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सुख-दुख...

यशवंत अपनी आलोचना तभी प्रकाशित करते हैं, जब उसे खारिज करने वाले तत्‍व इकट्ठे हो जाते हैं

यशवंत भाई, मैं भड़ास ब्लॉग के द्वारा आपसे जुड़ा. अगर आपको याद हो कि स्ट्रिंगर्स के हालात पर भड़ास निकलने वाला एक लेख मैंने भड़ास ब्लॉग पर लिखा था. जिसे आपने  भड़ास4मीडिया पर जगह दिया था. मैंने आपसे लेख के साथ मेरे परिचय में चैनल का नाम न लिखने की रिक्वेस्ट किया था. तबसे अबतक मुझमें ये परिवर्तन हुआ कि आलोचना या विद्रोह किसी के भी खिलाफ अपने पूरे नाम/पहचान  के साथ करता हूँ. ये भड़ास4मीडिया की ही देन है.

यशवंत भाई, मैं भड़ास ब्लॉग के द्वारा आपसे जुड़ा. अगर आपको याद हो कि स्ट्रिंगर्स के हालात पर भड़ास निकलने वाला एक लेख मैंने भड़ास ब्लॉग पर लिखा था. जिसे आपने  भड़ास4मीडिया पर जगह दिया था. मैंने आपसे लेख के साथ मेरे परिचय में चैनल का नाम न लिखने की रिक्वेस्ट किया था. तबसे अबतक मुझमें ये परिवर्तन हुआ कि आलोचना या विद्रोह किसी के भी खिलाफ अपने पूरे नाम/पहचान  के साथ करता हूँ. ये भड़ास4मीडिया की ही देन है.

क्यूंकि आप शुरुआती दिनों में हमेशा इसी बात पर बल  देते थे कि अपनी पहचान बताकर ही आलोचना या समर्थन करो. इसका मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा. वास्तव में मीडिया में रहकर मीडिया के खिलाफ (गलतियों के खिलाफ) विद्रोह करने की पाठशाला भड़ास ही रही, सिर्फ मेरे लिए नहीं बल्कि मेरे जैसे सैकड़ों लोगों के लिए. यशवंत भाई, भड़ास की उपलब्धियों के बारे में कोई तारीफ/आलोचना सूरज को दिया दिखाने के बराबर ही है. भड़ास (शायद अकेला ऐसा मंच है) ने इस देश के सबसे शोषित पत्रकार तबके के लिए आवाज बुलंद की. आपने सूचना प्रसारण मंत्री तक का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराया. आप जब भी स्ट्रिंगर्स के बारे में लिखते हैं तो ऐसा लगता है कि आपके पास इस मुद्दे को लेकर कोई विजन है. इस तबके के उद्धार के लिए आपके पास कोई न कोई योजना जरूर है, जिसे फुर्सत मिले तो भड़ास पर प्रकाशित जरूर करें.

भड़ास4मीडिया कहा जाय या yashwant4bhadas यानी आपका नाम भड़ास का पूरक है. कुछ लोग इस बात पर आपत्ति कर सकते हैं कि किसी संस्था को एक बौद्धिक तानाशाह की सोच के हिसाब से आपरेट होना उचित नहीं है. कुछ लोग चर्चा भी करते हैं कि यशवंत अपनी या भड़ास की आलोचना तभी प्रकाशित करते हैं जब उस आलोचना को ख़ारिज करने वाले तत्‍व जवाब के लिए इकट्ठे हो जाते हैं. भड़ास के आप फाऊंडर (शायद अकेले) हैं. मैं तो यहाँ तक समझता हूँ कि हर देश को लोकतंत्र की आवश्यकता नहीं होती. भारत जैसे देश में लोकतंत्र मुझे फेल ही लगता है (मेरे लगने से कुछ नहीं होता मैं जानता हूँ). यहाँ एक ईमानदार तानाशाह की आवश्यकता है, जो सीधे जाति के नाम के संगठनों पर ही रोक लगा दे, जो मजबूती से गरीबों को आरक्षण दे न कि जातियों को, जो तुष्टिकरण की फाड़ कर रख दे, जो तसलीमा जैसों को सीना ठोंक कर आश्रय दे, जो मंदिर-मस्जिद विवाद पर कोर्ट के बाहर स्टंट करने पर जेल में ठूंसे. तो मेरे कहने का आशय है कि यदि व्यवस्था ठीक तरीके से चल रही हो, जैसे भड़ास की व्यवस्था, जहाँ सबसे शोषित पत्रकार तबके की आवाज को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है,  वहां सवाल ये नहीं उठता कि व्यवस्था तानाशाही तरीके से चल रही है या लोकतान्त्रिक तरीके से. जब शोषित वर्ग किसी मंच पर अपनी आवाज बुलंद कर सकता है तो इसका मतलब है कि उस मंच की व्यवस्था खालिस लोकतान्त्रिक है.

