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भड़ास के वट वृक्ष बनने में बड़ा योगदान यशवंत की जीवन संगिनी और बच्‍चों का भी है

ब्रांड्स के साथ भी आत्मीय रिश्ता बन जाता है। रिश्ता भी ऐसा कि वस्तुओं की पहचान एक खास ब्रांड से ही होने लगती है। जैसे गाड़ी का मतलब मारुति। चाय का मतलब ताज महल। वनस्पति घी का मतलब डालडा। ट्रैक्टर का मतलब एस्कार्ट, लेकिन बुलेट का मतलब सिर्फ बुलेट होता है। बुलेट का मतलब मोटर साइकिल नहीं होता, ऐसे ही पत्रकारिता की दुनिया में भड़ास का मतलब सिर्फ भड़ास ही होता है, कुछ और बिल्कुल भी नहीं।

ब्रांड्स के साथ भी आत्मीय रिश्ता बन जाता है। रिश्ता भी ऐसा कि वस्तुओं की पहचान एक खास ब्रांड से ही होने लगती है। जैसे गाड़ी का मतलब मारुति। चाय का मतलब ताज महल। वनस्पति घी का मतलब डालडा। ट्रैक्टर का मतलब एस्कार्ट, लेकिन बुलेट का मतलब सिर्फ बुलेट होता है। बुलेट का मतलब मोटर साइकिल नहीं होता, ऐसे ही पत्रकारिता की दुनिया में भड़ास का मतलब सिर्फ भड़ास ही होता है, कुछ और बिल्कुल भी नहीं।

गौरव की बात यह है कि मेरा उक्त सभी ब्रांड्स से वह आत्मीय रिश्ता है। भड़ास को देश-विदेश में लाखों लोग पसंद करते हैं। भड़ास के फैन भी लाखों हैं, पाठकों की संख्या भी लाखों में हैं और लेखक भी हजारों से कम नहीं हैं। भड़ास4मीडिया की स्थापना के चार वर्ष पूरे होने पर वह लाखों लोग भी बेहद खुश होंगे, ऐसे में मैं भी खुश हूं, तो इसमें नई बात कुछ नहीं है, पर नई बात यह है कि मैं भड़ास का सिर्फ पाठक नहीं हूं, सिर्फ फैन नहीं हूं, सिर्फ लेखक नहीं हूं, भड़ास से आत्मीय रिश्ता होने के कारण मुझे कुछ अलग तरह की अनुभूति हो रही है, जिसमें थोड़ा-थोड़ा सब है। उसको शब्दों का रूप दे पाना उतना ही कठिन है, जितना अपने अहसास का किसी और को अहसास न करा पाना।

स्थापना दिवस के अवसर पर भड़ास और भड़ास के संस्थापक यशवंत सिंह के साहसिक कार्यों का उल्लेख करने का भी कोई खास महत्व मतलब नहीं है, क्योंकि उनके कार्यों से आप सभी परिचित ही हैं। हां, इतना अवश्य कहूंगा कि धरती पर शेर अंगुलियों पर गिनने लायक ही बचे हैं, ऐसे में यशवंत सिंह के रूप में जीवित बब्बर शेर को देखना किसी अजूबे से कम नहीं है। हालांकि यशवंत हम सबकी तरह ही दिखते हैं, वैसे ही खाते हैं, वैसे ही सोते हैं, वैसे ही जागते हैं, वैसे ही चलते हैं, वैसे ही रहते हैं, पर उस व्यक्ति में ऐसा कुछ अवश्य है, जो हम सब में नहीं है और जो हम सब में नहीं है, वही गुण उस व्यक्ति को आम आदमी की श्रेणी से अलग खड़ा करता है। इस देश की परंपरा दिवंगत व्यक्ति को पूजने की रही है, मुझे विश्वास है कि उस परंपरा को यशवंत ही तोंड़ेंगे।

खैर, भड़ास आज वट वृक्ष का रूप ले चुका है, जिसे हिला पाना भी आज किसी के बस की बात नहीं हैं, पर इस वट वृक्ष को पलने-संवरने और बढऩे में सिर्फ यशवंत का ही योगदान नहीं है। यशवंत साहसिक पत्रकार हैं। भड़ास की स्थापना कर उन्होंने साहसिक और अनूठा कार्य किया है, लेकिन भड़ास के वट वृक्ष बनने में सबसे बड़ा योगदान उनकी जीवन संगिनी का है, जिसने यशवंत को मानसिक सहयोग देकर समय-समय पर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है। भड़ास को उस बेटी के सपनों से भी सींचा गया है, जो पापा की भड़ास के प्रति कर्तव्य निष्ठा को देख कर अपने मन के भावों को अक्सर दबा जाती होगी। आकाश की बुलंदियों को छूते आज के हरे-भरे भड़ास में यशवंत के उन मित्रों का भी भरपूर सहयोग रहा है, जिन्होंने यशवंत को हर मोड़ पर मानसिक, व्यवहारिक और आर्थिक सहयोग दिया है। गरीब से अमीर बने व्यक्ति के घर रिश्तेदारों की बाढ़ आ जाती है, वैसे ही मैं या मेरे जैसे लाखों लोग भड़ास के ऐसे ही शुभ चिंतक हैं, जो महत्वपूर्ण बात नहीं है, इसलिए भड़ास के स्थापना दिवस के अवसर पर मैं उन सबको बधाई देना चाहूंगा, जिन्होंने किसी भी रूप में यशवंत को सहयोग दिया है।

