तर्कसंगत और व्यावहारिक सुधारों के उलट काम करने की यूपीए सरकार और इसके ओहदेदारों की आदत बन गई है. 30 अप्रैल को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने एक आदेश जारी किया और इसमें केबल टेलीविजन नेटवर्क्स (नियमन) संशोधन कानून दिसंबर 2011 को लागू करने के तौर-तरीकों का ब्योरा देने को कहा गया. आदेश की एक विवादास्पद धारा ने ब्रॉडकास्टिंग बिजनेस खासतौर से टीवी न्यूज को मुश्किल में डाल दिया है. इससे एक अच्छे कानून या सुधार के बेपटरी होने का खतरा खड़ा हो गया है.
2011 के इस कानून का मुख्य मकसद है कि केबल टेलीविजन नेटवर्क एक तय समय अवधि के भीतर पुरानी एनालॉग टेक्नोलॉजी की बजाय नई डिजिटल टेक्नोलॉजी को अपनाएं. देश के चार मेट्रो शहरों के लिए यह समय सीमा जुलाई 2012 है. जबकि पूरे देश में इसे साल 2014 तक लागू करना है. टेक्नोलॉजी बदलने से केबल नेटवर्क्स को क्षमता के लिहाज से राहत मिलेगी, जिसकी वजह से वे फिलहाल सीमित संख्या में चैनल्स प्रसारित कर पा रहे हैं.
एनालॉग सिग्नल सिस्टम में किसी एक चैनल के प्रसारण के लिए 7-8 मेगाहर्ट्ज बैंडविड्थ की जरूरत होती है जबकि डिजिटल सिस्टम में इतनी ही बैंडविड्थ पर 10-15 चैनलों को प्रसारित किया जा सकता है. डिजिटल सिस्टम में दर्शकों के पास देखे जाने वाले चैनलों के मामले में कहीं ज्यादा विकल्प होंगे. डिजिटाइजेशन से दर्शकों को बेहतर पिक्चर क्वालिटी और हाई डेफिनीशन जैसी सहूलियत मिलेगी. साथ ही साउंड क्वालिटी भी बेहतर होगी. क्षमता में 10-15 गुना इजाफे से इंडस्ट्री को कारोबार आगे बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है. ऐसी उम्मीद थी कि डिजिटाइजेशन से ब्रॉडकास्टर्स को पुराने सिस्टम के जबरिया फीचर-कैरिज फी से छुटकारा मिल जाएगा. ब्रॉडकास्टर्स को मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स (एमएसओ) को भुगतान करना होता है.
मिसाल के तौर पर देश भर में प्रमुख केबल नेटवर्क्स पर मालिकाना हक रखने वाले हैथवे और डिजिकेबल फ्रेंचाइजी के रूप में मोहल्ले के केबल ऑपरेटर्स को सर्विसेज देते हैं और अपने सिग्नल को घरों तक पहुंचाते हैं. चूंकि, एमएसओ की सिग्नल ट्रांसमिट करने की क्षमता सीमित होती है, ऐसे में कैरिज फीस एक तरह की प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया है जो कि इस बात को सुनिश्चित करती है कि ब्रॉडकास्टर का चैनल दर्शकों तक पहुंचे. ट्राई के आदेश की धारा में कैरिज फी हटाने की बजाय इसे बनाए रखने की अनुमति देने की बात कही गई है. कैरिज फीस ब्रॉडकास्टर्स का वित्तीय बोझ बढ़ाने वाली है, खासतौर से न्यूज चैनलों का, जो निःशुल्क अपनी सेवाओं का प्रसारण करते हैं. आदेश की धाराओं के मुताबिक, प्राधिकरण ने फैसला किया है कि हर एमएसओ एक कैरिज फी तय कर सकता है. यह भी कहा गया है कि डिजिटल एड्रेसेएबल केबल टीवी सिस्टम लागू करने में मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों के किए गए बड़े निवेश और चैनलों की कैरिज कास्ट के बोझ को ब्रॉडकास्टर्स भी साझा करें.
