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इंडिया टुडे में हिंदी अखबारों की आपसी मार-प्रसार पर पठनीय रिपोर्ट

आमतौर पर मीडिया वाले मीडिया को बहस का बिंदु बनाने से बचते हैं. यदा कदा ही मीडिया के नए ट्रेंड्स पर मैग्जीनों में बात होती है. इंडिया टुडे हिंदी में इस बार मीडिया पर बात हुई है. विषय चुना गया है कि हिंदी अखबारों के आपसी प्रसार, अधिग्रहण के युद्ध का. नई दुनिया को दैनिक जागरण द्वारा खरीदे जाने और राजस्थान पत्रिका समूह का पत्रिका नाम से राजस्थान के बाहर पैर फैलाने का जिक्र करते हुए बताया गया है कि अब शीर्ष पर रहने के लिए लड़ाई काफी तेज हो गई है. इंडिया टुडे में प्रकाशित संतोष कुमार की रिपोर्ट में अखबार मालिकों से भी बातचीत है और उनके वक्तव्य आदि दिए गए हैं. इंडिया टुडे की रिपोर्ट को नीचे इस उद्देश्य से दिया जा रहा है कि मीडिया से जुड़े साथी अपना अपना तथ्यगत ज्ञान बढ़ा लें. रिपोर्ट को पढ़ते हुए एक चीज जरूर खटक रही है कि इसमें अमर उजाला, हिंदुस्तान, प्रभात खबर आदि का कोई जिक्र नहीं है.

आमतौर पर मीडिया वाले मीडिया को बहस का बिंदु बनाने से बचते हैं. यदा कदा ही मीडिया के नए ट्रेंड्स पर मैग्जीनों में बात होती है. इंडिया टुडे हिंदी में इस बार मीडिया पर बात हुई है. विषय चुना गया है कि हिंदी अखबारों के आपसी प्रसार, अधिग्रहण के युद्ध का. नई दुनिया को दैनिक जागरण द्वारा खरीदे जाने और राजस्थान पत्रिका समूह का पत्रिका नाम से राजस्थान के बाहर पैर फैलाने का जिक्र करते हुए बताया गया है कि अब शीर्ष पर रहने के लिए लड़ाई काफी तेज हो गई है. इंडिया टुडे में प्रकाशित संतोष कुमार की रिपोर्ट में अखबार मालिकों से भी बातचीत है और उनके वक्तव्य आदि दिए गए हैं. इंडिया टुडे की रिपोर्ट को नीचे इस उद्देश्य से दिया जा रहा है कि मीडिया से जुड़े साथी अपना अपना तथ्यगत ज्ञान बढ़ा लें. रिपोर्ट को पढ़ते हुए एक चीज जरूर खटक रही है कि इसमें अमर उजाला, हिंदुस्तान, प्रभात खबर आदि का कोई जिक्र नहीं है.

मीडिया हिंदी दैनिक : मध्य भारत में महाभारत

संतोष कुमार

अमेरिका और यूरोप में जब समाचार पत्र मर रहे हैं, तब भारत में खासकर हिंदी के समाचार पत्रों में जबरदस्त तेजी का दौर है. लेकिन यह तेजी कई तरह के तनाव भी पैदा कर रही है. समाचार पत्र समूहों को अब खेल के पुराने मैदान छोटे लग रहे हैं. वे विस्तार कर रहे हैं लेकिन ऐसा करते ही वे किसी और अखबार के क्षेत्र में घुस जाते हैं, यह लड़ाई पूरे उत्तर भारत में लड़ी जा रही है लेकिन इस बार हिंदी के अखबारों के बीच की लड़ाई का केंद्रबिंदु बना है मध्य प्रदेश.

नंबर वन की महाभारत में कूदे तीन खिलाड़ी दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और दैनिक जागरण इस बार मध्य भारत स्थित इस सूबे में अपनी धमक के साथ आमने-सामने हैं. पाठक संख्या को बढ़ाकर विज्ञापन में ज्‍यादा हिस्सेदारी के लिए ये अखबार विलय और अधिग्रहण पर जोर दे रहे हैं. कागज पर सरकारी रियायत खत्म होने और विज्ञापन बाजार में कमजोर पड़ने की वजह से छोटे और कुछ पुराने अखबारों की आर्थिक स्थिति चरमरा गई है, और वे अधिग्रहण के लिए बेहतरीन सौदे बन गए हैं. जागरण और भास्कर जैसे समूह बाजार में मौजूद कुछ स्थापित समूहों का अधिग्रहण कर रहे हैं, तो राजस्थान पत्रिका अपनी क्षेत्रीय पहचान को किनारे रख अन्य राज्यों में पत्रिका के नाम से विस्तार कर रहा है.