अंत में एक खास बात और कहने का मन कर रहा है। घर-परिवार का वातावरण बदलने के कारण आज सामाजिक सोच भी पूरी तरह बदलती जा रही है। अधिकांश दादा-दादी अब हरिश्चंद, विक्रमादित्य, श्रीराम और महाराणा प्रताप की कहानियां नहीं सुनाते। अधिकांश माता-पिता भी अब आदर्शों का पाठ पढ़ाते नज़र नहीं आते, इसीलिए पूरा का पूरा समाज कर्तव्यहीन बनता जा रहा है। सार्वजनिक स्थलों की तो बात ही छोडिय़े दरवाजे पर रखे पालिका के कूड़ेदान में भी लोग कूड़ा डालना अपमान की बात समझने लगे हैं। कूड़ा डालने की बात इसलिए कही कि इतने छोटे कार्य को लेकर सोच इतनी विकृत हो गयी है, तो समाज या देश को लेकर भला कोई कैसे सोच सकता है?

कुछ लोग तर्क देते हैं कि अशिक्षित वर्ग की संख्या अधिक है, इसलिए ऐसा है, पर परिणाम शिक्षित वर्ग का भी विपरीत ही है, क्योंकि एक आईएएस टॉपर ऐसा घोटाला कर रहा है, जो अपने में एक रिकॉर्ड है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि युवाओं के हाथ में सत्ता आयेगी, तो हालात सुधर जायेंगे, पर डिग्री कॉलेज छोड़ते ही जो युवा छात्र सीधे राजनीति में आ रहे हैं, वह बुजुर्ग नेताओं की तुलना में बड़े और ज्यादा घोटाले कर रहे हैं। मधु कोढ़ा ने सबसे कम उम्र का मुख्यमंत्री बनने के साथ सबसे बड़ा घोटाला करने का भी रिकॉर्ड बनाया है। शासन-प्रशासन में बैठे लोगों से सब दु:खी हैं, पर अधिकांश लोगों की प्रथम इच्छा शासन-प्रशासन का हिस्सा बनने की ही है। इच्छा बदलाव करने के लिए नहीं, बल्कि देश को लूटने की है।

सरकारी डॉक्टर के परिवार में कोई बीमार होता है, तो वह उसे निजी अस्पताल में उपचार के लिए ले जाता है, इतनी बड़ी भूमिका बनाने का आशय है कि शासन-प्रशासन में ही नहीं, बल्कि समूचे समाज में विपरीत सोच वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। समाज, देश और दुनिया से अब अधिकांश लोगों का कोई मतलब नहीं रह गया है। अधिकांश लोग लापरवाह हैं, अधिकांश लोग भ्रष्ट हैं, अधिकांश लोग क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्मवाद और परिवाद के समर्थक हैं, इन अधिकांश लोगों के बीच में से अगर कोई कर्तव्य निष्ठ, ईमानदार, देश और समाज का सच्चा हितैषी निकल कर सामने आता है, तो बहुसंख्यक भ्रष्ट मिल कर उसे बदनाम कर देते हैं, यही मूल कारण है कि आज भ्रष्ट शान से जीवन यापन करते दिख रहे हैं और कर्तव्य निष्ठ अपने ऊपर लगे झूठे दागों को लेकर ही परेशान दिखाई दे रहा है।

लापरवाहों और भ्रष्टाचारियों के विशाल समूह से कोई लड़े भी तो कैसे?, क्योंकि जिस समाज के लिए काम करते हुए खुशी मिलनी चाहिए, उस समाज देख कर लडऩे वाले को दु:ख ही होता है, इसीलिए अंधेरे कमरे में शांति मिलने लगती है। यशवंत भाई, उस कमरे का ख्याल भी आना आपके लिए पाप है। माना नपुंसकों के लिए ही लड़ रहे हो, पर लड़ो, क्योंकि एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा, जिस दिन भ्रष्टाचारियों और लापरवाहों के विशाल समूह की आत्मा जागृत होगी, उस दिन आपको हर जगह श्रीकृष्ण और राधा जी रास करते दिखाई देंगे और इन भ्रष्टाचारियों को अंधेरे कमरे में भी शांति नहीं मिलेगी।

लेखक बीपी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. इनसे संपर्क 8979019871 के जरिए किया जा सकता है.


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