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सुख-दुख...

दुनिया में सबके बाप मरते हैं, तुम्हारे बाप भी मरेंगे, इसमें नया क्या है, छुट्टी नहीं मिलेगी

यशवंत सर, सादर प्रणाम. भड़ास पर प्रकाशित करने के लिए प्रेषित कर रहा हूँ. यदि कोई सम्पादक काम कराने के बाद पैसा न दे तो क्या करना चाहिए? मेरे पास भी एक-दो सम्पादक ऐसे हैं, जिन्होंने काम करा लिया है, लेकिन पैसा देने में आना-कानी कर रहे हैं. मजे की बात देखिये कि जिस सम्पादक की बात मैं कर रहा हूँ, वह खुद को प्रतिष्टित संस्थानों में काम करने की बात कहकर लोगों को इम्प्रेस करते हैं. बुजुर्ग हैं. बुजुर्ग होने के नाते दुनिया उनका सम्मान करती है, लेकिन वह बुजुर्गियत की आड़ में लोगों का शोषण करने से भी बाज नहीं आते हैं.

यशवंत सर, सादर प्रणाम. भड़ास पर प्रकाशित करने के लिए प्रेषित कर रहा हूँ. यदि कोई सम्पादक काम कराने के बाद पैसा न दे तो क्या करना चाहिए? मेरे पास भी एक-दो सम्पादक ऐसे हैं, जिन्होंने काम करा लिया है, लेकिन पैसा देने में आना-कानी कर रहे हैं. मजे की बात देखिये कि जिस सम्पादक की बात मैं कर रहा हूँ, वह खुद को प्रतिष्टित संस्थानों में काम करने की बात कहकर लोगों को इम्प्रेस करते हैं. बुजुर्ग हैं. बुजुर्ग होने के नाते दुनिया उनका सम्मान करती है, लेकिन वह बुजुर्गियत की आड़ में लोगों का शोषण करने से भी बाज नहीं आते हैं.

टेस्ट और ट्रायल के नाम पर आपसे पांच से दस दिन तक काम करायेंगे. तनख्वाह हमेशा दस दिन लेट देंगे. आप पर झूठे रौब दिखाकर दबाव बनाने की कोशिश भी करेंगे और यदि आपने उनके शोषण से उकताकर काम छोड़ दिया तो वह बेचारे अपने सिद्धांत का हवाला देकर आपके काम के पैसे भी नहीं देंगे. कहेंगे हमारे एथिक्स में पैसा देना नहीं शामिल है. प्यारे दोस्तों, अग्रजों और गुरुजनों, आप ही बताइये ऐसे सम्पादक महोदय का क्या करना चाहिए. पहले आप उपाय बताइये मैं आप सबको उनका नाम भी बताऊँगा. फिलहाल इतना बता दूँ कि इस समय वह महाशय किसी हिंदी मैगज़ीन के सम्पादक हैं. 

इन सम्पादक महोदय की एक और खूबी बता दूँ कि फरवरी महीने में मेरे एक दोस्त सुभाष चन्द्र के पंचानबे वर्षीय पिताजी की हालत नाजुक थी. मुझे इस सम्पादक महोदय से उसी बेचारे ने जोड़ा था. सुभाष के बड़े भाई ने फ़ोन करके उसे गाँव बुलाया. सुभाष ने इस सम्पादक महोदय को वस्तुस्थिति बताकर छुट्टी देने की गुजारिश की. पता है इसके जवाब में सम्पादक महोदय ने क्या कहा? "दुनिया में सबके बाप मरते हैं, तुम्हारे बाप भी मरेंगे. इसमे नया क्या है. छुट्टी नहीं मिलेगी." बेचारा सुभाष नौकरी छोड़कर अपने पिताजी को देखने गाँव गया. संयोग देखिये कि उसके गाँव पहुँचने के दिन ही उसके पिताजी उस दुनिया से चल बसे.

यह सम्पादक हैं श्रीकांत त्रिपाठी इतवार के सम्पादक. यह सम्पादक कर्मचारियों से चौबीस से अडतालीस घंटे तक रेगुलर काम लेते हैं. कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं. बिना गलती के जलील करना इनकी आदत है. मैं भी काम के दबाव के कारण सात दिनों तक बीमार रहा. मेरे दो बेटों के कान में संक्रमण हो जाने से मैं अब तक परेशान हूँ. उन दोनों के इलाज में अब तक करीब दस हज़ार से ऊपर खर्च हो गए, लेकिन यह सम्पादक महोदय मेरे काम के पैसे देने में आना-कानी कर रहे है. आपसे अनुरोध है कि आप इसे प्रकाशित कर हमें अनुग्रहीत करने की कृपा करें.
आपका

विश्‍वत सेन

[email protected]


इन आरोपों के सदंर्भ में जब इतवार के संपादक श्रीकांत त्रिपाठी से बात की गई तो उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा कि आप जहां भी काम करते हैं वहां के कुछ नार्म्‍स होते हैं. आप कहीं जा रहे हैं, कार्यालय नहीं आ रहे हैं तो आप अपने इमिडिएट बॉस को सूचित करेंगे. क्‍योंकि बात जिम्‍मेदारी की होती है. लेकिन विश्‍वत सेन बिना सूचना दिए चले गए. अच्‍छी बात है कि जिसको जहां बेहतर अवसर मिलेगा जाएगा, पर कम से कम उसकी इतनी जिम्‍मेदारी तो बनती है कि इस बात की सूचना दे. परन्‍तु विश्‍वत ने इस तरह की कोई सूचना नहीं दी बल्कि कहें तो धोखा देकर चले गए. इतना बड़ा रकम बकाया नहीं है कि कंपनी उन्‍हें पैसे नहीं देगी, परन्‍तु उनका तरीका ठीक नहीं था.

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