जागरण प्रकाशन लिमिटेड ने हाल ही में मध्य प्रदेश के स्थापित और नामी-गिरामी अखबार नईदुनिया का अधिग्रहण कर वहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. समूह के सीईओ और संपादक संजय गुप्त इंडिया टुडे से कहते हैं, ''नईदुनिया हमारे लिए तार्किक विस्तार था क्योंकि यह मध्य भारत में हमारी जोरदार मौजूदगी में मदद करेगा. नईदुनिया की मजबूत संपादकीय टीम की जबरदस्त विश्वसनीयता है.

विलय और अधिग्रहण के माध्यम से विस्तार और विकास करने की हमारी रणनीतिक योजना के अंतर्गत यह मिड डे के बाद दूसरा अधिग्रहण है. इससे हमारा दायरा बढ़ा है और अपने वर्तमान नेटवर्क का फायदा उठाना हमारे लिए संभव हो सका है.'' देश का सबसे ज्यादा पाठकों वाला मीडिया समूह होने का दावा करते हुए गुप्त कहते हैं, ''इंडियन रीडरशिप सर्वे में समूह का एवरेज इश्यू रीडरशिप (आइआरएस) 2.6 करोड़ है और पिछले 21 बार से जागरण नंबर वन है.'' इस आंकड़े में नईदुनिया भी शामिल है.

मध्य प्रदेश परंपरागत रूप से दैनिक भास्कर का गढ़ रहा है. भास्कर की प्रतिष्ठा नए गढ़ बनाने और पुराना किला बचाए रखने की रही है. भास्कर ग्रुप के निदेशक गिरीश अग्रवाल कहते हैं, ''दैनिक भास्कर ग्रुप ईमानदारी, निष्पक्षता और उद्देश्य के साथ चलने वाला विश्वसनीय मीडिया समूह है, जो 1.91 करोड़ पाठकों की चाहत के साथ भारत के सबसे तेजी से बढ़ते 13 बाजारों में मौजूद है.'' लेकिन इन मीडिया समूहों में एक-दूसरे के बाजार में घुसकर बड़ा शेयर हथियाने की होड़ के साथ-साथ आंकड़ों की लड़ाई भी बेहद दिलचस्प है.

भास्कर ग्रुप के ब्रांड कम्युनिकेशन हेड संजीव कोटनाला औसत प्रति पाठक के आंकड़ों के आधार पर दावा करते हैं, ''हमारे समूह का एवरेज इश्यू रीडरशिप (एआइआर) 1.91 करोड़ है, जबकि जागरण समूह का एआइआर 1.78 करोड़ है.'' भास्कर समूह इसमें नईदुनिया, नव दुनिया, जागरण सखी और जागरण जोश को नहीं जोड़ता है. लेकिन भास्कर ने अपने समूह के आंकड़े में डीएनए को जोड़ा है, जो एक साझा उपक्रम है.

हालांकि जागरण प्रकाशन लि. के वाइस प्रेसिडेंट (स्ट्रैटजी, ब्रांड ऐंड बिजनेस डेवलपमेंट) बसंत राठौड़ जागरण समूह को भास्कर से कमतर बताने वाले दावे को तथ्यविहीन बताते हैं. वे दावा करते हैं, ''आइआरएस के मुताबिक, हमारे समूह का एआइआर 2.6 करोड़ और कुल रीडरशिप 6.85 करोड़ है. एआइआर और कुल रीडरशिप दोनों ही आधार पर हम भारत के नंबरवन मीडिया समूह हैं'' उनके इस दावे में दैनिक जागरण, आइ नेक्सट, मिड डे (अंग्रेजी), मिड डे (गुजराती), इंकलाब, नईदुनिया, नव दुनिया, जागरण सखी और जागरण जोश शामिल है.