इस आदेश को लेकर द न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) खासी नाराज है. एसोसिएशन ने 1 मई को जारी बयान में कहा है कि यह कैरिज फीस ब्रॉडकास्टर्स को गलत तरीके से दंडित करती है और इससे ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है. टाइम ब्रॉडकास्टिंग के सीईओ सुनील लुल्ला का अनुमान है कि हर साल कैरिज फीस करीब 2,500-3,000 करोड़ रु. पड़ती है. उनका कहना है कि इस रकम के आधे हिस्से का भुगतान न्यूज ब्रॉडकास्टर्स करते हैं. एनडीटीवी के एग्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन और एनबीए के प्रेसिडेंट केवीएल नारायण राव का कहना है कि ''कैरिज फीस किसी न्यूज ब्रॉडकास्टर की कुल लागत के 30 फीसदी के बराबर तक हो सकती है. ऐसे में यह एक बड़ा बोझ है. इस रकम का इस्तेमाल कंटेंट सुधारने में किया जा सकता है.'' दूसरे ब्रॉडकास्टर्स की तरह राव कैरिज फीस को खत्म करने की उम्मीद कर रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि यह एक्ट पूरी तरह से केबल ऑपरेटरों के पक्ष में है.
लेकिन ऑपरेटर इससे सहमत नहीं हैं. एमएसओ अलायंस के प्रेसिडेंट अशोक मनसुखानी का कहना है कि नई टेक्नोलॉजी लागू करने की पूरी लागत भला अकेले ऑपरेटर्स ही कैसे उठा सकते हैं? 10 करोड़ घरों के लिए इसकी लागत करीब 35,000 करोड़ रु. है. उनका तर्क है चूंकि डिजिटाइजेशन का फायदा ब्रॉडकास्टर्स को भी होगा, ऐसे में उन्हें भी इस बोझ को साझा करना चाहिए. उनका कहना है कि ब्रॉडकास्टर्स खासतौर से एनबीए इसका सबसे ज्यादा विरोध कर रहा है. लेकिन ज्यादा दर्शक और मजबूत सब्सक्रिप्शन बेस से उसे ही इसका सबसे ज्यादा फायदा होगा. इन दोनों चीजों का इस्तेमाल ज्यादा विज्ञापन आमदनी हासिल करने में किया जा सकता है. इसका इकलौता विकल्प ग्राहकों से ऊंचा शुल्क वसूलना है. लेकिन मनसुखानी बढ़ा हुआ बोझ ग्राहकों पर नहीं डालना चाहते हैं.
ट्राई का आदेश इस तर्क को स्वीकार करते हुए स्पष्ट करता है कि कैरिज फीस नई टेक्नोलॉजी लाने और मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों की क्षमता बढ़ाने पर आने वाले खर्च को वहन करे, ऐसी उसे अपेक्षा है. ट्राई के सचिव राजीव अग्रवाल का कहना है, ''हमने ब्रॉडकास्टर्स पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं डाला है. कैरिज फीस पहले से ली जा रही है.'' हालांकि ट्राई का दावा है कि उसने व्यवस्था को और पारदर्शी बना दिया है. 30 अप्रैल के आदेश में कहा गया है कि हर मल्टी सिस्टम ऑपरेटर एक रेफरेंस इंटरकनेक्ट ऑफर छापेगा. इसमें उसे अपनी कैरिज फीस की जानकारी देनी होगी, जिसको कि एक समान, गैर भेदभावपूर्ण और पारदर्शी तरीके से लागू किया जाना चाहिए. हालांकि, लुल्ला ट्राई के तर्क से असहमत हैं. उनका कहना है कि ''अगर आप किसी खास बिजनेस में हैं तो आपको उसमें निवेश करना पड़ता है. उस निवेश का बोझ भला दूसरों पर क्यों डाला जाना चाहिए?''
