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ब्‍लैकमनी से चलती हैं राजनीतिक पार्टियां!

: छोटे सपनों में डूबा देश : समय से संवाद : किसी भी दूसरे मुल्क में यह सवाल, देश की राजनीति के लिए निर्णायक बन जाता. ऐसे सवाल देश के अस्तित्व से जुड़े होते हैं, पर इन सवालों पर चुप्पी का अर्थ समझ से परे है. सत्ता का अर्थ क्या महज अपनी कामनाओं को पूरा करना रह गया है या देश भी कहीं एजेंडे पर है? – इस मुल्क के बारे में बाबर के अनुभव सही थे. उन्होंने पाया कि लाखों लोग सड़क के किनारे खड़े होकर बाहर से आये हमलावरों को देखते भर थे. मूकदर्शक होकर. बाहरी हमलावरों की संख्या सैकड़ों या हजारों में होती थी.

: छोटे सपनों में डूबा देश : समय से संवाद : किसी भी दूसरे मुल्क में यह सवाल, देश की राजनीति के लिए निर्णायक बन जाता. ऐसे सवाल देश के अस्तित्व से जुड़े होते हैं, पर इन सवालों पर चुप्पी का अर्थ समझ से परे है. सत्ता का अर्थ क्या महज अपनी कामनाओं को पूरा करना रह गया है या देश भी कहीं एजेंडे पर है? – इस मुल्क के बारे में बाबर के अनुभव सही थे. उन्होंने पाया कि लाखों लोग सड़क के किनारे खड़े होकर बाहर से आये हमलावरों को देखते भर थे. मूकदर्शक होकर. बाहरी हमलावरों की संख्या सैकड़ों या हजारों में होती थी.

बाबर को लगा कि सड़क के किनारे खड़े लाखों लोग अगर इन हमलावरों पर टूट पड़ें, तो स्थिति भिन्न होती. ‘निराशा के कर्तव्य’ में डॉ लोहिया ने भी हजारों वर्षो से गुलाम रहे इस मुल्क के मानस का सुंदर चित्रण किया है. आज भी क्या यह गुलाम मानस बदला है? वहीं आत्मकेंद्रित बोध, सार्वजनिक सवालों पर वीतरागी एटीट्यूड (बोध), ‘कोउ नृप होहिं, हमैं का हानी’, का व्यवहार.

याद है, 28 अप्रैल 2012 को सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह द्वारा प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी के सार्वजनिक होने पर, क्या तूफान खड़ा हुआ था? पार्लियामेंट से लेकर मीडिया में, सेनाध्यक्ष की बर्खास्तगी की मांग हुई. फिर पत्र लीक की जांच समिति बनी. समिति ने इस मामले में सेनाध्यक्ष को क्लीन चिट दी, पर आज तक यह नहीं बताया गया कि 12 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री को लिखी यह चिट्ठी लीक किसने की? क्यों हम दोषियों तक नहीं पहुंचते? या उन्हें जान कर बचाते हैं? अब रक्षा मामलों की संसदीय समिति की रिपोर्ट आ गयी है.

रिपोर्ट की दो लाइनें पढ़ें. ‘सेना के पास गोला-बारूद और हथियारों की भारी कमी है. ये कमियां देश की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी हैं’. समिति ने यह भी बताया कि ‘हेलीकॉप्टर से लेकर टैंक बेड़े के पास गोला-बारूद खत्म होने की स्थिति में है. हवाई सुरक्षा के लगभग 97 फीसदी उपकरण बेकार हैं. पैदल सेना के साथ, विशेष सैन्य बल के पास भी जरूरी हथियारों की कमी है’. सतपाल महाराज की अध्यक्षता वाली इस समिति ने खरीदारी प्रक्रिया को बेहद धीमी और जटिल पाया है. समिति ने यह सब सीधे सरकार की कमजोरी के रूप में पाया है. समिति के अनुसार देनदारी चुकाने में ही रक्षा बजट का पैसा जा रहा है.

