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हिंदुस्तान में राजीव वर्मा और अमर उजाला में अजय उपाध्याय के दिन हुए पूरे?

: कानाफूसी : दो चर्चाएं इन दिनों जोरों पर है. हिंदुस्तान और एचटी में सीईओ के रूप में लंबे समय से काम देख रहे राजीव वर्मा के बारे में पता चला है कि उनके दिन पूरे हो गए हैं और प्रबंधन उनसे पिंड छुड़ाने की तैयारी में है. खासकर हिंदी बिजनेस की दशा-दिशा से प्रबंधन राजीव वर्मा से काफी नाराज है. हिंदुस्तान अखबार की दिन प्रतिदिन गिरती साख और अपेक्षित बिजनेस व प्रसार न मिलने से एचटी मैनेजमेंट किसी ऐसे शख्स की तलाश में है जो पूरे वेंचर को नई उंचाइयों पर ले जाए. राजीव वर्मा कई वर्षों से हिंदुस्तान ग्रुप में हैं. कई संपादक आए गए लेकिन राजीव वर्मा अपने पद पर जमे रहे. पर बताया जाता है कि अब उनकी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है.

: कानाफूसी : दो चर्चाएं इन दिनों जोरों पर है. हिंदुस्तान और एचटी में सीईओ के रूप में लंबे समय से काम देख रहे राजीव वर्मा के बारे में पता चला है कि उनके दिन पूरे हो गए हैं और प्रबंधन उनसे पिंड छुड़ाने की तैयारी में है. खासकर हिंदी बिजनेस की दशा-दिशा से प्रबंधन राजीव वर्मा से काफी नाराज है. हिंदुस्तान अखबार की दिन प्रतिदिन गिरती साख और अपेक्षित बिजनेस व प्रसार न मिलने से एचटी मैनेजमेंट किसी ऐसे शख्स की तलाश में है जो पूरे वेंचर को नई उंचाइयों पर ले जाए. राजीव वर्मा कई वर्षों से हिंदुस्तान ग्रुप में हैं. कई संपादक आए गए लेकिन राजीव वर्मा अपने पद पर जमे रहे. पर बताया जाता है कि अब उनकी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है.

राजीव वर्मा की उल्टी गिनती शुरू होने के कारण लोग शशि शेखर के भविष्य पर भी अटकले लगा रहे हैं. वैसे भी हिंदुस्तान अखबार में प्रधान संपादक अब तीन साल से ज्यादा नहीं रहा करेंगे, ऐसी अघोषित नीति शोभना भरतिया ने बना दी है. इसके पीछे वजह है अखबार में लगातार इन्नोवेशन करते रहना. कोई भी प्रधान संपादक तीन साल में अपनी पूरी मेधा और विजन का प्रदर्शन कर देता है. इसके बाद उसके पास आइडियाज और विजन के लेवल पर कुछ बचता नहीं. ऐसे में कारपोरेट मीडिया हाउसेज ने यह अघोषित नीति बना ली है कि किसी भी संपादक को तीन साल बैटिंग करने का पूरा मौका देना है और उसे इन तीन वर्षों में हर तरह की छूट देना है ताकि वह अपने विजन को जमीनी स्तर पर एक्जीक्यूट करा सके.

शशि शेखर के आने के बाद से हिंदुस्तान अखबार की क्वालिटी में काफी गिरावट आई है. आफिस के कामकाज का माहौल भी खराब हुआ है. पहले हिंदुस्तान आफिस में एक डेमोक्रेटिक व फ्रेंडली माहौल हुआ करता था जहां लोग बिना डर भय के अपना काम संपादित करते थे. आज के समय में स्थिति ठीक उलट है. हर आदमी आशंकित रहता है कि कहीं उसकी बेइज्जती न कर दी जाए. स्वतंत्र विचार व सोच रखने वालों को अपमानित किया जाता है और बिलो द एवरेज किस्म के लोगों को खूब प्रश्रय दिया जाता है. इस कारण अखबार में क्वालिटी लेवल पर काफी गिरावट आई है. देखना है कि राजीव वर्मा और शशि शेखर की उल्टी गिनती का अंत कब होता है. हालांकि इंडस्ट्री में बड़े पदों पर आसीन लोगों को लेकर किसी न किसी किस्म की अफवाह व कयासबाजी हर समय होती रहती है लेकिन इस बार की चर्चाएं में कुछ दम बताया जा रहा है.

उधर, अमर उजाला से खबर है कि अजय उपाध्याय बनाम यशवंत व्यास की जंग में अजय उपाध्याय का पलड़ा काफी कमजोर हो गया है. प्रबंधन भी अब यशवंत व्यास को ज्यादा अधिकार देने के मूड में है क्योंकि एक्जीक्यूशन को लेकर अजय उपाध्याय के मोर्चे से काफी शिकायतें आ रही हैं. सूत्रों के मुताबिक पिछले कुछ हफ्तों से अमर उजाला के संपादकीय विभाग में शीर्ष स्तर के टकराव का नतीजा निकलता दिख रहा है. अजय उपाध्याय का पराभव शुरू हो चुका है. उनके इलाके में यशवंत व्यास के लोगों की तैनाती की जा चुकी है. अजय उपाध्याय के पास सेंट्रल डेस्क समेत कई तरह के काम थे जिसे अब यशवंत व्यास के करीबियों के जिम्मे कर दिया गया है. पिछले दिनों हुए कई संपादकों के फेरबदल के क्रम में नोएडा में संपादकीय के पावर बैलेंस में भी बदलाव किया गया. यशवंत व्यास को ज्यादा जिम्मेदारियां दी गई और अजय उपाध्याय से काफी कुछ काम ले लिया गया. अभी यह ठीक ठीक नहीं पता चल सका है कि इन दिनों अजय उपाध्याय अमर उजाला में किस भूमिका में हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने उन्हें किनारे करके संकेत दे दिया है कि अगले कुछ महीने में वे स्वयं कहीं कुछ तलाश लें या फिर उपेक्षित रहकर काम करने के लिए तैयार रहें.

कानाफूसी कैटगरी की खबरें चर्चाओं और सुनी सुनाई बातों पर आधारित होती है. कृपया तथ्यों की अपने स्तर पर भी जांच कर लें. अगर आपको उपरोक्त संबंध में कोई नई जानकारी देनी है तो [email protected] पर मेल कर सकते हैं. आपका नाम पता पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

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