भड़ास के चार साल पूरे होने पर हमें आपने "ब्रह्माण्डवादी" वाला जो आलेख दिया वह हम सबके लिए गिफ्ट है. आपकी इस "ब्रह्माण्डवादी" सोच का मैं भी प्रबल समर्थक हूँ. हाँ आप तो आप हैं इसलिए इस "ब्रह्माण्डवाद" को समझने में हमसे कई कदम आगे हैं और अपनी बातों को समझाने में तो खैर आपका जवाब ही नहीं है. आपने एक बात बड़ी अच्छी लिखी है कि "मनुष्य है तो वह हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा रह सकता". दरअसल मनुष्य ही नहीं संसार का कोई भी सजीव हाथ पर हाथ धरे बैठा नहीं रह सकता. हाँ मनुष्य जरूर तमाम रहस्यों को समझने का प्रयत्न कर सकता है. उसे "ईश्वरवाद", "एकेश्वरवाद" या "ब्रह्माण्डवाद" जैसे नाम दे सकता है. लेकीन सजीव है तो संघर्ष करते रहना उसकी नियति है. संघर्ष इस कुदरत का बहुत बड़ा शायद सबसे बड़ा सत्य है. "डार्विनवाद" को यदि फिलोसफी के चश्मे से देखा जाय तो कुछ कुछ समझ में आता है. हमारा संघर्ष तो शुक्राणु रहने से ही शुरू हो जाता है. जो मृत्यु तक किसी न किसी रूप में चलता ही है. हम दुनियावी बातों से यदि पीछा छुड़ाकर बुद्ध की तरह सत्य की खोज में निकल पड़े तो यह घोर कुदरत विरोधी बात होगी.

हालाँकि मनुष्य का विकास ही कुदरत के नियमों के खिलाफ हुआ है. लेकिन आप जरा सोचिये अगर दुनिया का हर मनुष्य इसी सत्य की खोज में निकल पड़ा, उसे तथाकथित ज्ञान की प्राप्ति हो जाय तब तो अगली पीढ़ी का वजूद ही समाप्त हो जायेगा. मैं समझता हूँ आपके जीवन में जो संघर्ष का क्षेत्र दिया गया है उस से पीछा नहीं छुड़ाना चाहिए. पीछा छुड़ाने का ख्याल तभी आ सकता है जब आप इस युद्ध में हार गए हों या थक गए हों. आप तथाकथित शांति की तलाश में निकल पड़ते हैं. ध्यान से देखिये साफ़ जाहिर होता है कि आप इस युद्ध की भांय-भांय से थककर ही शांति की तलाश कर रहे हैं. जबकि कुदरत ने खुद आपको शांति का अवसर मृत्यु के रूप में मुहैया कराया है. कुदरत ने आपके लिए इतनी बड़ी व्यवस्था (अनगिनत गृह-उपग्रह, अनगिनत नक्षत्र, अनगिनत ब्लैक होल्स और स्टीफन की मानें तो अनगिनत ब्रह्माण्ड भी) बनायीं है, वो इसलिए नहीं कि आप थक जायें. शांति की तलाश में अपने युद्ध से पीठ दिखा दें.

