: उल्टा होने लगा है जनता दरबार का असर : अखिलेश यादव के विरुद्ध बढ़ रही है लोगों में नाराजगी : सीन नं.1– सरकारी ट्यूबवेल का बिजली ट्रान्सफार्मर एक साल से फुंका पड़ा है। विभागीय भाग दौड़ बेकार रही। 120 किलोमीटर चल कर चार ग्रामीण डीएम साहब से मिलने सवेरे दस बजे जिला मुख्यालय पहुंच कर कार्यालय के बाहर इंतजार कर रहे है। दोपहर 2 बजे उन्हें बताया जाता है कि डीएम साहब आज नहीं बैठेंगे। वह कमिश्नर के साथ मीटिंग में हैं।
सीन नं.2– फटे चीथड़ों में लिपटे अधेड़ मां-बाप 20 साल की एक लड़की को लिए एसपी के कार्यालय के बाहर इंतजार कर रहे है। लड़की को दबंगो ने पीटा है। उसके शरीर में पट्टियां बंधी हुई है। बेहाल है। थाने में रिपोर्ट नहीं लिखी गई। सरकारी अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया। सीओ साहब मिले नहीं। अब एसपी साहब को फरियाद सुनाने के लिए आए हैं। एसपी साहब कानून व्यवस्था पर थानेदारों की मीटिंग लेने के बाद विधायक जी के साथ लंच करेंगे। कल ही मुलाकात हो पाएगी। अब यह पीड़ित कहां जाए उसकी समझ में नहीं आ रहा क्योंकि गांव वापस लौटता है तो दबंग फिर मारेंगे।
सीन नं.3– इन दोनों को ही कुछ चलता पुर्जा टाइप के विरोधी दलों से संबद्ध नेता समझाते है कि जब यहां तक आ गए हो तो सीधे लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री के जनता दरबार में क्यों नहीं अर्जी देते हो। तुरंत सुनवाई होगी। जनता दरबार कहां लगता है, लखनऊ कैसे पहुंचना है यह सब एक कागज में लिखकर नेता लोग इन पीड़ितों को दे देते है और वह लखनऊ रवाना हो जाते है। आने जाने का, वहां रूकने का टोटल खर्चा डेढ़ हजार रुपये। दो दिन के वक्त की बर्बादी। अगर सही सलामत पहुंच गए। अर्जी पहुंचा पाएं तो होना क्या है? उस अर्जी पर मुख्यमंत्री के विशेष सचिव का एक नोट लगा होता है। जांच कर नियमानुसार कार्रवाई करें। अर्जी लौट कर फिर वहीं डीएम और एसपी के पास आ जाती है।
ऐसे चल रहा है उप्र सरकार का कामकाज। यह तो बानगी भर हैं। वो जमाना गया जब मालिक काम करता था तो सहायक उससे दोगुना करते थे। अब तो प्रवृत्ति यह है कि जब मालिक ही कर रहा है तो हम क्यों करें। जुमला यह चटखारों भरा चर्चा में है कि जब काम करें खुद सीएम तो आराम करें एसपी डीएम। यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने माया सरकार में जनता और जर्नादन के बीच पहुंच और संवाद की बनी दीवार ढहा दी। उन्होंने अपने आवास के दरवाजे आम आदमी के लिए खोल दिए। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के जमाने में लोकप्रिय हुआ जनता दरबार फिर चालू कर दिया। आवास पर लगने वाले इस दरबार में कोई भी, कहीं से भी आकर बेरोक टोक अपनी समस्या प्रस्तुत कर सकता है। उस पर कार्रवाई होती है। सवाल यह है कि बहुत नेक मकसद के लिए और अपनी लोकप्रियता बढ़ाने, सर्व सुलभ होने की मंशा को दर्शाने वाला यह प्रयास मुख्यमंत्री के लिए बहुत मुफीद नहीं साबित हो पा रहा है। जनता दरबार में पिछली बार उमड़ी दस हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि निचले स्तर पर आम आदमी की सुनवाई नहीं हो रही है। वर्ना सिपाही, थाना, थानाध्यक्ष स्तर के मामलें आईजी तक पहुंचने की भरमार न होती अथवा लेखपाल स्तर पर सुलझाएं जाने वाले मामले कमिश्नर की चौखट से होते हुए जनता दरबार न पहुंचते।
