असीम और आलोक दोस्त हैं, ये उनकी आपस में पहचान है लेकिन मेरे लिए असीम और आलोक वो दो युवा हैं, जिनमें हमारे मुस्तकबिल की वो उम्मीदें दिखती हैं, जिनको देखने की हमारी पिछली पीढ़ी में हिम्मत ही नहीं थी, लेकिन हमारी पीढ़ी जिसके सपने देखते बड़ी हुई। पर हमारे लिए हमेशा वो सपना, सपने जैसा ही था, हम हमेशा ये ही सोचते रहते कि आखिर कौन लड़ेगा इस सपने के लिए, क्योंकि हमारे पितृ सत्तात्मक परिवारों ने हमेशा हमें सच के साहस की जगह मिथ्या अहम से ही नवाजा, हम बड़े हुए सिर्फ आवश्यक्ताओं से अधिक सुविधाओं को इकट्ठा करने की जद्दोजहद के बीच और हमें शिक्षा मुहैया कराई गई सिर्फ नौकरी पाने के लिए। साफ था कि हमारी पिछली पीढ़ी हमारे अंदर उसी कायरता और नपुंसकता के बीज बो रही थी, जिसे वो उम्र भर जीती आई थी। लेकिन समय हमेशा उत्परिवर्तन लाता है, और पत्थरों में भी अंकुर फूटना केवल मुहावरा नहीं है, लेकिन फिर भी असीम और आलोक मैं चाहता हूं कि तुम ये लड़ाई छोड़ दो।
मेरी बात का बिल्कुल बुरा मत मानना पर ये समझ लो कि ये लोग इस लायक ही नहीं हैं कि इनके खिलाफ लड़ा जाए। वो लोग जिनके लिए बड़ी गाड़ी, बड़ा घर और विदेशों में छुट्टियों के आगे के लक्ष्य ही न बचते हों, क्यों लड़ा जाए आखिर उनके लिए। क्यों उनके हक की आवाज़ बुलंद की जाए, जो अपने लिए ही लड़ने वालों की कद्र और फिक्र न करते हों। असीम और आलोक तुम दोनों आज अस्पताल में पड़े हो और सूखी पत्तियों से ढंकी हुई तुम्हारी जो दरी जंतर मंतर पर बिछी है, सच बताना कितने तथाकथित सरोकारी लोगों ने उसे बैठ कर मैला करने की हिम्मत दिखाई? ये केवल ढोंगी हैं, ये इंतज़ार करते हैं युवा आंदोलनकारियों के शहीद हो जाने का और उसके बाद अपने एनजीओवादी एजेंडों को उन लाशों पर साधने का। हेमचंद्र के साथ इन्होंने ये ही होने दिया, बिनायक सेन के साथ इनमें से कितने खुल के खड़े हुए और तुम कैसे सोचते हो कि ये तुम्हारे साथ आएंगे?
असीम और आलोक लड़ाई लड़ रहे हैं एक कानून के खिलाफ, आईटी एक्ट 2011 के खिलाफ, उसमें हुए उस संशोधन के खिलाफ जो आपकी अभिव्यक्ति के आखिरी बचे ईमानदार माध्यम य़ानी कि वर्ल्ड वाइड वेब पर भी सरकार की असीमित और अराजक सेंसरशिप को काबिज़ करवा देता है। जो साफ तौर पर संविधान के सारे अभिव्यक्ति की आज़ादी के आर्टिकल्स के साथ साथ संविधान की प्रस्तावना-उसकी आत्मा को भी मारने की साज़िश करता है। लेकिन क्या फर्क पड़ता है आफ लोगों को, आप कौन सा इंटरनेट का इस्तेमाल अभिव्यक्ति के लिए करते हैं, बल्कि अभिव्यक्त करने की ज़रूरत ही क्या है?

