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ये क्‍या हो रहा है श्रीकांत त्रिपाठी जी के इतवार में?

यशवंत भाई ये क्या हो रहा है इतवार में. श्रीकांत त्रिपाठी जी जैसे सम्पादक के सम्पादन में इतना बलन्डर कैसे हो सकता है. चौथी दुनिया के रिपोर्ट में ही थोडी-बहुत तब्दिली कर हूबहू छाप दिया गया. अभी हाल ही में बथानी के मुद्दे को प्रभात खबर में छपी फोटो और उसी की खबर को रीराइट कर छापा गया. मेरा मेल नहीं प्रकाशित करेंगे तो अच्छा रहेगा. चौथी दुनिया की खबर यहां दे रहा हूं. और इतवार की स्टोरी अटैच है. नीचे चौथी दुनिया में प्रकाशित खबर.

यशवंत भाई ये क्या हो रहा है इतवार में. श्रीकांत त्रिपाठी जी जैसे सम्पादक के सम्पादन में इतना बलन्डर कैसे हो सकता है. चौथी दुनिया के रिपोर्ट में ही थोडी-बहुत तब्दिली कर हूबहू छाप दिया गया. अभी हाल ही में बथानी के मुद्दे को प्रभात खबर में छपी फोटो और उसी की खबर को रीराइट कर छापा गया. मेरा मेल नहीं प्रकाशित करेंगे तो अच्छा रहेगा. चौथी दुनिया की खबर यहां दे रहा हूं. और इतवार की स्टोरी अटैच है. नीचे चौथी दुनिया में प्रकाशित खबर.

बिहार : दागी अफसरों की भरमार

बिहार में दाग़ी अधिकारियों की भरमार है. निज़ाम बदलने से इनकी सेहत पर कोई फर्क़ नहीं पड़ा. के सेंथिल कुमार इस बात के ताज़ातरीन उदाहरण हैं. भ्रष्टाचार के मामले से घिरे भारतीय प्रशासनिक सेवा के इस वरिष्ठ अधिकारी के ज़िम्मे हाल तक बिहार में जनगणना का पूरा कार्यक्रम था. के सेंथिल कुमार ने पटना का निगमायुक्त रहते हुए जो गुल खिलाए, उनसे प्राय: सभी वाक़ि़फ हैं. ऐसे आईएएस अधिकारियों की लंबी फेहरिस्त है. पूर्व मुख्य सचिव अशोक कुमार चौधरी का ज़िक्र आवश्यक है. इन्हें नीतीश कुमार ने न स़िर्फ मुख्य सचिव बनवाया, बल्कि सेवा विस्तार भी दिलवाया. सेवानिवृत्त होने के बाद यह बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष भी बनाए गए. जबकि लालू-राबड़ी शासनकाल में बतौर स्वास्थ्य सचिव इन पर दवा घोटाले का आरोप का़फी चर्चित रहा था.

वहीं अशोक कुमार चौधरी फिलवक़्त बिहार के मुख्य सूचना आयुक्त हैं. तिरहुत प्रमंडल के आयुक्त एसएम राजू प्रतिनियुक्ति के दौरान कर्नाटक में 19 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए लोकायुक्त द्वारा रंगे हाथों पकड़े गए थे. इससे पहले गया में पदस्थापना के दौरान इन पर मार्केटिंग कांपलेक्स के निर्माण में का़फी वारा-न्यारा करने का आरोप लगा था. नीतीश शासन में इन्हें सबसे पहले जेल आईजी बनाया गया था, फिर ग्रामीण विकास विभाग में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई. इस विभाग द्वारा संचालित महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा में भारी घोटाले के आरोप उछलते रहे हैं. राज्य सरकार के विकास आयुक्त केसी साहा पर भी भ्रष्टाचार के मामले का़फी चर्चा में रहे हैं. जानकारों का कहना है कि राज्य सरकार भ्रष्टाचार के मामले में यूं तो का़फी संजीदा दिखती है, लेकिन वह आला अधिकारियों के खिला़फ लंबित भ्रष्टाचार के मामलों में शीघ्रतापूर्वक जांच पूरी कराकर स्पीडी ट्रायल क्यों नहीं कराती है? अगर संबंधित अधिकारी निर्दोष हैं तो उन्हें झूठे आरोप से मुक्ति मिल जाएगी. अगर दोषी हैं तो लंबे अर्से तक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर ऐसे लोगों के कार्यरत रहने का खासा नुक़सान राज्य और जनता को भुगतना पड़ता है. इसके लिए आखिर कौन ज़िम्मेदार है?

