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पत्रिका प्रबंधन अत्याचारियों का पक्षधर, बिना कारण बताए पत्रकार को निकाला

जिस बात की आशंका थी, वह घटित हो गयी. पत्रिका प्रबंधन ने मुझे फोन से सूचना दी कि मुख्य कार्यालय द्वारा मेरा एग्रीमेंट आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है इसलिए आज से वे मेरी सेवा समाप्त कर रहे हैं. दो दिन पहले नियुक्ति पत्र मांगे जाने पर उन्होंने 30 अप्रैल तक इंतजार करने को कहा था. आज भी मैंने जब उनसे कहा कि पिछले दो वर्ष का नियुक्ति पत्र या एग्रीमेंट की कापी उपलब्ध कराएँ तो उन्होंने ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता बता कर मुझे हटाये जाने की सूचना भी लिखित में देने के लिए मना कर दिया. मैं मामला श्रम न्यायलय ले जाने के बारे में सोच रहा हूँ. कृपया सलाह दें कि क्या यह उचित होगा? या ज्यादा ना उलझ कर नई राह की तलाश करूँ ? 

जिस बात की आशंका थी, वह घटित हो गयी. पत्रिका प्रबंधन ने मुझे फोन से सूचना दी कि मुख्य कार्यालय द्वारा मेरा एग्रीमेंट आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है इसलिए आज से वे मेरी सेवा समाप्त कर रहे हैं. दो दिन पहले नियुक्ति पत्र मांगे जाने पर उन्होंने 30 अप्रैल तक इंतजार करने को कहा था. आज भी मैंने जब उनसे कहा कि पिछले दो वर्ष का नियुक्ति पत्र या एग्रीमेंट की कापी उपलब्ध कराएँ तो उन्होंने ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता बता कर मुझे हटाये जाने की सूचना भी लिखित में देने के लिए मना कर दिया. मैं मामला श्रम न्यायलय ले जाने के बारे में सोच रहा हूँ. कृपया सलाह दें कि क्या यह उचित होगा? या ज्यादा ना उलझ कर नई राह की तलाश करूँ ? 

आपको याद होगा कि यह पूरा मामला वन मंत्री के भाई द्वारा जंगल कटाई की खबर पर मेरे द्वारा काम करने के बाद शुरू हुई. यह काम और अबूझमाड़ सुरक्षाबल के जवानों के अत्याचार की खबर मैंने पत्रिका के संपादक गिरिराज जी के कहने पर ही किया था. किन्तु इन दोनों खबर को पत्रिका ने रोके रखा. तब मजबूर होकर मैंने अन्य माध्यमों का सहारा लेकर जनहित में उसे प्रकाशित करना उचित समझा. बौखलाए वन अधिकारी और वन मंत्री के नजदीकियों ने मुझ पर हमला भी कराया. सात दिनों तक मुझे अस्पताल में रहना पड़ा. पुलिस अपराधियों को ढूंढने के बजाय मुझे फर्जी पत्रकार साबित करने में जुटी रही.

जिस पत्रिका के लिए निडरता और ईमानदारी के साथ मैंने दर्जनों बड़ी खबरें की, उसी पत्रिका ने साथ नहीं दिया, उल्टे पत्रिका के ही किसी जवाबदार ने कांकेर पुलिस कमल शुक्लाको बताया कि मैं पत्रिका से जुड़ा ही नहीं हूँ. बिना किसी कारण बताये और बिना किसी नोटिस के मुझे निकाले जाने की सूचना भी मौखिक दी गयी. गिरिराज जी मेरे से बात करने का साहस नहीं जुटा रहे हैं. आप सभी से निवेदन है कि पत्रिका संपादक के मोबाइल 9993599969 और पत्रिका प्रबंधन 07713051952 पर फोन कर, एसएमएस कर विरोध दर्शाएं.

