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महिला पत्रकार से छेड़खानी (चार) : पुलिस की लापरवाही ने बढ़ाया था राजेश झा का मनोबल

राजेश झा कि इतनी हिम्‍मत कैसे हो गई कि एक महिला पत्रकार को पिछले सोलह सालों से मेंटल टार्चर करता आ रहा है. राजेश झा केवल अकेला ऐसा साइको नहीं है और ना ही महिला पत्रकार अकेली विक्टिम. देश के तमाम शहरों में इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं. लड़कियां कई तरह के डर से विरोध नहीं कर पाती हैं. असुरक्षा की भावना एक प्रमुख कारण होता है और इस से मनोरोगियों का मनोबल बढ़ता जाता है. पर इस मामले का दूसरा पहलू यह है कि अगर इस मामले को मुंबई पुलिस शुरू से ही गंभीरता से लेती तो शायद महिला पत्रकार को सोलह सालों तक एक डर के साथ जीना नहीं पड़ता. या पुलिस ऐसे मामलों को गंभीरता के साथ मानवीय ढंग से लेती तो शायद इस तरह की नौबत ही नहीं आती. 

राजेश झा कि इतनी हिम्‍मत कैसे हो गई कि एक महिला पत्रकार को पिछले सोलह सालों से मेंटल टार्चर करता आ रहा है. राजेश झा केवल अकेला ऐसा साइको नहीं है और ना ही महिला पत्रकार अकेली विक्टिम. देश के तमाम शहरों में इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं. लड़कियां कई तरह के डर से विरोध नहीं कर पाती हैं. असुरक्षा की भावना एक प्रमुख कारण होता है और इस से मनोरोगियों का मनोबल बढ़ता जाता है. पर इस मामले का दूसरा पहलू यह है कि अगर इस मामले को मुंबई पुलिस शुरू से ही गंभीरता से लेती तो शायद महिला पत्रकार को सोलह सालों तक एक डर के साथ जीना नहीं पड़ता. या पुलिस ऐसे मामलों को गंभीरता के साथ मानवीय ढंग से लेती तो शायद इस तरह की नौबत ही नहीं आती. 

राजेश झा का मनोबल इसलिए बढ़ा कि कई बार पुलिस में शिकायत करने के बाद भी उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की गई. शायद पुलिस को इंतजार था कि वह कोई बड़ी वारदात करे तब उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए. तमाम मामलों में ऐसा ही होता है कि शुरुआती शिकायत को पुलिस गंभीरता से नहीं लेती और मेंटल टार्चर से परेशानी युवती या महिला आत्‍महत्‍या या इस जैसा कोई और गंभीर कदम उठा लेती हैं. या फिर राजेश झा जैसे लोग इन युवती-महिलओं के साथ कोई अप्रिय घटना कर डालते हैं. इस मामले में भी पुलिस का रवैया पूरी तरह टालू रहा है. अगर महिला पत्रकार नहीं होती तो शायद पुलिस अभी तक कोई कार्रवाई करने का जहमत भी नहीं उठाती.

महिला के पत्रकार होने के बाद भी मुंबई पुलिस ने शुरुआत में इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया. कई बार शिकायत किए जाने के बाद भी महिला पत्रकार को कहा जाता रहा कि आपने पहले मामला दूसरे थाने में दर्ज कराया है, वहीं बात करिए. जबकि महिला पत्रकार साइको राजेश झा के डर से अपने किराये के घर बदलती रही. आसानी से समझ सकते हैं कि जब महिला के पत्रकार होने के बाद भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की तो आम मुंबईकर या फिर देश के दूसरे हिस्‍सों में आम लोगों के साथ पुलिस कैसा व्‍यवहार करती होगी. अगर मुंबई पुलिस ने इस मामले को समय रहते हल कर दिया होता तो महिला पत्रकार को इतनी लंबी परेशानी नहीं झेलनी पड़ती.

सोलह साल से एक डर के साथ जी रही यह महिला पत्रकार सभी से गुहार लगा के हारने के बाद बांद्रा के डीसीपी से मदद की गुहार लगाने पहुंची थी. डीसीपी ने भी सक्रियता दिखाते हुए आरोपी राजेश झा को तत्‍काल गिरफ्तार करने का आदेश दिया, जिसके बाद पुलिस ने राजेश पर गंभीर चार्जेज लगाए. अगर यह काम पुलिस ने दस-ग्‍यारह साल पहले ही कर दिया होता तो शायद राजेश झा की हिम्‍मत इतनी नहीं बढ़ी होती. हालांकि महिला पत्रकार के मन में अब भी डर लगातार बना हुआ है कि उसके छूट कर आने के बाद क्‍या होगा?

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