सम्प्रेषण के मूल सिद्धान्तों में जो एक सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त है वह यह कि सम्प्रेषण तभी कारगर होता है जब लक्षित सामाजिक समूह की चेतना के साथ तादात्म्य बना सकें। अगर संदेश के लिए गलत माध्यम चुना गया या उसकी विषय-वस्तु उसे समाज-समूह की समझ से परे रहा तब संदेश संप्रेषण बेमानी हो जाता है। सरकार की क्षेत्रीय चैनलों को लेकर नई नीति इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है।
इस नई नीति के तहत भारत सरकार न केवल क्षेत्रीय चैनलों के माध्यम से अपने कार्यक्रमों का विज्ञापन करेगी बल्कि इन चैनलों के रिपोर्टरों को अपने कार्यक्रमों के बारे में बताते हुए इन कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग के प्रति भी रुझान पैदा करेगी। इस प्रयास का नतीजा यह होगा कि इन कार्यक्रमों के प्रति जनचेतना पैदा होगी और भ्रष्टाचार पर लगाम लग सकेगा।
भारत सरकार ने तीन महत्वपूर्ण कार्यक्रम- सर्वशिक्षा अभियान, मनरेगा और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन- शुरू किए लेकिन ये कार्यक्रम लाखों-करोड़ों खर्च करने का बावजूद मानव विकास सूचकांक को बेहतर करने में असफल रहे। इसकी वजह यह थी कि जनसंचार माध्यमों, खास कर क्षेत्रीय चैनलों को इस प्रयास में शामिल करने की कोशिश नहीं हुयी थी। सामूहिक चेतना को जगाना और इसके माध्यम से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मीडिया के मूल दायित्वों में से एक है लेकिन मीडिया दोषपूर्ण टी.आर.पी प्रणाली की वजह से इन कार्यक्रमों के प्रति सामूहिक चेतना जगाने के दायित्व को नज़रअंदाज़ करती रही और उसका विषय-वस्तु शहरोन्मुख रहा।
नतीज़ा यह हुआ कि पेट्रोल का दाम एक रुपया बढ़ने पर मीडिया ने हांफ-हांफ कर बताना शुरु किया लेकिन वहीं पिछले पांच सालों में डाई-अमोनियम-फॉस्फेट और यूरिया की कीमत तीन गुना होने पर भी कोई हलचल नहीं हुयी। एक अन्य उदाहरण लें। उत्तरप्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन(एन.आर.एच.एम) का घोटाला जो बहुत ही आसानी से जनमानस को उद्वेलित कर सकता था परन्तु मीडिया इसका संज्ञान न ले सकी और दबाव नहीं बन सका। कमोबेश यही हाल है मनरेगा कार्यक्रम का जिसमें दस साल पहले मरे हुए आदमी के नाम पर काम करना दिखाया गया और पैसा अधिकारी ले गए। सर्वशिक्षा अभियान में बिहार और ओडिशा में हुए घपले भी मीडिया के संज्ञान में उस शिद्दत से नहीं आ पाए जिस शिद्दत से टूजी स्पेक्ट्रम का घोटाला।
1965 में जब भारत खाद्य के भयंकर संकट से जूझ रहा था उस समय हरित क्रान्ति का बिगुल बजाने में भारतीय अखबारों व रेडियो की बड़ी भूमिका रही। आज भी भारतीय मीडिया की इस बात के लिए सराहना की जाती है। हरित क्रान्ति का आज जब विश्लेषण होता है तब कहा जाता है कि चार प्रमुख उपादान रहे- तकनीकि, सरकारी सेवाएं, जननीति और सबसे ऊपर किसानों का उत्साह जो कि उस समय के रेडियो और अखबारों की देन थी। यह अखबारों और रेडियो की ही ताकत थी कि उसने किसानों में उत्साह पैदा किया कि 1966 में मेक्सिको से आए 1800 टन बेहतरीन किस्म के बीज का आयात किया गया। भारतीय समाज को संकट से उबारने में भारतीय मीडिया की यह भूमिका उस समय रही जब दुनिया के मीडिया विशेषज्ञों पॉल और विलियम पैडलॉक ने भारत को खारिज कर दिया था यह कहकर कि यह भुखमरी की कगार पर है।