कई साथियों ने मेरे इस कठिन समय में साथ देकर मेरा हौसला बढाया है, उनके प्रति आभार. अब-तक के अनुभव के आधार पर अब किसी सेठ लोगों के साथ जुड़े बिना अपना छोटा सा अख़बार निकालने की कोशिश करूँगा या रोजी-रोटी की व्यवस्था होने पर अपने किसी हौसलेमंद साथी के अभियान में शामिल हो जाऊंगा.

कमल शुक्ला

[email protected]


कमल शुक्ला ने अपने साथ हुए वाकये और अपनी पीड़ा को फेसबुक पर भी जाहिर किया है, जिस पर कई लोगों ने कमेंट किए हैं. कुछ कमेंट इस प्रकार हैं….

        Saroj Mishra : prjatantr hai, andha bante revdee, cheenh cheenh ke dey
 
        Girish Pankaj : ये हैं आज के पाखंडी संपादक…..अब तो एक ही चारा है अपना अखबार निकालो. संतुलित – प्रामाणिक प्रतिरोध ज़रूरी है. स्वस्थ पत्रकारिता ज़रूरी है. साफ़-सुथरे लोगों को अपने साथ जोड़ें, वरना पीत पत्रकारिता के लिए साप्ताहिक पत्रकारिता बदनाम हो रही है. आर्थिक सहयोग मिले या अपनी पास ज़मीन-जायदाद हो, तो दैनिक भी निकाला जा सकता है मगर अभी 'साप्ताहिक' से शुरुआत हो. और सबसे पहले ऐसे संपादकों को नंगा करना ज़रूरी है जो व्यवस्था के दलाल बने हुए है. शुभकामनाएं …
 
        Girish Pankaj : श्रम न्यायलयकी शरण लेना ठीक होगा. अखबार के मालिक और उनके दलाल तभी ठीक होते है.
 
        Kamal Shukla : अखबार उद्योग द्वारा एक श्रम जीवी पत्रकार को मई दिवस की भेंट है
   
        Anuj Shukla : नहीं जनता से विश्वास का गोरखधंधा करने वाले अखबार और संपादक को ऐसे छोड़ना पत्रकारों के हित में नहीं , इस पर ज्यादा से ज्यादा फोन किया जाना चाहिए और पूछना चाहिए की अखबार किसके साथ है, खबर के साथ या मंत्री के असर के साथ
    
        Ashutosh Ashu : Kamal Ji, ek aisa aagaz kijiye ki sabki jaan haath main aa jaye…………
     
        Ashish Anchinhar : शुक्ला जी मै आपके साथ हूँ । मगर मेरा मानना है कि अभी आप उस सेठ से ना उलझे। कुछ दिन इंतजार करें। आ जुझारू है ही। जब कुछ और अलग कर लेंगे तो वही सेठ फिर से आपको बुलायेगा। यही आपकी वास्तविक जीत है। इस घड़ीमे हम आपके साथ है।….
      
        Prakash Srivastava : कमलजी, आपके संघर्ष मेँ हम साथ है.श्रम न्यायालय मेँ तो जरुर जाएँ.साथ ही स्वतंत्र रूप से भी करने की तैयारी करेँ.चुनौतियोँ से जूझना है.
 
        Krishnadutta Upadhyay : बहुत खेदजनक रहा ,आज कल यही चल रहा है |आप ठंडे दिमाक से सोच विचार कर कदम उठायें मै यथाशक्ति हर संभव सहयोग देने तैयार हूँ ——
         
        Rajeev Ranjan Prasad : कमल भैया यह दुर्भाग्य पूर्ण था लेकिन पूरे साहस के साथ आपकी जिजीविषा को परखने का उपक्रम है यह घटना। आप अपना पत्र प्रारंभ करें अथवा किसी अन्य पत्र-पत्रिका के साथ जुड कर आगे अपना संघर्ष जारी रखें मैं जानता हूँ कि समझौता न करने वाला इंसान अपनी राह बना कर ही रहता है। आप जानते हैं कि अपनी पूरी शुभचिंताओं के साथ मैं आपके साथ हूँ।
         