यह तो होने लगा उल्टा : यूपी में सपा की सरकार की लगाम युवा मुख्यमंत्री अखिलेश के हाथों में होने को प्रदेश की जनता अपने लिए बेहद राहत भरा मानती है। उम्मीदों के पहाड़ खडे़ कर लिए है। मगर इस जनता दरबार का असर उल्टा दिख रहा है। सुनवाई न होने, न्याय न मिलने पर जो नाराजगी एसपी, डीएम स्तर से पनपती थी वह नाराजगी अब सीधे मुख्यमंत्री के प्रति पनप रही है। क्योंकि अगर जायज, संवैधानिक, कानूनी समस्या जिला स्तरीय अधिकारियों तक पहुंची उस पर इन अधिकारियों के द्वारा न्याय नहीं मिला। तभी तो वह मुख्यमंत्री के पास जाने को मजबूर हुआ। अब वहां से भी अगर फौरी राहत या जो उसे अपेक्षा है वह नहीं मिलता तो ऐसे व्यक्ति अब सीधे मुख्यमंत्री के प्रति नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। क्योंकि यह तो संभव ही नहीं है कि बेलगाम नौकरशाही अब मुख्यमंत्री कार्यालय से या जनता दरबार से आई उन्हीं अर्जियों पर आनन-फानन निस्तारण प्रक्रिया करने लगे। क्योंकि वही समस्या तो उनके पास आई थी। चाहते तो तभी सुलझा देते जनता दरबार जाने की नौबत ही नहीं आती। यानी की जो पहले अधिकारियों से नाराज था वह अब सीधे मुख्यमंत्री से नाराज हो रहा है।
विपक्षी भेज रहे भीड़ : मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की इस सीधी सादी जनहित कारी पहल को विपक्षीय दलों के कार्यकर्ताओं ने हाईजैक कर लिया है। तमाम जनपदों में यह देखने को स्पष्ट मिल रहा है कि जैसे ही कोई पीड़ित व्यक्ति न्याय की उम्मीद में भटकता नजर आता है उसको वह तुरंत पकड़ लेते है। उसकी बात सुनते है। सहानुभूति दिखाते है और सलाह देते है कि यहां भटकना बेकार है। सब जगह तो घूम लिए। अब एक ही रास्ता है कि मुख्यमंत्री के जनता दरबार में अपनी बात कहों जाकर। एक तरह से उसकी जमकर काउंसलिंग करते है। माइंड मेकअप करते है और एन केन प्रकारेण उसे जनता दरबार की ओर ठेल देते हैं। कई जगह तो यह जानकारी मिली है कि बसपाइयों ने ऐसे पीड़ित व्यक्ति को अपनी जेब से रुपये देकर जनता दरबार भेजा है। ऐसे ही एक नेता ने बताया कि जितने ज्यादा लोग जनता दरबार जाएंगे लौट कर आएंगे। हमें यह पता है कि उनके मसले पर स्थानीय स्तर पर कार्रवाई नहीं होनी है। फिर हमें मौका मिलेगा उस व्यक्ति को सपा सरकार के खिलाफ भड़का कर उसकी मानसिकता को बदलने का। बसपाइयों का यह खेल पूरे प्रदेश में जोरों से चल रहा है। कई जनपद ऐसे है जिनकी दूरी लखनऊ से 700 किमी तक है। इसके बाद आने वाले ग्रामीण क्षेत्रों से है तो यह दूरी और बढ़ जाती है।
