: सहारा ग्रुप के मोस्ट पावरफुल लोगों में शुमार हुए उपेंद्र राय : मीडिया, हाउसिंग, रिटेल, हास्पिटेलटी, कारपोरेट का काम सीधे तौर पर देख रहे, इसके अलावा पूरे ग्रुप के किसी भी वेंचर में दखल देने का अधिकार : सहाराश्री सुब्रत राय सहारा की तरफ से नया सरकुलर जारी : पहला सरकुलर सहाराश्री सुब्रत राय सहारा के हस्ताक्षर से 29 मार्च को जारी हुआ. इसमें उपेंद्र राय को फिर से सहारा न्यूज नेटवर्क के एडिटर और न्यूज डायरेक्टर के बतौर डेटुडे का कामकाज पूरी तरह से देखने को कहा गया. साथ ही यह भी कहा गया कि उपेंद्र राय मीडिया डिवीजन के अलावा हास्पिटेलिटी, हाउसिंग, सर्विस डिविजन का भी काम देखेंगे. मतलब, उपेंद्र राय सहारा के पहले ऐसे मीडिया हेड बने जिन्हें मीडिया के अलावा भी ग्रुप की अन्य कंपनियों व वेंचर्स के शीर्षस्थ पद से नवाजा गया. साथ ही उन्हें सहारा ग्रुप के शीर्षस्थ पांच सदस्यीय स्ट्रेटजिक मैनेजमेंट ग्रुप में शामिल कर लिया गया.
उनके कद में बढ़ोत्तरी का अभियान यहीं खत्म नहीं हुआ. 25 अप्रैल को सहाराश्री सुब्रत राय सहारा ने फिर एक सरकुलर अपने हस्ताक्षर से जारी किया. इसमें कहा गया कि उपेंद्र राय को अब कारपोरेट रिलेशन और कारपोरेट अफेयर्स का भी काम दिया जा रहा है. यही नहीं, यहां तक लिखा गया है कि उपेंद्र राय पूरे ग्रुप की किसी भी कंपनी, डिवीजन व वेंचर में कभी भी किसी भी तरह का दखल दे सकते हैं. दोनों नीचे हैं. इन्हें पढ़कर आप उपेंद्र राय की सहारा के लिए और सहारा में अहमियत समझ सकते हैं.
पहला सरकुलर….

दूसरा सरकुलर…

कौन हैं ये उपेंद्र राय? मात्र 31 साल (जन्म-16 जनवरी 1981) की उम्र में हजारों करोड़ की कंपनी में शीर्ष पर बैठा यह युवक कैसे यहां तक पहुंचा. क्या काबिलियत है इनमें? उपेंद्र राय के करीबी बताते हैं कि उपेंद्र ने करियर की शुरुआत ही सहारा के साथ की थी. तब वे स्ट्रिंगर हुआ करते थे. अप्रिय स्थितियों में उन्हें सहारा से बाहर भी जाना पड़ा था. स्टार न्यूज में मुंबई व दिल्ली में उपेंद्र राय ने कई बीट पर काम किया. और जब सहारा में वापसी की तो धमाकेदार वापसी. मीडिया हेड के रूप में. बीच में कुछ समय के लिए वे दिन प्रतिदिन के कामकाज से दूर रहे पर अब उन्होंने फिर से वापसी की है, ढेर सारी ताकत के साथ.
पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के रहने वाले उपेंद्र राय के जीवन, अनुभव, सोच आदि के बारे में उनके एक पुराने प्रकाशित इंटरव्यू (साभार- जनतंत्र) के आधार पर जानकारी नीचे दी जा रही है. हालांकि भड़ास4मीडिया ने उपेंद्र राय से जब ताजे इंटरव्यू के लिए एप्रोच किया तो उन्होंने फिलहाल लो-प्रोफाइल में रहने देने का विनम्र अनुरोध करते हुए प्रस्ताव को नकार दिया. उन्होंने यह जरूर स्पष्ट किया- ''मैं बहुत कुछ कहने में कम, बहुत अधिक करने में ज्यादा भरोसा करते हैं. अगर मेरी टीम बेहतर नतीजे देती है, चीजों को नई ऊंचाई पर ले जाती है तो पूरी टीम बोलेगी, टीम का काम बोलेगा. मेरा अकेला बोलना-बताना ज्यादा प्रासंगिक नहीं है क्योंकि सहारा समूह हमेशा से टीम वर्क और सामूहिक दायित्व में विश्वास करता रहा है.''