कुदरत आपसे युद्ध कराते रहना चाहती है. आपके युद्ध लड़ने के तरीके के एवज में वो आपको प्रतिफल देती है. हाँ पर युद्ध शायद जीवन रहते जीता भी नहीं जा सकता. बस लड़ने के बेहतर तरीके का प्रयोग किया जा सकता है. जिससे आप इस महान रहस्यमयी जीवन में सर्वाइव भी करें और आपकी शांति भी आपके पास रहे. मुझे ऐसा लगता है कि कुदरत के लिए तो सही-गलत कर्म जैसी कोई चीज नहीं है. वह आपके द्वारा संघर्ष करने के तरीके जैसा ही प्रतिफल आपको दे देती है. इसी आधार पर लोग पाप या पुण्य को परिभाषित करते रहते हैं. कबीर का "जब बोया पेड़ बबूल का तो फल आम का कहाँ से खायेगा" ये भी आपके लडाई के तरीके से मिलने वाले प्रतिफल को परिभाषित करता है. आप बबूल से भी संतुष्ट हो सकते हैं कुदरत को आपसे कोई शिकायत नहीं होगी. जिस तरह एक शेर अपने जीवन युद्ध में हिंसा से ही पेट पालता है और कमाल की बात है कि उसका अंत भी हिंसात्मक तरीके से ही होता है. तो यहाँ कुदरत का "जैसे को तैसा" का सिद्धांत लागू होता है. कुदरत की नजर में शेर न तो पुण्य कर रहा होता है न ही पाप.

यशवंत भाई ये सारी व्यवस्था किसी वीडियो गेम की तरह दिखती है. आप किसी एक रहस्य को सुलझा लेते हो, आपको एक लाइफ लाइन और मिल जाती है. कुदरत ने सबकुछ आपको दे दिया है अब आप ढूंढों की अपना संघर्ष जारी रखने के लिए आप उसका कैसे यूज करते हो. जैसे उसने आपको पेट्रोलियम दे दिया आपने उसे ढूँढा उसे इस्तेमाल करने का बेहतर तरीका ढूँढा और अन्य प्राणियों से आप थोड़स और बेहतर हो गए, थोड़े और अच्छे तरीके से सर्वाइव करने लगे. उसने आपको यूरेनियम दे दिया, आपने उसे ढूंढ भी लिया. अब आपके ऊपर है कि आप उस से परमाणु बम बनाते हैं या बिजली. बिल्‍कुल वीडियो गेम माफिक. ढूंढो और इस्तेमाल करो. आप शांति के चक्कर में इस गेम के एक स्थान पर खड़े हो सकते हो और बिना कुदरत के सौगातों का इस्तेमाल किये थके हारों के तरीके गेम से विड्रा भी कर सकते हो. लेकिन तब ये गेम पूरा नहीं माना जायेगा. और आप एक अधूरा जीवन जी कर चले जाओगे.

तो यशवंत भइया मैं ये डमरू इसलिए बजा रहा था ताकि भड़ास4मीडिया से मुंह मोड़कर भड़ास आश्रम का जो विचार आपके मन में हिलोरें मरता रहता है उस पर इन तथ्यों के हिसाब से  सोचिये. भड़ास आश्रम की कल्पना आपकी बेहतरीन है. लेकिन उसके लिए भड़ास4मीडिया से मुंह मोड़ने की जरूरत नहीं है. मुझे अगर इस लायक समझिये तो मैं इस आश्रम पर आपके साथ काम करने को तैयार हूँ. भड़ास4मीडिया हम जैसों की ताक़त है, अचूक हथियार है इस से थकने की आवश्यकता नहीं. और अंत में ये कविता जब इसे वाकई में पढ़ने का वक़्त आएगा तब शांति मिल चुकी होगी…..

इस काली ठंडी आग को वापस कर रहा हूँ मैं,
और इसीके साथ लौटा रहा हूँ, ये सफेद मिट्टी, ये गतिहीन पानी, ये बहरी हवा
और ये अथाह आकाश, जो गूंगा है…..।
यूँ तो मैं जानता हूँ ईश्वर, की तुम जानते थे कि एक दिन,
मैं ये सब कुछ इसी तरह तुम्हें वापस कर दूँगा।

लेखक चंदन श्रीवास्‍तव फैजाबाद में लाइव इंडिया से जुड़े हुए हैं.


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