यूपीए सरकार के तीन साल पूरे हो गए। प्रधानमंत्री बहुत खुश थे। सोनिया गांधी समेत कांग्रेस के बाकी नेता भी कम फूले नहीं समा रहे थे। केन्द्र की उपलब्धियों का बखान करते हुए एक किताब भी प्रकाशित की गई। इसमें सरकार का गुणगान किया गया था। लब्बो लुआब यह कि सभी मान रहे थे कि सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है और देश के सभी लोग इस सरकार से बहुत खुश हैं। प्रधानमंत्री की खुशी जायज भी लगती है। वह बीते आठ सालों से देश के प्रधानमंत्री है। भारत का प्रधानमंत्री बनना यूं भी कम गौरव की बात नहीं है। उस पर लगातार आठ साल तक सत्ता संभालना किसी के लिए भी खुशी की बात होगी।
प्रधानमंत्री इस बात से भी खुश हैं कि दुनिया के बाजार में हम बेहतर तरीके से खड़े हैं। आंकड़ों की मायावी दुनिया उनके पास है। इन्हीं आंकड़ों से उन्होंने लम्बा सफर तय किया है। अब भी उनको लगता है कि देश के लोग इसी आंकड़ों से खुश रहेंगे और अगली बार भी वही प्रधानमंत्री बनेंगे। पिछले दिनों एक एसएमएस बहुत चर्चा में आया। उसमें पूछा गया था कि अगर एक्टिंग का सर्वश्रेष्ठ खिताब किसी को देना हो तो किसको दिया जाए। इसका जवाब आया कि यह खिताब सिर्फ और सिर्फ मनमोहन सिंह को दिया जाना चाहिए। बात कही मजाक में गई थी मगर है हकीकत। मनमोहन सिंह ने पिछले आठ सालों में सिर्फ एक बार अपने तेवर दिखाये थे, जब उन्होंने कहा था कि भारत न्यूक्लियर डील करके रहेगा, चाहे उनकी सरकार रहे या न रहे। इस डील पर उनकी इस मजबूती का ही परिणाम था कि संसद में नोट लहराने की घटना सबने देखी। इसके बाद यह डील हो गयी।
यह प्रधानमंत्री का पहला तेवर था और अब यह सबके सामने आ चुका है कि यह तेवर भारत के लिए नहीं बल्कि अमेरिका के लिए था। मनमोहन सिंह अमेरिका के हितों की कितनी चिंता करते हैं यह बात किसी से छुपी नहीं है। कई बार तो इस सरकार के रवैये को देखकर यह आंकना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि यह सरकार भारतीय नागरिकों के हितों का ध्यान रखती है या फिर अमेरिकी नागरिकों का। मगर अगर ध्यानपूर्वक विश्लेषण करें तो यह आंकलन खुद ब खुद सामने आ जाता है। मनमोहन सिंह ने लंबा जीवन विदेशों में गुजारा है। विश्व बैंक की उन्होंने लम्बे समय तक सेवा की है। भविष्य में भी वह विश्व बैंक के साथ अपना बेहतर संबंध रखना चाहते हैं। इन हालातों में अगर मनमोहन सिंह रुपये के मुकाबले डालर की चिंता ज्यादा कर रहे हों तो यह उनके लिए गलत भी नहीं है। जब पूरी दुनिया में डालर अपनी चमक खो रहा है तब भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जहां डालर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। हमारे प्रधानमंत्री को भी रुपये की बेकद्री ही ज्यादा चिंता नही है। चिंता है तो इस बात की कि डालर की हैसियत कहीं ज्यादा रहनी चाहिए।