उपेंद्र राय के इस कथन से ही आप समझ सकते हैं कि उनकी मानसिक संरचना एक कुशल पत्रकार के साथ-साथ एक कुशल टीम लीडर की भी है. सफलता हर आदमी के सौ दुश्मन पैदा करती है. उपेंद्र राय भी इससे अलग नहीं. बीच में उनके लिए कई तरह की अफवाह सामने आई. पर सारे अवरोधों को धता बताते हुए वे फिर से सहारा समूह में शीर्ष पर पहुंच गए. स्टार न्यूज़ में सीनियर एडिटर रहे उपेंद्र राय की 31 साल की उम्र में सहारा समूह की कई कंपनियों / डिवीजन का हेड बन जाना मार्केट इकोनामी के इस दौर में बड़ी कामयाबी है. मार्केट की भाषा में इसे अदभुत सफलता कह सकते हैं. सहारा ही क्यों, हजार करोड़ से ज्यादा टर्नओवर वाले अन्य समूहों / कंपनियों में किसी में भी इतनी कम उम्र में किसी शख़्स को इतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिली. यह कामयाबी किसी भी शख़्स के लिए फक्र की बात होगी. उपेंद्र राय की इस कामयाबी पर आप या तो नाज़ कर सकते हैं या फिर रश्क. लेकिन आप उनकी इस कामयाबी को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. पेश है, उपेंद्र राय से संबंधित तथ्यों-जानकारियों की सिलसिलेवार कथा, उपेंद्र राय की जुबानी…

मैं और मेरा करियर-
''मेरे करियर की शुरुआत सहारा से ही हुई थी। 1997 में मैंने एक स्ट्रिंगर के तौर पर सहारा में काम शुरू किया। तब मुझे 1500 रुपये मिलते थे। 1997 से 31 मई 2000 तक मैं स्ट्रिंगर रहा। एक जून 2000 से मेरी स्थायी नियुक्ति हुई और पहला वेतन 3300 रुपये का मिला। जून से 30 नवंबर तक मैंने सहारा वेलफेयर फाउंडेशन में काम किया। प्रोजेक्ट था ''जनसंख्या- एक रचनात्मक आंदोलन''। इस प्रोजेक्ट से खुद सहारा श्री जुड़े थे। वो जनसंख्या विस्फोट के ख़िलाफ़ मुहिम चलाना चाहते थे। उस प्रोजेक्ट का मैं कोऑर्डिनेटर नियुक्त हुआ। उसके बाद सितंबर 2000 में गोविंद दीक्षित सहारा अख़बार के संपादक बने। उसी साल उन्होंने प्रबंधन से अनुमति लेकर मुझे मुंबई ब्यूरो का इंचार्ज बना दिया। मुझे जीवन में बहुत अच्छे लोगों का साथ मिला। उम्मीद है कि साथियों के सहयोग से हम यह बड़ी जिम्मेदारी भी शानदार तरीके से पूरी करेंगे। हमें मालूम है कि इसके लिए काफी मेहनत करनी होगी। हम सब मेहनत के लिए तैयार हैं।''
सहाराश्री की सीख–
''मीडिया डिवीजन का काम संभाला तो सहाराश्री ने बस इतना ही कहा कि जब मैं अख़बार को खुद देखता था तो शुरुआती कुछ साल तक अख़बार की जो धार रही, लोकप्रियता और पहुंच रही… कालांतर में वो धार कुंद हो गई। लोकप्रियता घट गई। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि लोकप्रियता कम होने की एक वजह कंपटिशन हो, लेकिन इससे अख़बार की धार कुंद नहीं होनी चाहिए थी। आक्रामक तेवर, हिम्मत और ईमानदारी के साथ सच्चाई का दामन थामे रखने की लगन कमजोर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुहिम को आगे बढ़ाना है। वो पुरानी पहचान वापस हासिल करनी है।''