हां मैं जानता हूं कि आप में से ज़्यादातर को राजनीति में दिलचस्पी नहीं है, तब भी नहीं जब वो आपका और आपके परिवार का मुस्तकबिल तय करती हो… आप धरने-प्रदर्शन में रुचि नहीं रखते, क्या फ़ायदा फ़र्ज़ी बवाल से… अनशन करना भी क्या बेवकूफी है, क्या होता है उससे? दरअसल ये सारे नियम तब बदलते हैं, जब मंदी लौटती है और आपको आपकी ही बहुराष्ट्रीय कम्पनी बिना नोटिस दिए निकाल फेंकती है… और फिर आप राजनीति को कोसते हैं, आप धरना-प्रदर्शन करना चाहते हैं और आपको विरोध के तरीके समझ में आते हैं। दरअसल हम सब सुविधाभोगी हैं और अपनी सुविधा के अनुसार ही धर्म से लेकर राजनीति तक का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी रखते हैं, ठीक उन्हीं नेताओं की तरह जिन्हें हम क़त्ल कर देना चाहते हैं।
और इसीलिए आप इंतज़ार करते हैं कि आपकी लड़ाई असीम और आलोक जैसे आपकी नज़रों में तथाकथित मूर्ख लड़ते रहें, आप इंतज़ार करते हैं कि वो दिन आए जब आप बिल्कुल पंगु कर दिए जाएं और तब तक आप एक नारा भी बुलंद नहीं करते हैं, जब तक पानी आपकी नाक में न घुसने लगे। औऱ फिर आप चिल्लाते हैं…मदद मांगते हैं…और कोई आपकी मदद के लिए नहीं आता है, क्योंकि आप भी तो ये ही कर रहे थे, वो भी वही कर रहे होते हैं।
असीम और आलोक 5 दिन से एक ऐसे कानून के खिलाफ अनशन पर हैं, जो आगे जाकर देश में आवाज़ की आज़ादी का गला घोंटेगा। पिछले 36 घंटे से इन्होंने पानी भी नहीं पिया है, तबीयत बिगड़ने से दोनों आरएमएल अस्पताल में भर्ती हैं, लेकिन आप मत जाइएगा उनके पास। कहीं गलती से वो आपसे कोई उम्मीद पाल बैठे तो? या फिर कहीं आपको उनको देख खुद पर शर्म आ गई तो? कहां हैं हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट… कहां हैं देश की पहरुआ टीम अन्ना? कहां हैं देश के सर्वहारा के सहारे हमारे कामरेड?
फिलहाल असीम त्रिवेदी और आलोक दीक्षित को भूखे रहने और डीहाइड्रेशन से तबीयत काफी बिगड़ जाने की वजह से जंतर मंतर पर मौजूद पुलिसफोर्स ने ज़बरन राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती करा दिया है। असीम और आलोक आईटी एक्ट 2011 में गुपचुप संशोधन के द्वारा इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलने की सरकारी साज़िश के खिलाफ़ पिछले 5 दिन से जंतर मंतर पर अनशन पर बैठे थे… और पिछले 24 घंटों से उन्होंने जल भी त्याग दिया था… देखिए ज़रा कि कैसे देश के दो युवा जो सुनहरे करियर को चुन सकते थे… भूख से बीमार हो अस्पताल पहुंच जाते हैं… और सरकारों के कानों पर जूं नहीं रेंगती… सरकार जो जनता के लिए है… जनता के द्वारा है… और जनता की है… संविधान जो कुछ कहता है, अब मज़ाक सा लगने लगा है… अभिव्यक्ति की आज़ादी और नीति निर्देशक तत्वों को सरकारों ने एक बेकार का मज़ाक बना दिया है… संविधान की आत्मा, उसकी प्रस्तावना को ठेंगा दिखाया जाता है… आवाज़ बचाने की ये लड़ाई फिलहाल जारी है… असीम और आलोक अस्पताल से अनशन जारी रखने का एलान कर चुके हैं… लेकिन सवाल आपसे है कि कितने असीम और आलोक कुर्बानी दें कि आप जागेंगे… आपकी चुप्पी और उपेक्षा ने आपके लिए सवाल खड़े किए हैं… कब तक असंवेदनशील रहेंगे… कैसे समाज को बनाएंगे… कैसी दुनिया देकर
जाएंगे अपनी आने वाली पीढ़ी को… इंतज़ार रहेगा कि कल को आपके घर भी असीम और आलोक पैदा हों… और तब भी आप ऐसी ही असंवेदनशीलता दिखाने की हिम्मत जुटा पाएं…. असीम और आलोक अभी भी आपकी लड़ाई लड़ रहे हैं… आपका इंतज़ार चिरकाल तक रहेगा… आखिरी सांस रहने तक…।
लेखक मयंक सक्सेना टीवी जर्नलिस्ट हैं. कई चैनलों में काम करने के बाद इन दिनों न्यूज24 को सेवाएं दे रहे हैं.