ठेल-ठेल कर ऐसे पीड़ितों को जनता दरबार भेजने में बसपाइयों को राजनीतिक लाभ नजर आ रहा है जो कि काफी हद तक सही भी साबित होगा। छुट भइये नेताओं के अलावा विपक्षी दलों के विधायक गण भी तमाम फरियादियों को लखनऊ भेजने की फिराक में देखे जा रहे है। मुख्यमंत्री का जनता दरबार लोकप्रिय पहले भी रहा है। अब की भी इसलिए इसके प्रति लोगों में आर्कषण है कि पिछले पांच वर्षो में माया सरकार के मंत्रियों तक आम आदमी का पहुंचना मुश्किल था। मुख्यमंत्री तक तो खास भी नहीं पहुंच पाते थे। एक दम से बैरियर किसी भी जन सामान्य से जुड़ाव वाली चीज का खोल दिया जाए तो एक बार तो केवल वहां क्या हो रहा है, कैसे होता है यही देखने के लिए तमाम तमाशबीन पहुंच जाते है। फिर अब कि तो पांच साल से अपनी बात किसी जिम्मेदार व्यक्ति से कहने को तरसती चली आ रही प्रदेश की जनता यह मौका खुद भी ढूंढ़ रही थी। मगर इसके परिणाम तो अखिलेश सरकार के खिलाफ जाते दिख रहे है। एक तो विपक्षी दलो के नेता, कार्यकर्ता साजिश के तहत लोगों को वहां भेज रहे है। दूसरा यह कि काम न होने पर नाराजगी सीधे मुख्यमंत्री से हो रही है। तीसरा यह कि इससे यह पोल भी खुल कर मीडिया में आती जा रही है कि प्रशासनिक स्तर पर भी नई सरकार में लोगों को राहत नहीं मिल पा रही है।
कॉल सेन्टर ई मेल भी समस्या : जनता दरबार तो चल ही रहा है। मुख्यमंत्री लोगों से जुड़ने के लिए ई सिस्टम अपनाया है। इसके लिए कॉल सेन्टर खोल दिये गए है। जहां टेलीफोन पर प्रदेशभर से आने वाली शिकायतें दर्ज की जाएगी। साथ ही फेसबुक और ईमेल से भी लोग अपनी बात कह सकते हैं। यह प्रयास सराहनीय हैं। इससे शहरी क्षेत्रों के पढ़े-लिखे लोग लाभ उठा सकते हैं। मगर दिक्कत इसमें यह है कि टेलीफोन पर दर्ज कराई गई शिकायत सही है, वह व्यक्ति सही है इसका पता लगाना अपने आप में एक बड़ा काम है। लाखों की संख्या में फर्जी आईडी से लिए गये सिम कार्ड वाले मोबाइल काम कर रहे हैं। जगह-जगह पब्लिक टेलीफोन बूथ खुले हुए है। मुख्यमंत्री के सार्वजनिक हो चुके फोन नंबरों पर कोई भी किसी की गंभीर शिकायत दर्ज करा सकता है। बाद में जांच हो और पता चले कि न तो शिकायतकर्ता ट्रेस हो पा रहा है न ही जिसके खिलाफ शिकायत की गई है उसने ऐसा कोई काम किया है। प्रशासनिक भाग दौड़ में व्यर्थ समय बर्बाद होना है। ऐसी कई घटनाएं मायावती के शासन काल में भी हुई थी जब मुख्यमंत्री के रिसेप्शन कक्ष में लगे फोन पर घंटी बजी और किसी ने गालियां दी। जांच करने पर पता चला कि वह तो किसी बच्चे ने नंबर डायल कर दिया था। ऐसी समस्या यहां भी बढ़नी ही है।
प्रशासनिक अधिकारियों पर अब मुख्यमंत्री की मंशा पूरी करने की अहम जिम्मेदारी साफ दिखाई दे रही है अगर वह अपने स्तर पर ही समस्या का निस्तारण कर दें तो लाखों रुपये और वक्त की बर्बादी बचा सकते है साथ ही अखिलेश के सुशासन की बेहतरीन छाप छोड़ सकते है। विपक्षी दलों की इस बात में भी दम है कि मुख्यमंत्री को चाहिए कि वह महीने में चार बार थाना दिवस व तहसील दिवसों का आयोजन कराएं। जिनमें प्रत्येक जिला स्तरीय अधिकारी की उपस्थिति अनिवार्य हो और 50 प्रतिशत शिकायतों का निस्तारण मौके पर किया जाना सुनिश्चित हो। अगले दिवस में पिछले दिवस के दौरान आई शिकायतों के निस्तारण की मानीटरिंग सख्ती से हो। तभी जन सामान्य तक सरकार की पहुंच संभव है। क्योंकि सरकार जनता के द्वार पहुंचे न कि जनता सरकार के द्वार पर पहुंचने को मजबूर हो।
पीयूष त्रिपाठी
लखनऊ





