: नूतन बोलीं- हाईकोर्ट का जुर्माना उचित नहीं : इलाहबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ बेंच में जस्टिस डीके अरोरा की बेंच ने आज मेरे द्वारा दायर सिविल अवमानना याचिका संख्या 1170/2012 में मुझ पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. यह अवमानना याचिका यू के वर्मा, सचिव, सूचना और प्रसारण, मार्कंडेय काटजू, अध्यक्ष, प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया एवं अन्य के विरुद्ध दायर किया गया था. मैंने अपने याचिका में कहा था कि जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस वी के दीक्षित की बेंच द्वारा 10 अप्रैल 2012 को पारित आदेश की अवमानना हुई है.
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि सेना मूवमेंट सम्बंधित कोई भी खबर किसी भी प्रिंट या इलेक्ट्रौनिक मीडिया में नहीं छपे. इस आदेश का पालन करने के स्थान पर 12 अप्रैल को मार्कंडेय काटजू ने उसे गलत बताते हुए दरकिनार कर दिया. मैंने इसे सिविल कंटेम्प्ट बताते हुए यह याचिका दायर की थी. मैंने 26 अप्रैल को प्रकाशित चार खबरों का भी हवाला दिया था जिसमे सेना मूवमेंट की खबरें छपी थीं और इस प्रकार न्यायालय के आदेश की अवहेलना हुई थी.
एकल बेंच ने मेरी बात को गलत मानते हुए याचिका खारिज कर दी. साथ ही उसने मुझ पर एक लाख का जुर्माना भी लगाया. मैं इस जुर्माने से व्यक्तिगत रूप से असहमत हूँ और उसे अनुचित मानती हूँ. इस अवमानना याचिका में मेरी भूमिका मात्र इस प्रकरण को उच्च न्यायालय के सामने लाने की थी. एक तो यहाँ वास्तव में उच्च न्यायालय की अवमानना हुई लेकिन जिन लोगों ने अवमानना की उन्हें दण्डित करने की जगह जस्टिस डी के अरोरा की बेंच ने मुझ पर ही जुर्माना लगा दिया. मैं इस निर्णय को स्पेशल अपील में चुनौती दूंगी. यदि श्रेष्ठ न्यायालयों द्वारा इस प्रकार अपने आदेशों का उल्लंघन करने वालों के स्थान पर इस सूचना को सामने लाने वालों को ही दण्डित किया जाएगा तो यह न्याय की दृष्टि से अहितकारी होगा.
Nutan Thakur





