नई दिल्ली। फेसबुक, गूगल, यूट्यूब और ट्विटर जैसे सोशल वेबसाइट्स मंचों पर नेट यूजर की अभिव्यक्ति पर लगाम कसने के लिए बनाए दिशा-निर्देशों पर गुरुवार को राज्यसभा में जोरदार बहस हुई। इंटरनेट की आजादी की वकालत करते हुए विपक्ष के नेता अरूण जेटली ने नए दिशा-निर्देशों में लगाम कसने की शब्दावली पर तो ऐतराज किया लेकिन यह भी माना कि नियमों के कुल ढांचे से उन्हें आपत्ति नहीं है। उन्होंने इंटरनेट की महिमा को ऊंचाइयों पर ले जाते हुए यह भी माना कि अगर 1975 में इंटरनेट का जोरदार मंच लोगों के पास होता तो आपातकाल की हवा निकल गई होती।
सूचना टेक्नोलाजी कानून के तहत बनाए गए सूचना टेक्नोलॉजी (इंटरनेट मंच) नियमन 2011 को निरस्त करने की मांग करते हुए पेश किए गए वैधानिक संकल्प की बहस में हिस्सा लेते हुए जेटली ने कहा कि इंटरनेट पर सेंसरशिप नहीं थोपने के लोकप्रिय मूड और इंटरनेट के कुप्रभावों से आहत लोगों के आक्रोश के बीच संतुलन साधना होगा और अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम कसने के बजाए इन मंचों को नए नियमों में बांधना होगा।
जेटली ने राज्यसभा में सुझाव देते हुए कहा कि नए वैधानिक नियमों में बेहद हानिकारक या अपमानजनक या आक्रामक या तंग करने वाले कन्टेंट को हटाने की बात कही गई है लेकिन इन शब्दों को कानूनी सीमा में बांधना संभव नहीं है। लिहाजा सरकार को इस अपरिभाषित शब्दावली को बदलने पर विचार करना चाहिए। संकल्प पेश करते हुए मार्क्सवादी पी राजीव ने इन नियमों को मूल कानून के खिलाफ बताते हुए इन्हें रद्द करने की मांग की। (साभार : आईबीएन)