अग्रवाल मानते हैं कि जब ब्रॉडकास्टर्स को अपनी हर राय रखने का अधिकार है तो ऐसे में किसी तरह का विवाद नहीं होना चाहिए. उनका तर्क है कि जैसे ही मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों की क्षमता बढ़ेगी कैरिज फीस लेने से जुड़ी उनकी मोलभाव की क्षमता घटेगी. उनका कहना है, ''मौजूदा समय में वे कैरिज फीस ले सकते हैं क्योंकि अभी उनकी क्षमता बहुत सीमित है. क्षमता बढ़ाने के लिहाज (औसतन 200 से 500 चैनल) से हमने इसे अनिवार्य बना दिया है. उनका कहना है कि क्षमता बढ़ाने के बाद उन्हें चैनल्स के पास जाना होगा और सिग्नल मांगने होंगे. तब मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों की बाजार को प्रभावित करने की ताकत सीमित हो जाएगी.'' लेकिन राव इन बातों से आश्वस्त नहीं हैं.
लुल्ला का कहना है कि दिशा निर्देश पूरे विवरण के साथ तैयार नहीं किए गए हैं. ऐसे में अगर मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों को कैरिज फीस का भुगतान नहीं किया जाता है तो वे चैनल का प्रसारण करने से मना कर सकते हैं. उनके मुताबिक, ''मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं होती, अगर ट्राई ने यह कहा होता कि 500 चैनलों से ज्यादा लेने पर कैरिज फीस ली जा सकती है, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है.''
राव का तर्क है कि प्राधिकरण को इससे जुड़ी उलझनों को लेकर सफाई पेश करनी चाहिए, ताकि किसी भी अनिश्चितता से बचा जा सके. उन्होंने कहा कि 30 अप्रैल के दिशा निर्देश में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि कैरिज फीस क्या होनी चाहिए? राव के मुताबिक, ''ट्राई का यह भी कहना है कि कैरिज फीस के उचित न होने पर ही वह इस मामले में दखल देगा. लेकिन अहम सवाल यह है कि यह कौन बताएगा कि कैरिज फीस कब अनुचित है?''
लुल्ला एक दूसरी समस्या की ओर इशारा करते हैं,''मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों का व्यवहार अनुचित होने की स्थिति में ट्राई में उनके खिलाफ अपील करने की प्रक्रिया में वक्त लगेगा. इसमें एक महीने या इससे कहीं ज्यादा का वक्त लग सकता है. इस बीच की अवधि के दौरान क्या होगा? क्या इस अवधि में चैनल का प्रसारण बंद हो जाएगा? ऐसी स्थिति बनने पर इसका खामियाजा कंज्यूमर और ब्रॉडकास्टर को भुगतना होगा. साथ ही ब्रॉडकास्टर के दर्शकों की संख्या में गिरावट आएगी.''
ट्राई पीछे हटने को तैयार नहीं है. अग्रवाल का कहना है, ''हम अपने सभी आदेशों को अच्छी तरह से विचार करने के बाद जारी करते हैं.'' नियामक संस्था ट्राई का यह आदेश इसके चेयरमैन जे.एस. सरमा के कार्यकाल के तीन साल पूरा करने के महज दो हफ्ते पहले आया है. सरकारी नियम उन्हें दूसरे कार्यकाल की इजाजत नहीं देते हैं. ट्राई के अगले चेयरमैन 15 मई के बाद कार्यभार संभालेंगे, उन्हें अपने पूर्ववर्ती आदेशों के परिणामों को झेलना होगा. सरकार और रेगुलेटर चीजें दुरुस्त करने में नाकाम रहे हैं. इसका कंज्यूमर और बिजनेस पर असर पड़ेगा. हालांकि, नए टेलीकॉम रेगुलेटर के पास सुधार करने का मौका होगा. (साभार : इंडिया टुडे)