श़फी आलम पर बग़ैर अनुमति के विदेश यात्रा एवं अजय कुमार वर्मा पर अनुशासहीनता का आरोप है. 1977 बैच के आईपीएस निर्मल चंद ढ़ोंढियाल पर तो फरारी का आरोप रहा है. इधर निरंतर विवाद में रहने वाले पुलिस अधिकारी अमिताभ दास का नाम इसमें देख शायद ही किसी को आश्चर्य होगा. दाग़दार अधिकारियों की इस सूची में कुछ ऐसे भी नाम हैं, जिन्हें देखकर हैरत होती है, मसलन बिहार के वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी मनोज नाथ. पिछले सत्र के दौरान विधान परिषद में राज्य सरकार ने खुद स्वीकार किया कि राज्य में पदस्थापित 24 आईपीएस अधिकारी दाग़ी हैं. विधान पार्षद केदार पांडे के एक सवाल के जवाब में गृह विशेष विभाग की ओर से उत्तर देते हुए मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि भारतीय पुलिस सेवा के दो दर्जन अधिकारियों पर अलग-अलग आरोप हैं. इनमें से सात आईपीएस अधिकारियों पर लगे आरोपों की समीक्षा की जा रही है. मंत्री ने बताया कि आठ आईपीएस अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है. बाक़ी 9 अधिकारियों पर विभागीय कार्यवाही चल रही है.

सूचना अधिकार क़ानून से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता शिवप्रकाश राय ने भी बिहार सरकार के गृह विभाग से इस संदर्भ में सूचना मांगी थी. मुहैया कराई गई सूचना में भी भारतीय पुलिस सेवा के बिहार कैडर के दो दर्जन अधिकारियों को दाग़ी क़रार दिया गया है. सवाल उठता है कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों से संबंधित मामलों में स्पीडी ट्रायल की रफ्तार सुस्त क्यों पड़ जाती है. दाग़ियों की सूची में शुमार पुलिस अधिकारियों के मामले काफी लंबे अर्से से लंबित हैं. मुंगेर प्रक्षेत्र में पदस्थापित पुलिस उप महानिरीक्षक अनिल किशोर यादव भी इसी श्रेणी में आते हैं. इन पर आरोप है कि गंभीर कदाचार के आरोप में निलंबित पदाधिकारियों को बार-बार निलंबन मुक्त कर पदस्थापन करना. इनके खिला़फ विभागीय कार्रवाई का आदेश स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 15 फरवरी, 2008 को कर चुके हैं. इस मामले में इनके स्पष्टीकरण पर पुलिस महानिदेशक से बिंदुवार मंतव्य मांगा गया है, जिस पर अभी तक उनका विचार अप्राप्त है. जबकि यह मामला 2005 का है. अर्थात मुख्यमंत्री का आदेश भी बेअसर साबित हुआ. वहीं स्वयं नीतीश कुमार ने भी अपने पूर्व के आदेश को नज़रअंदाज़ कर आरक्षी अधीक्षक पद से पदोन्नति कर इन्हें मुंगेर प्रक्षेत्र का पुलिस उप महानिरीक्षक बना दिया. ग़ौरतलब है कि गृह एवं सामान्य प्रशासन विभाग के विभागीय मंत्री नीतीश कुमार ही हैं.