लेकिन इन दोनों बड़े समूहों से इतर पत्रिका ग्रुप भी हिंदी दैनिकों में नंबर दो होने का दावा करता है. पत्रिका के नेशनल हेड (मार्केटिंग) अरविंद कालिया कहते हैं, ''हिंदी दैनिकों में पत्रिका दूसरे स्थान पर है. ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) के मुताबिक, हमारा औसत सर्कुलेशन 21 लाख प्रति रोजाना है.''

दरअसल हर समूह आंकड़ों को अपनी सहूलियत के नजरिए से देखता है और आइआरएस या एबीसी के नतीजे जब भी आते हैं, अखबारों में खुद को नंबर एक बताने की होड़ मच जाती है. नईदुनिया के अधिग्रहण के बाद मध्य प्रदेश में अखबार समूहों की प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई है. दैनिक भास्कर के एकाधिकार को तोड़ने के लिए मध्य प्रदेश में अपना कदम आगे बढ़ा चुके पत्रिका का दावा है कि भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर में वह पाठकों की बढ़त के आधार पर नंबर वन है. उसने तो इस बाबत बाकायदा इश्तहार भी निकाला.

इंदौर संस्करण में पत्रिका परिवार के वरिष्ठतम सदस्य गुलाब कोठारी लिखते हैं, ''आंकड़े कुछ भी कहते होंगे, लेकिन दिलों को जीतने में पत्रिका के आगे कोई नहीं ठहर पाएगा.'' लेकिन पत्रिका को दैनिक भास्कर चुनौती नहीं मानता है.

डी.बी. कॉर्प के कोटनाला कहते हैं, ''आइआरएस के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में हमारी रीडरशिप 38 लाख है, जबकि हमारे निकटतम प्रतिद्वंद्वी अखबार की रीडरशिप महज 16 लाख है. औसत रीडरशिप के आधार पर हम राज्य के अन्य छह अखबारों के कुल योग से भी आगे हैं.'' वे दावा करते हैं, ''डी.बी. कॉर्प भारत की सबसे बड़ी प्रिंट मीडिया कंपनी है.''

आखिर मध्य प्रदेश मीडिया की होड़ का सबसे हॉट स्पॉट क्यों बना हुआ है? राज्य सीआइआइ के चेयरमैन आर.एस. गोस्वामी कहते हैं, ''पिछले 8-10 साल पहले मध्य प्रदेश बेहद पिछड़ा राज्य था. लेकिन अब तस्वीर बदली है और किसी भी राज्य की विकास दर बढ़ती है, तो प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती है. यही वजह है कि राज्य में बिजनेस के जरिए अपना शेयर बढ़ाने के लिए मीडिया ग्रुप में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है. वैसे भी ये सभी ग्रुप पहले से ही राज्य के बिजनेस में भी हैं और आर्थिक तरक्की ने प्रतिस्पर्धा पैदा की है.''

जाहिर है कि सभी ग्रुप विस्तारवादी नीति के जरिए सूबे के सरताज बनने की कोशिश में है. जागरण समूह ने 2007 में पहले इंदौर से अपनी शुरुआत की थी. लेकिन उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली तो अब नईदुनिया के अधिग्रहण के जरिए दैनिक जागरण ने मध्य भारत में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया हैं.

पत्रिका समूह ने 25 मई, 2008 को भोपाल से अपनी लांचिंग की. पत्रिका के नेशनल मार्केटिंग हेड अरविंद कालिया दैनिक भास्कर का नाम लिए बिना कहते हैं, ''मध्य प्रदेश में पत्रिका के प्रवेश से पहले बाजार में एकाधिकार था. अब हम गर्व से कह सकते हैं कि एक अखबार विशेष का वर्चस्व खत्म हो गया है.'' पत्रिका समूह के वरिष्ठ महाप्रबंधक (सर्कुलेशन) बी.आर. सिंह कहते हैं, ''मध्य प्रदेश के बाजार में नंबर वन और दो के बीच काफी अंतर था. लेकिन आज हम भोपाल-इंदौर में सर्वाधिक प्रसार वाले दैनिक बन चुके हैं.''

वैसे मीडिया में वर्चस्व की इस लड़ाई का केंद्र फिलहाल मध्य प्रदेश हो, लेकिन इसकी असली शुरुआत दिसंबर, 1996 में तब हुई थी, जब दैनिक भास्कर ने राजस्थान में पत्रिका की मांद में घुसकर उसे चुनौती दी थी. शुरुआत में तो पत्रिका ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन कीमत घटाने की जंग के बाद भास्कर ने जब चुनौती पेश की तो पत्रिका की मुश्किलें बढ़ने लगीं. कोटनाला कहते हैं, ''जयपुर में लांच के साथ पहले दिन ही हम नंबरवन हो गए.