तीन साल पूरे होने की खुशी में जश्न मना रहे सरकार के लोग कह रहे थे कि मंहगाई दर भी उतनी नही बढ़ी जितनी दुनिया में बदल रहे हालातों के बाद बदल जाना चाहिए था। कागजों पर बन रहे उनके महल पूरे हैं। आंकड़ो में देश के लोग खुशहाल हो रहे हैं। मगर हकीकत इससे कहीं जुदा है। विभिन्न एजेसिंयों के आंकड़े इस बात का गवाह हैं कि भारत में गरीबों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। बच्चों के स्वास्थ्य के लिए कोई उपाय नहीं है। लिहाजा नवजात शिशुओं की मौत के मामलों में भारत का नाम दुनिया में सर्वोपरि स्थान पर है। कुपोषण के मामले में भी हम कहीं आगे है क्योंकि हमारे पास इतना अनाज नही है कि हम बच्चों को उनकी सेहत के हिसाब से खिला दें। कागजी आंकड़ों पर गर्भवती महिलाओं की देखभाल और चिकित्सा के लिए भले ही नई-नई योजनायें बन गई हो मगर हकीकत का उससे कोई वास्ता नहीं है।
देश की बड़ी आबादी के पास अभी भी दो वक्त की रोटी खाने के लायक पैसे नहीं हैं। भुखमरी के कारण देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार आत्महत्या करने की खबरें मिलती रहती हैं। मगर हम इन मौतों से बेखबर जश्न मनाने में व्यस्त हैं क्योंकि यह मौतें उस गरीब की हैं जिसका इस व्यवस्था को प्रभावित करने का माद्दा नहीं है। वह गरीब है और बेहद गरीब है। उसकी मौत अब तो अखबार की सुर्खियां भी नहीं बनती। लिहाजा वह जब अपने और अपने परिवार का पेट पालने लायक संसाधन नहीं जुटा पाता तो फिर मौत को गले लगाने में ही अपनी भलाई समझता है।
ऐसा भी नही है कि हमारे देश के पास पैदा करने के लिए अन्न नहीं है। हमारे देश ने इतना अन्न पैदा किया है कि जिससे सभी लोगों का पेट भर सकता है। मगर हमारे देश के कर्णधार ऐसा गोदाम भी नहीं बना पाये जिसमें हम यह अन्न रख दें। लाखों कुन्तल गेंहू खुले आकाश के नीचे पड़ा सड़ रहा है और हमारे कर्णधार इतनी व्यवस्था भी नहीं कर पाए कि यह गेंहू गरीबों में ही बांट दें। इससे ज्यादा बेशर्मी किसी भी सरकार के लिए क्या होगी कि सुप्रीम कोर्ट सरकार को निर्देशित करे कि यह गेंहू गरीबों में बांट दो और सरकार के मंत्री कहें कि यह गेहूं समुद्र में फेंक देंगे मगर गरीबों को नहीं बांट पायेंगे। यह सरकार का निकम्मापन और देश के नागरिकों की नपुंसकता का सबसे बड़ा प्रमाण है। इस देश को चलाने वाले लोग जानते हैं कि भारत के लोग सहनशील हैं। वह गरीबी में जीने के आदी हैं। भले ही पांच प्रतिशत लोग देश के सभी संसाधनों पर लगातार कब्जा करते जा रहे हों मगर बाकी लोग कुछ नहीं बोलेंगे। यह खामोशी हमारे नेतृत्व को मौका देती है कि वह अपने अत्याचारों को और बढ़ा सके।
मगर मनमोहन सिंह जी इस देश में एक आवाज और शुरू हो गयी है। भले ही खामोशी से हो मगर इस देश के आम आदमी ने अब
अपनी आवाज को बाहर निकालना शुरू कर दिया है। उसका गुस्सा मुखर होता जा रहा है। कभी शांति से बैठकर सोचिएगा कि जब आप गरीबों से जीने का हक भी छीन लेंगे तो यह बात खुद-ब-खुद समझ में आ जायेगी कि हाथ में बंदूक लेकर लोग नक्सली क्यों बनते जा रहे हैं। तीन साल के कार्यकाल का जश्न मनमोहन सिंह और उनकी टीम मना सकती है मगर लाशों पर खड़े महल बहुत दिनों तक टिक नहीं सकते।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं.





