शीर्षस्थ पदों पर भारी बदलाव करने के बाद भी आज समाज की नैया पार लगाने के बजाए डूबती ही जा रही है. तय समय-सीमा में सैलरी नहीं देने से खफा होकर अंबाला संस्करण के कई पत्रकार प्रबंधन को आंखें दिखा चुके हैं. इन्होंने इस तरह आंखें तरेरी कि प्रबंधन को दिल्ली से लाखों का कैश लेकर अंबाला जाना पड़ा और कर्मियों को नकद भुगतान करना पड़ा. इसके बाद प्रबंधन को अपनी शक्ति दिखानी ही थी. प्रबंधन के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सबक सिखाने का प्रपंच रचा जाने लगा, जिसके बाद कुछ पत्रकारों ने अपनी मर्जी से तो कुछ ने दबाव में नौकरी छोड़ दी. ऐसे पत्रकारों की संख्या 10 से ज्यादा बताई जा रही है.
बात आपसी अनबन या नौकरी छोड़ने तक ही सीमित नहीं है. जोर-शोर से पंचायतों के लिए शुरू हुआ संस्करण बंद हो चुका है. साप्ताहिक हेल्थ, विवाह, धर्म समाज संस्करण भी दम तोड़ चुका है. बाकी संस्करणों की हालत भी डांवाडोल है. इसके लिए हाल में शुरू हुआ मेवात, रेवाड़ी व पलवल संस्करणों के कार्यालयों पर या तो ताला लग चुका है या ताला लगने वाला है. हालात बदतर इसलिए भी है कि रवीन ठुकराल के कुछ खुल्ले सांढ़ अंबाला से लेकर दिल्ली तक के कुछ पुराने कर्मियों को सींगे मार रहे हैं. गाली देकर बात होती है. वे डरें भी क्यों, जब सैंया बन गए कोतवाल.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