सहारा में गुटबाजी-
''किसी भी स्थिति में अच्छा करना अपने निजी गुण-दोषों पर भी निर्भर करता है। इस पर कि आप किसी चुनौती को किस तरह लेते हैं। अगर आप किसी भी संस्था में सफल होना चाहते हैं तो सबसे पहले वहां का माइंडसेट समझना होगा। कर्मचारियों से बेहतर ताल-मेल बिठाना होगा। अगर आप गौर करें तो दुनिया में सबसे ज़्यादा कठिनाई तब आती है जब कोई अमेरिकी कंपनी चीन या फिर जापान की किसी कंपनी को टेकओवर करती है। जहां सांस्कृतिक टकराव काफी ज़्यादा होता है। एक दिन उन कंपनियों में भी सामंजस्य बनता है। बेहतर नतीजे सामने आते हैं।''
पुरानी टीम, नई टीम-
''सहारा के पास अच्छी टीम है। हमें लगता है कि वहां मौजूद लोगों से ही हम बेहतर नतीजे हासिल कर सकेंगे। हमारा ऐसा इरादा कतई नहीं है कि हम लाव लश्कर लेकर चलें। अगर कुछ लोगों की नियुक्ति करनी पड़ी तो वो की जाएगी लेकिन कोई बड़ा भर्ती अभियान नहीं होने जा रहा। देखिए एक पुरानी कहावत है कि कॉमन थिंग्स आर नॉट कॉमन। अच्छे नतीजों के लिए कोई रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है। टीम में विश्वास भर दीजिए, प्रदर्शन सुधर जाएगा। और टीम हमारे पास है।''
स्टार न्यूज का अनुभव-
''स्टार न्यूज़ एक बेहतरीन कंपनी है। वहां मेरिट को पूरा सम्मान दिया जाता है। मुझे भी काफी सम्मान मिला। मैं अक्टूबर 2005 में दोबारा स्टार न्यूज़ गया और मुझे साल भर के प्रदर्शन के बाद 2006 में स्टार एचीवर अवार्ड मिला। उसके साथ मुझे प्रमोशन दिया गया। मैं स्पेशल करस्पॉन्डेंट से प्रमोट कर एसोसिएट एडिटर बना दिया गया। अभी मैं वहां पर सीनियर एडिटर के पद पर काम कर रहा था। मैंने मुंबई में नौ साल बिताए और जून 2009 में दिल्ली आया। स्टार न्यूज़ का दौर मेरे जीवन का स्वर्णिम काल है। मेरे संपादक उदय शंकर ने मुझे जो छूट दी, शायद ही कोई संपादक किसी रिपोर्टर को उतनी छूट देगा। शाजी जमां जी ने भी मुझे काम करने का पूरा मौका दिया। इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूं।''
संजय पुगलिया और उदय शंकर के बारे में-
''इन दोनों से ही मेरे संबंध बेहतर रहे। इसकी सिर्फ़ एक वजह है। अगर आप संपादक या बॉस की कही बात को पूरी तरह से लागू करने की क्षमता रखते हैं। साथ ही ज़रूरत पड़ने पर अपनी गारंटी पर उनके आदेश में करेक्शन करके उन्हें कन्विंस कर लेते हैं तो आपका कद बॉस की नज़र में बढ़ता है। मैंने वही किया। जहां मुझे लगा कि बॉस के आदेश में सुधार की जरूरत है और इससे उनका आदेश अधिक मजबूती से लागू होगा तो मैंने इसकी जानकारी उन्हें दी। फिर आगे बढ़ा। इससे संस्थान और संपादक दोनों के निर्णयों में एक और सुंदरता आई। इसका मुझे भी लाभ मिला। मेरे दोनों संपादकों ने मेरे अंदर ये देखा कि उपेंद्र के काम करने के तरीके में एक मॉडेस्टी है और वो कुछ भी करेगा उससे उनका सिर नीचा नहीं होगा। और मैंने