राजस्थान में हमारी सफलता देश के प्रबंधन संस्थानों के लिए एक केस स्टडी बन गई और अपने फोकस क्षेत्र शहरी राजस्थान में हम सबसे बड़े अखबार हैं.'' पत्रिका ने भी मध्य प्रदेश में भास्कर के एकाधिकार को उसी अंदाज में चुनौती दी. इसके बाद भास्कर समूह ने जागरण समूह को ललकारना शुरू किया.

साल 2000 में भास्कर ने हरियाणा में जागरण के सामने चुनौती पेश की और इसके साथ ही पंजाब केसरी के गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में अमर उजाला घुसा. इस दौर में कीमत और अखबारी मापदंड में कई बदलाव आए. इसके बाद मीडिया के इस महाभारत में एक ठहराव आया, पर भास्कर ने एक बार फिर जागरण के प्रसार वाले क्षेत्र पंजाब में धावा बोला.

पंजाब में भास्कर से मिली चुनौती के बाद जागरण ने गुरुमुखी लिपि में ही अखबार लांच कर दिया. फिर भास्कर ने प्रभात खबर और हिंदुस्तान जैसे प्रमुख अखबारों के गढ़ झारखंड में एंट्री ली और अब बिहार जैसे बड़े राज्य में जाने की तैयारी अंतिम चरण में है. दिल्ली और बिहार का प्रमुख अखबार हिंदुस्तान इन दिनों खासकर उत्तर प्रदेश में अपना लगातार विस्तार कर रहा है और नए संस्कण खोल रहा है. वहीं झारखंड के अखबार प्रभात खबर ने बिहार में कदम बढ़ाए हैं.

बाजार में हिस्सेदारी के लिए अधिग्रहण और विलय भी जारी है. भास्कर ने .जी ग्रुप के साथ साझा उपक्रम बनाकर मुंबई में अंग्रेजी अखबार डीएनए लांच किया था, तो जवाब में जागरण ने मिड डे, उर्दू अखबार इंकलाब और हाल ही में नईदुनिया का अधिग्रहण किया.

बाजार की चर्चाओं की मानें, तो जल्द ही भास्कर समूह एक और अंग्रेजी अखबार अपने साथ लाने और बिहार में जबरदस्त चुनौती देने की तैयारी में है, तो जागरण की नजर भी कोलकाता स्थित एक अंग्रेजी अखबार पर है. उसकी बातचीत ओडिया, गुजराती के साथ-साथ उत्तर भारत के एक स्थापित हिंदी मीडिया समूह से भी चल रही बताई जाती है.

अगले पांच-छह माह में अधिग्रहण की कुछ तस्वीरें साफ होने की संभावना जताई जा रही है. सिर्फ अधिग्रहण ही नहीं, मीडिया समूह अपने ढांचे को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए निरंतर प्रशिक्षण और सालाना बैठक करते रहते हैं. जागरण ने मार्केटिंग से जुड़े लोगों को कुशल बनाने के लिए कैलेंडर बना रखा है, तो भास्कर ने ग्लोबल कंपनी डेल कार्नेगी को अपने साथ जोड़ा है.

मीडिया समूहों में भले महाभारत छिड़ा हो, लेकिन आइआरएस 2011 की चौथी तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि पिछली तिमाही के मुकाबले दैनिक जागरण ने 48,000, दैनिक भास्कर ने 2.74 लाख, राजस्थान पत्रिका ने 71,000 पाठक खोए हैं. जबकि राजस्थान से बाहर पत्रिका के नाम से कदम बढ़ा रहे समूह ने 25 फीसदी की रिकॉर्ड बढ़ोतरी की है. नईदुनिया ने भी चौथी तिमाही में वृद्धि की है, लेकिन उसे 10वें स्थान पर खिसकना पड़ा है. कुल मिलाकर हिंदी मीडिया में भारी उथल-पुथल का दौर है. प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर समूह अपना दायरा बड़ा दिखाना चाहता है, ताकि बाजार में उसका एकछत्र राज कायम हो सके.

साभार- इंडिया टुडे.

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