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भास्‍कर, जागरण एवं अमर उजाला जैसे अखबारों से क्‍यों होती है ऐसी नासमझी?

यशवंत भाई, नमस्कार। भाई साहब हिंदी के अखबारों ने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा के रिजल्ट के समाचार में इतनी भारी गलती की है कि राष्ट्र भाषा शर्म के मारे सर झुकाए खड़ी है। हिंदी के बड़े अखबारों, जिनमें दैनिक भास्कर, अमर उजाला, दैनिक जागरण जैसे नाम शामिल है, ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा के रिजल्ट में लिखा है कि अमुक परीक्षार्थी ने संघ लोक सेवा आयोग में टॉप किया है। किसी ने लिखा कि आईएएस की परीक्षा में टॉप किया। अब कोई इनको समझाए कि भाई सिर्फ यूपीएससी में टॉप लिखना कितना गलत है। कोई इनको बैठकर अच्छी तरह बताए कि यूपीएससी का सीधा मतलब सिविल सेवा परीक्षा नहीं, ये संगठन सैकड़ों अलग अलग पदों की परीक्षाएं आयोजित करता है।

यशवंत भाई, नमस्कार। भाई साहब हिंदी के अखबारों ने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा के रिजल्ट के समाचार में इतनी भारी गलती की है कि राष्ट्र भाषा शर्म के मारे सर झुकाए खड़ी है। हिंदी के बड़े अखबारों, जिनमें दैनिक भास्कर, अमर उजाला, दैनिक जागरण जैसे नाम शामिल है, ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा के रिजल्ट में लिखा है कि अमुक परीक्षार्थी ने संघ लोक सेवा आयोग में टॉप किया है। किसी ने लिखा कि आईएएस की परीक्षा में टॉप किया। अब कोई इनको समझाए कि भाई सिर्फ यूपीएससी में टॉप लिखना कितना गलत है। कोई इनको बैठकर अच्छी तरह बताए कि यूपीएससी का सीधा मतलब सिविल सेवा परीक्षा नहीं, ये संगठन सैकड़ों अलग अलग पदों की परीक्षाएं आयोजित करता है।

फिर इनको ये भी बताना होगा कि आईएएस की परीक्षा में टॉप लिखना भी गलत है। आईएएस की कौन सी अलग से परीक्षा होती है। इन्हें बताना होगा कि यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से आईएएस, आईपीएस, आईएफएस और विभिन्न पदों के लिए अधिकारी चयनित करती है। अब दैनिक भास्कर को ही लिजिए। इस अखबार ने तो प्रथम पन्ने पर रिजल्ट के लिए एजेंसी की खबर यूज की है। एजेंसी ने तो बिल्कुल सही लिखा है कि संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा। लेकिन बावजूद इसके भास्कर अपनी हेडिंग और सब हेडिंग में यूपीएससी टॉप लिख रहा है। अमर उजाला ने हरियाणा संस्करण में आईएएस में टॉप लिखा है।

दैनिक जागरण की साईट पर भी चल रहा है कि फलां युवती ने आईएएस में टॉप किया। अंग्रेजी के किसी अखबार को उठा कर देख लिया जाए, वहां ये गलती नहीं मिलेगी। लेकिन देश की खोटी किस्मत है कि अधिकांश जनता अपनी जानकारी के लिए हिंदी अखबारों पर निर्भर करती है। यशवंत भाई, हिंदी अखबारों का ये हाल देख मैंने सुबह सुबह कई जिला स्तर के हिंदी अखबारों के ब्यूरो चीफ को फोन लगाया। वो बोले भाई हिंदी अखबार पैसे इतने कम देते हैं कि उसमें तो ऐसे ही लिखने वाले रिपोर्टर मिलेंगे। लेकिन मैंने उल्‍टा सवाल दागा कि हिंदी अखबारों के संपादक तो खूब पैसे ले रहे हैं, और खुद को बड़ा पढ़ा-लिखा और बुद्धिजीवी होने को दम भरते हैं। वो भी इस गलती के लिए घेरे में आते हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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