सीतामढ़ी में पथ निर्माण विभाग के कार्यपालक अभियंता योगेंद्र पांडेय की संदेहास्पद स्थितियों में मौत के मामले में संदेह के घेरे में आए वहां के तत्कालीन आरक्षी अधीक्षक क्षत्रनील सिंह से 2009 में ही स्पष्टीकरण मांगा गया था, इन पर पांडेय को समय पर अंगरक्षक उपलब्ध न कराने का आरोप है. यह मामला अभी तक लंबित है. इसके अलावा इसी समय सीतामढ़ी स्थानीय निकाय क्षेत्र के विधान परिषद चुनाव के दौरान रून्नी सैदपुर में जदयू विधायक गुड्डी देवी का घर प्रतिद्वंद्वी राजद नेता राम शत्रुघ्न राय एवं उनके समर्थकों द्वारा जलाने के मामले में भी इनसे स्पष्टीकरण मांगा गया था. का़फी लंबा समय बीतने के बाद भी मामला लटका हुआ है. इस बीच क्षत्रनील सिंह पटना ग्रामीण के आरक्षी अधीक्षक बनाए गए. अभी बेगूसराय ज़िले में बतौर एसपी कार्यरत हैं. विशेष शाखा के आरक्षी उप महानिरीक्षक पारसनाथ पर भी हत्या के एक मामले में भ्रष्ट आचरण और आरोपियों को बचाने का आरोप है. इन्होंने कथित तौर पर इस मामले का न्यूनीकरण अर्थात महत्ता कम करने का प्रयास किया. 2005 की इस घटना में पुलिस मुख्यालय द्वारा आरोप तय करके प्रपत्र-क मांगा गया था, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. जबकि पारसनाथ वैशाली और पूर्वी चंपारण जैसे महत्वपूर्ण ज़िलों में इस दौरान आरक्षी अधीक्षक भी रहे. अब तो प्रोन्नति भी मिल गई. एक अन्य आईपीएस अमरेंद्र कुमार सिंह भी अनुशासनहीनता, ग़ैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार और कर्तव्य में लापरवाही के आरोप से घिरे हैं.

एक पुलिस अधिकारी एच एन देवा बेटिकट यात्रा करते पकड़े गए थे. वहीं पूर्व डीजीपी डी पी ओझा पर निगरानी में पदस्थापना के दौरान पशुपालन घोटाले से संबंधित अवैध निकासी की जांच में रुचि न लेने एवं पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप है. 2003 के इस मामले में विभागीय कार्यवाही की रफ्तार इतनी सुस्त रही कि वह सेवानिवृत्त भी हो गए, लेकिन मामला अभी तक लंबित है. एक अन्य सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी गणेश प्रसाद यादव पर दरभंगा के बहादुरपुर थाने के मुकदमा नंबर 126/2007 को असत्य घोषित करने का आरोप है. यह वाक़िया कुछ यूं था कि दबंगों ने एक लड़की का अपहरण कर उसे चकलाघर में बेच दिया था, लेकिन पुलिस ने इसे प्रेम प्रसंग में फरारी का मामला बता खारिज कर दिया था. कुछ महीने बाद वह लड़की बेगूसराय के बखरी में चकलाघर से बरामद हुई. लड़की के मां-बाप ने जनता दरबार के माध्यम से मुख्यमंत्री से कई बार गुहार लगाई. इसके बावजूद इस पुलिस अधिकारी पर विभागीय कार्यवाही नहीं हुई. श़फी आलम पर बग़ैर अनुमति के विदेश यात्रा एवं अजय कुमार वर्मा पर अनुशासहीनता का आरोप है. 1977 बैच के आईपीएस निर्मल चंद ढ़ोंढियाल पर तो फरारी का आरोप रहा है. इधर निरंतर विवाद में रहने वाले पुलिस अधिकारी अमिताभ दास का नाम इसमें देख शायद ही किसी को आश्चर्य होगा. दाग़दार अधिकारियों की इस सूची में कुछ ऐसे भी नाम हैं, जिन्हें देखकर हैरत होती है, मसलन बिहार के वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी मनोज नाथ. वहीं कुछ ऐसे भारतीय आरक्षी सेवा के अधिकारी भी हैं, जिन पर सवाल तो खड़े होते रहे हैं, लेकिन उन्हें इस सूची में जगह नहीं दी गई.


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एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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