        जन सरोकार : मित्र ! जैसा की आपने अपने स्तर से एक अखबार निकालने का या साथियों के किसी बेहतर अभियान से जुड़ने का सोचा है , यक़ीनन अच्छा फैसला है , संपादक की तो ऐसी – तैसी हो ही गयी . उससे बढ़िया संपादक या पत्रकार साबित होना ही अच्छा प्रतिकार है . साहसिकता के लिए सलाम .
         
        Atul Shrivastava : कमल जी, आपकी खबरें अक्‍सर पढता हूं, ब्‍लाग में भी जाता हूं। हम राजनांदगांव से अखबार निकाल रहे हैं, ''भास्‍कर भूमि''। इस अखबार में आप अपने क्षेत्र की खबरें भेज सकते हैं। कांकेर क्षेत्र में आप एजेंसी और ब्‍यूरो भी ले सकते हैं।
        अखबार का इसंस्‍करण http://bhaskarbhumi.com/
        है। इमेल पता [email protected] है
        Bhaskar Bhumi | Epaper
        www.bhaskarbhumi.com
         
        Sant Ram Thawait : कमल भाई यह समाचार जानकार दुख तो हुआ वह इसका अनुमान था ही की ऐसा ही सकता है …..ये वही पत्रिका अखबार है न जिसके आफिस मे कुछ माह पूर्व सत्ताधारी लोगो के दल ने हमला किया था ? इस तरह के अखबार के मालिक या संपादक होने से बेहतर तो मै जिस्म के बाजार मे बैठी उस अधनंगी औरत को मानता हूँ जो कम से कम ईमानदारी से अपना ''धंधा'' तो कर रही है …….मै हमेशा ही आर्थिक अभाव मे रहने वाले पत्रकार साथियों को टोका करता था की दुनिया मे कोई काम कर लो पर पत्रकारिता भूल से न करो यदि करना भी है तो स्वतंत्र रूप से करो ……आप तो उसके एक प्रतिनिधि मात्र है मै तो संपादकों की इससे भी बुरी हालत देखा हु ….जनता का विश्वास खोते ये व्यापारी नुमा अखबार के मालिक किस मुह से अपने आप को चौथे स्तंभ का प्रतिनिधि कहते हैं समझ नहीं आता …..आपके साथ जो हुआ है उससे कम से कम बाकी ऐसे पत्रकार जो अपने आप को सबसे आगे रखने के चक्कर मे अपने संपादक और मालिक की चापलूसी करते हैं उनको तो सबक लेना ही पड़ेगा ………जनता से भी निवेदन है की इस तरह के अखबार का बहिस्कार करे ….न तो उसको खरीदे और न ही उसको पढ़ें …..बाजार मे बहुत सारे विकल्प हैं …….. हम अखबारों की इस भीड़ मे कोई एक विशेष अखबार क्यों पढ़ते हैं ?……इसीलिए न की अमुक अखबार औरों से अच्छा तथा निष्पक्ष समाचार देता है ….? आखिर वह समाचार लाने वाला कोई न कोई कमल शुक्ल तो होगा ही न …..? जब आपके निष्पक्ष समाचार लाने वाला एक आम आदमी की ऐसी हालत कोई अखबार कर दे तो उस अखबार को पढ़ने से क्या फायदा ……? आज प्रायः हर अखबार के मालिक अपने अखबार के दम पर सत्ता से साँठ गांठ कर शासन से मिलकर अपना नया अलग व्यापार करने मे भी लगे हैं और खूब लाभ कमा रहें हैं ……यदि आपका पक्ष मजबूत है तो मेरा मानना है की श्रम न्यायालय जरूर जाए पर सारे विकल्पों को सोचकर ही ……
 

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