प्रिय यशवंत, शाजी जमां के पक्ष में तुमने बहुत ज़ोरदार लिखा. मैं भी उसमें शामिल हो रहा हूं. लेकिन तुमने अपनी टिपिकल शैली में वार नहीं किया. शाजी पर ''कट्टर सुन्नी'' लिख कर जिस व्यक्ति ने हमला किया, उसका संबंध यक़ीनन जाहिलों की उस जमात से होगा, जिसका पढ़ाई-लिखाई से कभी कोई वास्ता नहीं रहा है. शाजी जमां की एक बड़ी लियाकत यह है कि वह बदीउज्जमां के सुपुत्र हैं. हर हिंदी वाले को उन पर गर्व होना चाहिए. बदीउज्जमां का उपन्यास ''छाको की वापसी'' उन्हें राही मासूम रज़ा और मंटो की कतार में पहुंचाता है. ''सभा पर्व'' पूरा करने से पहले उनका इंतकाल हो गया. उसे पूरा किया शाजी ने.
शाजी हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के अच्छे जानकर, काबिल और संतुलित पत्रकार एवं निहायत सेकुलर व्यक्ति हैं. लेकिन दुखी नहीं होना चाहिए. शाजी को कट्टर सुन्नी बताने वाली मानसिकता ने भारत का विभाजन करवाया और बाद में राष्ट्रपिता की हत्या भी. देशविरोधी, हत्यारी मानसिकता से किसी अच्छे काम की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए. हिंदू-मुस्लिम चश्मे से चीजों को देखने वालों का भारत माता पर कोई दावा नहीं हो सकता. साम्प्रदायिकता भारतीय राष्ट्र-राज्य का नकार है.
लेखक प्रदीप कुमार अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण समेत कई बड़े अखबारों में शीर्ष पदों पर रहे. इन दिनों स्तंभकार और विश्लेषक के रूप में कई मैग्जीनों-अखबारों से जुड़े हुए हैं. हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में पत्रकारिता की. विदेशी मामलों के एक्सपर्ट जर्नलिस्ट के रूप में ख्याति. प्रदीप जी से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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