भी जो ख़बरें दीं, उनका एक-एक सबूत और दस्तावेज मेरे पास है। सबसे पहले मैंने संजय जी के साथ काम किया है तो उनके बारे में बताऊंगा। संजय पुगलिया जी एक ऐसे संपादक हैं जो अपने टीम के एक-एक बंदे से दोस्ताना संबंध रखते हैं। अच्छे कर्मचारी को हर व्यक्ति साथ रखना चाहता है। लेकिन संजय जी काम करने वाले को भी यह अहसास नहीं होने देते हैं कि वो उसके काम से खुश नहीं हैं। उनकी टीम में अगर कोई कहीं कमजोर पड़ता है तो वो मोटिवेट करके उसके काम को निखार देते हैं। ऐसी क्वालिटी बहुत कम संपादकों में होती है। अपने साथ काम करने वालों को वो बहुत ज़्यादा सम्मान देते हैं। अब बात उदय शंकर जी की। उदय जी की साफ और सीधी लाइन है। व्यक्तिगत रिश्ते ऑफिस से बाहर और काम से कोई समझौता नहीं। अगर आप उनके आलोचक हैं और आपको काम आता है तो उदय शंकर आपको ऑफिस में बहुत मान-सम्मान के साथ रखेंगे और आपका मान-सम्मान बढ़ाएंगे भी, लेकिन हो सकता है कि दफ़्तर से बाहर आप उनसे मिल न पाएं। बात न कर पाएं। वो हर हाल में मेरिट को प्रमोट करने वाले हैं।''
13 साल में बुरा क्या रहा-
''एक दौर था जब मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा। 2002 में मुझे विपरीत परिस्थितियों में सहारा से हटना पड़ा। मुझे मौका नहीं दिया गया अपनी बात कहने का। मैं सहारा चेयरमैन से मिल कर अपना पक्ष रखना चाहता था। लेकिन मुझे मौका ही नहीं मिला। तब मुझे काफी पीड़ा हुई। जो काम मैंने नहीं किया मुझे उसकी सज़ा मिली थी। उसके बाद मैं कुछ मौकों पर सहारा श्री से मिला, लेकिन इस बारे में बात नहीं हो सकी। इस पर बात करने का मौका मुझे 2007 में मिला और मैंने उन्हें पूरी बात बताई। मैं सहाराश्री का हमेशा आभारी रहूंगा कि लंबा वक़्त बीतने के बावजूद उन्हें सब बातें याद थीं। उन्होंने मेरा दर्द समझा और महसूस किया। तब मैं भावुक हो गया और मेरी आंखें भर आईं थीं। सहारा से हटने के बाद और स्टार न्यूज़ में नौकरी मिलने के दौरान कई महीने मैं खाली रहा। उस दौरान मुझे रिश्तों को समझने का मौका मिला। दोस्तों की पहचान हुई। यह पता चला कि किस पर विश्वास करना चाहिए और किस पर नहीं।''

दस साल बाद कहां होंगे-
''मैं वर्तमान में जीने वाला हूं। भविष्य के बारे में नहीं सोचता। जीने का यह अंदाज़ भी मैंने सहारा श्री से सीखा है। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि कंपनी के सामने इतनी सारी चुनौतियां हैं तो क्या कंपनी के फ्यूचर को लेकर वो परेशान होते हैं? उन्होंने उत्तर दिया था कि मैं वर्तमान में जीता हूं। इसलिए तुम मुझे कभी चिंतित नहीं देखोगे। साल के 365 दिन, मेरी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं आता। यह बात मैंने उनसे ही सीखी है कि वर्तमान में जीना सबसे सुखदायी है। वैसे भी भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, यह कोई नहीं जानता।''






