आपने भड़ास फार मीडिया के चार साल पूरे होने पर जो लेख लिखा है उसमें बार-बार मोक्ष शब्द का इस्तेमाल किया है। मोक्ष के बारे में भगवत गीता में भगवान कृष्ण ने जो कहा है, उससे आप परिचित ही होंगे। इसके अलावा सारे उपनिषद भी विस्तार से इसे बताते हैं। मुझे लगता है कि मोक्ष यह नहीं है कि बहुत हो गया, मन भर गया, या मन अघा गया या मन ऊब गया या सब कुछ व्यर्थ है, इसलिए हम मोक्ष की ओर चले गए। मोक्ष का बड़ा व्यापक और गहरा अर्थ है। यह मैं आपका विरोध नहीं कर रहा हूं। बस मन में विचार आए, उसे व्यक्त कर रहा हूं। आपका चार साल का संस्मरण अच्छा तो लगा लेकिन मोक्ष शब्द का बार-बार इस्तेमाल खटका, इसलिए विनम्रतापूर्वक इसका उल्लेख कर रहा हूं। इसे आप कतई तीखी प्रतिक्रिया न मानें। यदि आप इस टिप्पणी को इग्नोर करना चाहें तो मुझे बुरा नहीं लगेगा।
भड़ास फार मीडिया के माध्यम से आपने एक नया प्रयोग किया और वह हिट हो गया, इसलिए मैं आपका आदर करता हूं। यह आपकी सनक हो या आपकी प्रतिभा, लेकिन मीडिया की वे खबरें जो छुपी रहती थीं क्योंकि उनके लिए कोई प्लेटफार्म नहीं था, आपने उन्हें हेडलाइन बना दिया। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं, आदर के पात्र हैं। आपने लिखा है कि संघर्ष के दिन थे और आज भी हैं। हां, यह सच है। कोई भी नया प्रयोग करने वाला, अकेले संघर्ष करने वाला, इन कठिनाइयों से गुजरता है। दुख उठाता है। उसका परिवार भी उस आंच से अछूता नहीं रहता। संघर्ष सिर्फ साढ़े तीन अक्षर का कोरा शब्द नहीं है। यह एक कठिन दौर का प्रतीक है। लेकिन हां, यह मनुष्य को खांटी सोना भी बना देता है। जब आपका संघर्ष जेनुइन होता है तो लोग भी जुड़ते जाते हैं। लाइक माइंडेड लोग आपकी मदद के लिए तैयार होने लगते हैं। एक नई मंडली तैयार हो जाती है। आप संघर्ष जारी रखिए। लाइक माइंडेड लोग आपके साथ हैं। बस लक्ष्य अच्छा हो। भाई मैंने कहीं प्रवचन टाइप बातें तो नहीं लिख गया। अगर ऐसा है तो क्षमा करेंगे।
विनय बिहारी सिंह
वरिष्ठ पत्रकार
कोलकाता
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