2012-13 में महज 5520 करोड़ रुपये ही नयी खरीद के लिए थे. 66032 करोड़ रुपये पुरानी देनदारियां थीं. समिति के अनुसार भारत जीडीपी के अनुपात में पाकिस्तान, रूस, चीन, अमेरिका और फ्रांस से भी कम खर्च रक्षा मद में कर रहा है. समिति ने सिफारिश भी की है कि सेना प्रमुख को 200 करोड़ रुपये की खरीद का अधिकार मिले. फिलहाल 50 करोड़ है. समिति यह भी मानती है कि सेना से अवकाश लेने के पांच वर्ष बाद तक प्राइवेट नौकरी पर रोक लगे. समिति ने यह भी महसूस किया कि दो तरफ से हमला हुआ, तो भारत की स्थिति और दयनीय होगी. सेना के पास 18 चीता, एक चेतक, 76 एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर, और 60 एडवांस लाइट हेलीकाप्टर (हथियारों से लैस) की कमी है.

समिति के अनुसार 16-17 जनवरी 2012 की रात सेना की दो टुकड़ियों की दिल्ली कूच की खबर (इंडियन एक्सप्रेस) काल्पनिक और निराधार है. समिति ने पाया कि सेना की गश्ती प्रशिक्षण के लिए थी. खराब मौसम में भी सेना की तैयारी परखना मकसद था. ऐसी गश्ती के पहले रक्षा मंत्रलय से अनुमति मांगने या उसे सूचित करने का आदेश नहीं है. यह सरकार और संसदीय समिति का निष्कर्ष है. दरअसल, किसी जागरूक मुल्क में हंगामा या बवंडर तो संसदीय समिति की रिपोर्ट के तथ्यों पर होना चाहिए. सेना है, पर हथियार नहीं. पैसा है, पर बारूद नहीं. सेना की बगावत की बू देनेवाली खबर छपती है और लोग उस पर बहस करते हैं. पर इसके गलत पुष्ट होने पर कोई बोलने को तैयार नहीं.

जनरल वीके सिंह के पत्र के एक-एक तथ्य सही पाये जाते हैं, पर जो सरकार इस हालत के लिए जिम्मेदार है या जो व्यवस्था इसके लिए दोषी है, उस पर एक लाइन की भी बात नहीं हो रही है. देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ हो रहा है, पर कोई बोलता नहीं. न सरकार में, न मीडिया में और न ही राजनीति में इन तथ्यों के उजागर होने पर बहस होती है. क्या हमें अपने मुल्क, अपनी आजादी, अपनी अस्मिता का बोध नहीं है?

– इंटेलिजेंस की खबर –

खबर देश के सबसे प्रमुख अंगरेजी अखबार में छपी. 8 अप्रैल 2012 को. भारतीय इंटेलिजेंस, पाकिस्तान में क्यों नहीं काम कर पाता? यह खबर किसी भी देशप्रेमी को बेचैन करनेवाली है. पर इस देश का शासकवर्ग जरा भी चिंतित नहीं. भारत सरकार, भारतीय इंटेलिजेंस को पाकिस्तान में गोपनीय जासूसी की इजाजत नहीं देती.

‘80 के दशक तक पाकिस्तान में, भारत की दो काउंटर इंटेलिजेंस टीमें (सीआइटी) तैनात थीं. पहली का काम था, पाकिस्तान में भारत विरोधी गतिविधियों पर निगाह रखना. दूसरी का काम था, खालिस्तानियों को बढ़ानेवाली ताकतों पर नजर रखना. जब इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री हुए, तो ये दोनों टीमें हटा ली गयीं. भारतीय इंटेलिजेंस अधिकारी मानते हैं कि यह फैसला नैतिक आधार पर किया गया. एकतरफा. इस फैसले ने हमें पंगु बना दिया.

