्रेस परिषद को ज्यादा प्रभावी अधिकार दे सकती है। या फिर नागरिक समाज में ही मीडिया पर नजर रखने वाले संगठन मुकम्मल लोकपाल विधेयक की मांग जैसे संस्थागत बदलावों की गुहार लगा सकते हैं। खैर, ये बदलाव चाहे जिस भी तरीके से हों, यह तय है कि मीडिया की जवाबदेही तय करने की मांग जल्द ही जोर पकडऩे वाली है। सिर्फ न्यायमूर्ति काटजू के जैसे नजरिये से प्रक्रिया में विलंब ही हो सकता है।

सुबीर रॉय का यह लेख बीएस से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

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