जशपुर – यूं तो आदिवासी एक्ट विशेष पिछड़ी जाति व जनजाति पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए बनाया गया है.. पर जशपुर जिले में पुलिस का अत्याचार कहें या पत्रकारों की नामर्दानगी इस कदर बढ़ गई है कि यहाँ पत्रकारों पर सरे आम आदिवासी एक्ट के साथ पुलिस एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी की कार्रवाई को अंजाम देने की कोशिश कर रही है…. जी हां मामला है ई टीवी के संवाददाता पवन तिवारी का, जिसने बीते दिनों कुनकुरी में अपने मकान मालिक से लड़ाई कर ली थी, जिसकी शिकायत मकान मालिक ने कुनकुरी थाने में की थी.
लगभग छह माह बीतने के बाद कोई कार्रवाई नहीं की गई…. क्योंकि बात एक पत्रकार की थी… पर हमारे संवाददाता जब तक पुलिस की चापलूसी करते हैं तब सब ठीक होता है, पर जहां बात आती है स्वाभिमान की, तो कोई भी हो रगड़ देते हैं. ऐसा ही कुछ हुआ पवन तिवारी जी के साथ. चालित थाना के कार्यक्रम में बच्चों से झाड़ू लगवाते हुए थानेदार का विजुअल बना लिए और खेलने लगे समाचार से.. बस क्या था इधर समाचार चली, उधर आदिवासी और हरिजन एक्ट की धाराएं पहले की शिकायत पर लगनी शुरू हो गयीं… मारपीट व गाली-ग्लौज को तो कैसे भी झेल जाते पर… बात आदिवासियों के हित की है पर हमारा तो अहित हो ही रहा था… क्योंकि इसी के सहारे थानेदार ने अपराध पंजीवद्ध कर एसडीओपी को सौंप दिया था, जिसमें जांच कर एसडीओपी वर्षा मेहर ने एसपी को आदिवासी एक्ट की धाराओं की पुष्टि की खबर भेज दी थी.
इधर आग में घी डालने का काम सहारा एमपी-सीजी के जशपुर संवाददाता राजेश पाण्डेय के साथ-साथ बाक़ी प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया वालों ने कर दिया.. हुआ यूं कि जशपुर जिले के पत्थाल्गाओं थाने में नाबालिग बच्चों को हथकड़ियों में जकड़ के शारिरीक प्रताड़ना देने का मामला आ गया… बस क्या था खबर झमाझम चलने लगी… इधर एसपी साहब को मजबूरन उस थानेदार को लाइन अटैच करना पडा… शायद एसपी साहब को नहीं पता था कि उस पत्थाल्गाओं थाने के टीआई नरेंद्र शर्मा की पहुंच पुलिस हेड क्वार्टर व मंत्रालय तक है.. अटैच तो कर दिया अब एसपी साहब को भी ऊपर तक जवाब देना पड़ा… कहीं ना कहीं मीड़िया वालों की मर्दानगी का असर दिख रहा था, पर अन्दर ही अन्दर पवन तिवारी जी के खिलाफ भी रणनीति तैयार की जा रही थी.. खैर, अपराध तो दर्ज हो ही चुका है वो भी आदिवासी एक्ट के तहत! जमानत भी नहीं मिलेगी?
सभी पत्रकारों को लेकर एक टीम एसपी साहब से मिलने भी गयी पर क्या मिला…. आश्वासन का झुनझुना… अब तो गिरफ्तारी बची है बस… दिख जायेगी पत्रकारों की मर्दानगी…. इतने में भी हम तो पत्रकार जो ठहरे चुप नहीं बैठने वाले थे, सभी ने मिलकर कुछ निष्कर्ष निकाला तो पता चला कि पत्रकार की गिरफ्तारी और कोर्ट में चालान प्रस्तुत करने के लिए आईजी के परमिसन की जरुरत होती है…. वो सब तो इन्होंने नहीं किया था… अब फिर से एक बार एसपी साहब के पास जाना होगा…सबकी सलाह के बाद ही कोई निर्णय लिया जा सकेगा… एक तो जशपुर पूर्णतः आदिवासी बाहुल इलाका है, यहाँ काम करना थोड़ा कठिन है, क्योंकि छोटी जगह में यहाँ की बात वहां होते देर नहीं लगती… उस पर किसी को कुछ कह दिया तो आदिवासी हरिजन एक्ट आम बात है, पर क्या इसका दुरुपयोग सही है.. यहाँ के नेता और दिग्गज भी इसी के सहारे दबाव बनाते हैं, पर हमको तो हर हाल में पत्रकारिता करनी ही है.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