रॉ के लोगों का मानना है कि हमारे देश में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है. अगर यह होती, तो भारत लश्कर-ए-तैयबा या अन्य आतंकी संगठनों, जिनका खुला मकसद है, भारत को तबाह और खत्म करना, उनकी गोपनीय सूचनाओं को एकत्र तो कर ही सकता था? हमने अपना इंटेलिजेंस तो बंद कर दिया, लेकिन पाकिस्तान की आइएसआइ ने अपना काम बंद नहीं किया. आतंकवादियों को पालना, भारत के खिलाफ उकसाना, आतंकवादी हमले कराना, यह सब चल रहा है. मुंबई हमले के अपराधी खुलेआम पाकिस्तान की सड़कों पर मीटिंग करते हैं. भारत को तबाह करने की धमकी देते हैं. आइएसआइ, हाफिज सईद को हर मदद देता है. दाऊद इब्राहिम को संरक्षण देता है.

उधर भारत साधु बन कर तमाशबीन है. क्या ऐसे मुल्क चलता है? अगर पाकिस्तान का आइएसआइ नैतिक आधार पर, भारत में आतंकी हमले न कराता, जासूसी न कराता, तब तो भारत को भी ठोस कदम उठाना चाहिए था. यह दोनों के लिए आदर्श स्थिति है. ऐसा होना चाहिए. पर एक आपको तबाह करने पर तुला है और दूसरा तबाह करनेवाले की योजनाओं की सूचना भी एकत्र करने का काम नहीं कर रहा. अब तो नयी टेक्नोलॉजी से अमेरिका में बैठ कर अमेरिकी एक-एक चीज पता कर लेते हैं. अगर हम इंटेलिजेंस टीम नहीं रखना चाहते, तो कम से कम ऐसी उन्नत टेक्नोलॉजी लायें.

किसी भी दूसरे मुल्क में यह सवाल, देश की राजनीति के लिए निर्णायक बन जाता. ऐसे सवाल देश के अस्तित्व से जुड़े होते हैं, पर इन सवालों पर चुप्पी का अर्थ समझ से परे है. सत्ता का अर्थ क्या महज अपनी कामनाओं को पूरा करना रह गया है या देश भी कहीं एजेंडे पर है?

– रामदेव जी की ताकत के स्त्रोत –

बाबा रामदेव ने सांसदों के लिए एक से एक चुनिंदा विशेषण इस्तेमाल किया है. पर सांसदों के अलावा जनता के बड़े तबके में आक्रोश नहीं है. बल्कि लोग इसे जायज मानते हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. क्योंकि अंतत: राजनेता या संसद ही देश को सर्वश्रेष्ठ बना सकते हैं. होना तो यह चाहिए कि ऐसे महत्वपूर्ण शासक तबके के खिलाफ अगर कोई एक गलत विशेषण इस्तेमाल करे, तो जन आक्रोश पैदा हो जाये. पर ऐसा नहीं हो रहा है.

यशवंत सिन्हा ने सही कहा कि जो सांसदों, राजनेताओं को आज जितना अधिक गाली दे रहा है, उसकी उतनी ही चर्चा हो रही है. इसका कारण क्या है? आजादी की लड़ाई में या आजादी के बाद कुछ दशकों तक राजनीतिज्ञ के बारे में कोई ऐसी बातें कहता, तो संसद तो बाद में, जनता की अदालत उसे निपटाती. क्योंकि उन राजनेताओं की ताकत थी, उनका तप, त्याग, पारदर्शी चरित्र और देश के लिए समर्पण. वे सत्ता के लिए बिकनेवाले लोग नहीं थे. आज चूंकि ब्लैकमनी से पार्टियां चल रही हैं, इसलिए उनके अंदर वह ईमानदारी, त्याग और सच का ताप नहीं है कि वे खड़े होकर कहें कि बाबा या अन्ना जैसे लोग गलत हैं.

