मास्को : रूस में वर्ष 1917 की अक्टूबर क्रांति में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाला प्रावदा अखबार शनिवार को जहां अपनी सौवीं वर्षगांठ मना रहा है वहीं दुनियाभर के मेहनतकशों को एक होने का संदेश भी दे रहा है। संपादक बोरिस कोमोत्सकी बताते हैं कि मौजूदा समय में इसमें महज 23 पत्रकार काम करते हैं और कई बार तो उन्हें वेतन भी ठीक से नहीं मिल पाता।
प्रावदा की शुरुआत साम्यवाद के जनक जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स के जन्मदिवस के अवसर पर 05 मई 1912 को की गई थी। इस समाचारपत्र के जरिए ही लेनिन ने विदेश में रहते हुए रूसी क्रांतिकारियों में क्रांति का जज्बा भरा। प्रावदा की शुरुआत रूसी विपक्ष के एक महत्वपूर्ण समाचारपत्र के रूप में हुई थी और सोवियत काल में सत्तापक्ष की।
रूसी वामपंथ की आवाज माने जाने वाले इस अखबार को सोवियत संघ के पतन के बाद बेहद संकट के दौर का सामना करना पड़ा। तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तिसन ने इसे वर्ष 1991 में प्रतिबंधित कर दिया जिसके बाद इसे एक यूनानी व्यापारी को बेच दिया गया। रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (केपीआरएफ) ने आखिरकार वर्ष 1997 में इस पर पुन: नियंत्रण प्राप्त कर लिया और प्रावदा आज रूसी वामपंथ की एक महत्वपूर्ण आवाज बनकर उभरा है।
मास्को स्थित प्रावदा स्ट्रीट में स्थित इसके दफ्तर में संपादक बोरिस कोमोत्सकी बताते हैं कि मौजूदा समय में इसमें महज 23 पत्रकार काम करते हैं और कई बार तो उन्हें वेतन भी ठीक तरह से नहीं मिल पाता। प्रावदा के पत्रकारों को प्रशासन के सख्त रवैए, आर्थिक दिक्कतों, बंद किए जाने की धमकियों के बीच अपना काम करना पड़ता है। कोमोत्सकी बताते हैं कि ये कुछ कुछ वैसा ही है जैसा सौ वर्ष पहले जार के शासन में हुआ करता था। कोमोत्सकी के बैठने की जगह के पीछे वाली दीवार पर लेनिन की एक बडी़ सी तस्वीर लगी हुई है जिसमें वह प्रावदा पढ़ रहे हैं।
कोमोत्सकी अपने साथियों का हौसला बढा़ते हुए कहते हैं। हम मौजूदा दौर में विपक्ष की एक सशक्त आवाज बनकर उभरे हैं, हम बदलाव की लड़ाई लड़ रहे हैं। बेहद दिक्कत भरे माहौल में भी हम अपना काम करते हैं। कई बार हमें वेतन नहीं मिलता। हमारा हरेक कर्मचारी वाकई में एक हीरो है। प्रावदा साज सज्जा के मामले में अभी भी वैसा ही बना हुआ है जैसा सोवियत काल में था। प्रावदा के मुखपृष्ठ के मास्टहेड पर आज भी तीन सोवियत मेडल छापे जाते हैं जो दुनियाभर के मेहनकशों को एक होने का नारा देते हैं। प्रावदा के संपादक की मेज के ठीक पीछे बने शेल्फ पर लेनिन, मार्क्स और स्टालिन की मूर्तियां देखी जा सकती हैं।
दफ्तरों में लगी ऊंची ऊंची शेल्फों पर मार्क्सवादी साहित्य की बहुतायत है। इन सौ वर्षों के दौरान प्रावदा हालांकि एक बार फिर से वहीं पहुंच गया है जहां से यह शुरू हुआ था। किसी समय बीसियों लाख प्रतियों में प्रतिदिन छपने वाले प्रावदा के अब महज एक लाख अंक ही बाजार में पहुंच पाते हैं और यह महज चार पन्नों में ही सिमट गया है।
प्रावदा के आलोचकों का मानना है कि सोवियत काल में इसे बड़ी संख्या में पढ़ा तो जाता था लेकिन बहुत कम लोग ही थे जो इसे दिल से पढ़ते थे। वास्तुविद अलेक्सांद्र फ्योदोरोव बताते हैं, मैं अभी भी प्रावदा में दिलचस्पी रखता हूं। लोगों को इसे पढना चाहिए। अभी भी यह हम लोगों के लिये कुछ तो मायने रखता ही है।
प्रावदा सोवियत अवाम के अलावा मास्को में रहने वाले विदेशी संवाददाताओं और राजनयिकों के बीच भी खासा लोकप्रिय थे जो पर्दे के पीछे का घटनाक्रम जानने के लिए इसे पढ़ा करते थे। प्रावदा के आलोचक यह भी मानते हैं कि इसने कभी भी निष्पक्ष होकर रिपोर्टिंग नहीं की। प्रावदा की रिपोर्टों को सोवियत सेंसर की कैंची का प्राय: ही सामना करना पड़ता था जिसकी वजह से कई बार महत्वपूर्ण खबरें इसमें नहीं छप पाती थीं। कम्युनिस्ट पार्टी के आदेश के बगैर इसने कभी भी किसी नेता की मौत की खबर को अपने पन्नों पर जगह नहीं दी।