भारत सरकार को इस बात का एहसास अब जाकर हुआ है और इसी के तहत अपने कार्यक्रमों में क्षेत्रीय चैनलों को विश्वास में लेकर एक अभियान छेड़ने की शुरुआत हुयी है। इसके लिए केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी बधाई की पात्र हैं। इस सोच के दो फायदे होंगे। पहला सामूहिक जनचेतना और तदनुरूप सार्थक नागरिक दबाव-समूह बनेंगे जिससे न केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकेगा बल्कि प्रजातंत्र में गुणात्मक परिवर्तन होगा, समाज की सोच वैज्ञानिक होगी और गरीबी का शाश्वत भाव अंतिम सासें ले रहा होगा। दूसरा, जो क्षेत्रीय चैनल धनाभाव में घटिया कंटेंट परोस रहे हैं, अनैतिक प्रयासों की तरफ जा रहे हैं और अकाल मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं वह फिर से या तो स्वस्थ प्रतियोगिता से बाहर हो जाएंगे या अपने को बेहतर करेंगे। यह सही है कि मीडिया के बेहतर कंटेंट न देने के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वह है गलत टी.आर.पी प्रणाली। टी.आर.पी यानि टेली रेटिंग प्वाइंट इस बात को बताता है कि अमुक चैनल की व्यूअरशिप कितनी है लेकिन दुर्भाग्यवश भारत में आज भी आठ हजार ऐसे मीटर्स लगे हुए हैं जिनसे हम देश की 123 करोड़ लोगों की पसंद या नापसंद को नापते हैं। सर्वेक्षण के किसी भी सिद्धान्त से यह अनुपात गलत साबित होता है। यही वजह है कि मीडिया को मुंबई में हुआ बलात्कार मेहसाणा में हुए बलात्कार से ज्यादा गंभीर नजर आता है और यही वजह है कि यूरिया का दाम तीन गुना बढ़ने के बावजूद चैनलों में नज़र नहीं आता जबकि पेट्रोल में एक रुपया बढ़ोत्तरी मीडिया को झकझोर देती है।
दरअसल टैम मीटर की व्यवस्था करने वाली कंपनी विज्ञापनदाताओं से निर्देशित होती है और विज्ञापनदाताओं का यह मानना है कि जिस समाज में पैसा नहीं वहां विज्ञापन देने का कोई फायदा नहीं। यही वजह है कि अहमदाबाद की 30 लाख आबादी में 195 टैम मीटर लगाए गए जबकि बिहार जिसकी आबादी साढ़े दस करोड़ है, दस साल में एक भी टैम मीटर नहीं था और जब आया भी वह केवल पटना में और वह भी 165 मीटर। भारतीय संविधान को अगर गहराई से देखा जाए तब सरकार के पास जनहित को लेकर मीडिया पर अंकुश लगाने का अनुच्छेद 19(2) में कोई भी प्रावधान नहीं है लेकिन जब यही बात अनुच्छेद 19(1)(जी) में पेशे की स्वतंत्रता को लेकर आती है तब अनुच्छेद 19(6) में सरकार को स्पष्ट अधिकार है जनहित में इस अधिकार को नियंत्रित करने का। अगर सरकार इस अधिकार को पहले नियंत्रित करती तब दोषपूर्ण टैम प्रणाली को नियंत्रित किया जा सकता था और कहा जा सकता था कि या तो मीटरों की संख्या ज्यादा हो, प्रतिनिधि चरित्र का हो और संपूर्ण देश के लिए हो क्योंकि टैम मीटर लगाना और इससे तथाकथित दर्शकों की रुचि को नापना पेशे में आता है।
क्षेत्रीय चैनल पूरी तरह से एक क्षेत्र या राज्य-विशेष की खबरों के प्रति समर्पित होते हैं इसलिए उनके पास जन-उपादेय खबरों मसलन किसानों की समस्या, स्वास्थ्य सेवाओं में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र के स्तर पर कोताही और छोटे-छोटे जनसमूहों को
शिक्षित व जागृत करने के लिए समय व नेटवर्क होता है। किसी भी सोशल-मैसेजिंग के लिए क्षेत्रीय चैनल ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं। खैर देर आए दुरुस्त आए। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री इस प्रयास में भी लगी हैं कि टैम मीटरों की संख्या प्रथम चरण में बढ़ायी जाए जिनकी संख्या 30,000 तक हो ताकि मुंबई और मेहसाणा के बलात्कार में फर्क न हो।
लेखक एनके सिंह वरिष्ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्लॉग पोस्टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के दैनिक भास्कर में भी प्रकाशित हो चुका है.