29 अप्रैल 2012 को देश के सबसे बड़े अंगरेजी अखबार में एक महत्वपूर्ण लेख छपा. कैसे कालाधन, भारतीय राजनीति को भ्रष्ट कर रहा है? या तबाह कर रहा है? इस रिपोर्ट के अनुसार भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में तीस हजार करोड़ ब्लैकमनी हर साल प्रवेश करती है. इसका अधिकांश हिस्सा चुनाव लड़ने के लिए खर्च होता है या वोट खरीदने में. एक राजनीतिक दल चलाने मे कितना खर्च होता है? अगर आप कांग्रेस पार्टी की ताजा आडिटेड बैलेंसशीट देखें, तो 2009-10 में कुल 525.97 करोड़ खर्च हुए हैं. यह पार्टी 35 राज्यों (केंद्रशासित प्रदेशों सहित) में फैली है. हर साल औसतन सात विधानसभा चुनाव लड़ती है. इस तरह भाजपा का 2009-10 की आडिटेड बैलेंसशीट में खर्च कुल 261.7 करोड़ है.

हाल के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने मिल कर लगभग एक हजार प्रत्याशियों को उतारा. चुनाव आयोग के अनाधिकारिक आकलन के अनुसार एक प्रत्याशी का औसत खर्च प्रति विस क्षेत्र में ढाई से पांच करोड़ है. लोकसभा के लिए पांच करोड़ से बीस करोड़ के बीच. आधिकारिक रूप से एक विधानसभा प्रत्याशी 20 लाख खर्च कर सकता है और एक लोकसभा प्रत्याशी 40 लाख. हर विधानसभा क्षेत्र में खर्च को लेकर चुनाव आयोग का जो कमतर आकलन है, 2.50 करोड़, उसको ही आधार बना लें, तो बीजेपी और कांग्रेस के एक हजार से अधिक प्रत्याशियों के 2500 करोड़ खर्च हुए होंगे. दो महीनों के अंदर. इन पांच विधानसभा चुनावों में.

अगर बसपा, सपा, पंजाब के चुनाव वगैरह को जोड़ दें, तो जनवरी 2012 से मार्च 2012 के बीच चार हजार करोड़ का यह कुल खर्च आयेगा. इसमें पार्टियों को चलाने का खर्च भी जोड़ दें, तो सही स्थिति स्पष्ट होगी. कांग्रेस और भाजपा जैसी दो बड़ी पार्टियों को चलाने का सालाना खर्च न्यूनतम पांच हजार करोड़ होगा. उनके घोषित खर्च और उपलब्ध बैलेंसशीट से 10 गुना अधिक. यह पैसा आता कहां से है? यह ब्लैकमनी है. विशेषज्ञों के अनुसार भारत की जीडीपी 89 लाख करोड़ (1.78 ट्रिलियन डालर) का एक तिहाई ब्लैकमनी है. यानी तीस लाख करोड़ (छह सौ बिलियन डॉलर). इसमें से तकरीबन 30 हजार करोड़, हर साल राजनीतिक व्यवस्था में पहुंचता है. यह पीडीएस, मनरेगा, भारत निर्माण, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) प्रोजेक्ट या अन्य कामों से अलग है.

2जी स्पेक्ट्रम या कामनवेल्थ घोटाले से अलग. राजनीतिक दल कर मुक्त हैं. वे एक पैसा टैक्स नहीं देते. लगभग 3.5 करोड़ भारतीय आयकर देते हैं. भारत की विषमता भी अद्भुत है. भारत के दस सबसे संपन्न लोगों की संपत्ति कुल जीडीपी का छह फीसदी है (114.50 बिलियन डॉलर). अमेरिका में दस सबसे संपन्न लोगों की संपदा वहां की जीडीपी के मुकाबले महज दो फीसदी है (311.30 बिलियन डॉलर). एक गरीब देश में इस ब्लैकमनी ने किस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था, राजनीतिक प्रणाली को तबाह कर दिया है, इसलिए इसके जिम्मेदार शासक और राजनीतिज्ञ हैं. यही चीज बाबा रामदेव को ताकत दे रही है. राजनीति, राजनेता और संसद का दायित्व है कि वे अपनी गरिमा बढ़ायें. तब बाबा रामदेव या अन्ना हजारे का नारा कमजोर होगा.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. यह खबर प्रभात खबर में छप चुका है वहीं से साभार लिया गया है.

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