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भारतीय राजनीति नया चरित्र : समर्थन भी और उसी सांस में विरोध भी

क्या कांग्रेस या केंद्र सरकार में साहस नहीं है कि वह इन मुद्दों को लेकर 1969 की तरह जन अदालत में जाये. आखिरकार देश के प्रमुख आर्थिक सलाहकार डॉ कौशिक बसु तो यही संकेत दे चुके हैं कि 2014 के चुनावों के बाद शायद अर्थनीति पटरी पर आये? ऐसी स्थिति में अब कांग्रेस या केंद्र सरकार अर्थ चुनौतियों के प्रति गंभीर और ईमानदार है, तो ये भ्रष्टाचार से लेकर अराजकता बढ़ानेवाले हर कदम को सख्ती से रोके, कठोर कदम उठाये या चुनावों में जाये.

क्या कांग्रेस या केंद्र सरकार में साहस नहीं है कि वह इन मुद्दों को लेकर 1969 की तरह जन अदालत में जाये. आखिरकार देश के प्रमुख आर्थिक सलाहकार डॉ कौशिक बसु तो यही संकेत दे चुके हैं कि 2014 के चुनावों के बाद शायद अर्थनीति पटरी पर आये? ऐसी स्थिति में अब कांग्रेस या केंद्र सरकार अर्थ चुनौतियों के प्रति गंभीर और ईमानदार है, तो ये भ्रष्टाचार से लेकर अराजकता बढ़ानेवाले हर कदम को सख्ती से रोके, कठोर कदम उठाये या चुनावों में जाये.

अच्छी राजनीति से ही पुख्ता, ठोस और समृद्ध अर्थनीति जन्म लेती है. देश की राजनीति ही दिशाहीन है, इसलिए अर्थनीति से तबाही की बौछारें आ रहीं हैं. खुद भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार, दुनिया के जानेमाने अर्थशास्त्री, कौशिक बसु हाल ही में कह चुके हैं कि राजनीतिक अनिर्णय के कारण अर्थनीति संकट में हैं. एक सड़क छाप आदमी की नजर से तुलना करें, एनडीए के 2004 तक के हालात. उसके बाद यूपीए का पहला, फिर अब तक का दूसरा दौर. अर्थनीति पर बड़े फैसले लेने के संदर्भ में, महंगाई के आलोक में, रुपया बनाम डॉलर का भाव, गैस उपलब्धता की दृष्टि से, पेट्रोल-डीजल के भाव के हिसाब से, आर्थिक विकास की दृष्टि से, रोजगार सृजन की दृष्टि से, प्रतिदिन सड़क निर्माण की तुलना कर.

ऐसे अनेक आंकड़े देखें, स्थिति साफ हो जायेगी. वह और बड़ी साझा सरकार थी. दरअसल, मूल सवाल कुप्रबंधन, फैसला न लेने का मामला है. मुलायम सिंह, यूपीए के जश्न में खास मेहमान बनते हैं. अगले दिन उनके भाई, समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता, राम गोपाल यादव यूपीए को ‘स्कैम वेंडिंग मशीन’ का खिताब देते हैं. बोलते हैं, रोज इस केंद्र सरकार का एक नया घोटाला खुल रहा है. ममता बनर्जी कांग्रेस को कोसती हैं, पर उसी सांस में सरकार को चलाने की बात भी करतीं हैं. लालू प्रसाद जी भी सरकार का बचाव करते हैं. यूरोप को दोषी बताते हैं. दो लाइन में जनता की पीड़ा भी बखानते हैं. भारतीय राजनीति का यह नया चरित्र है, समर्थन भी और उसी सांस में विरोध भी. सत्ता और विपक्ष की भूमिका में एक ही तत्व.

भारत की विकास दर 21 मई 2012 को मोरगन स्टेन्ले ने 6.6 फीसदी आंकी है. इसका आकलन है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में चक्रवात और सुनामी अभी आने हैं. सच यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की दुर्दशा की जड़ में, बीमार और अनैतिक राजनीति है. यूपीए (दो) के जश्न में दो दिनों पहले ही प्रधानमंत्री ने कहा कि लोगों में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘गुस्सा और निराशा’ (एंगर एंड फ्रस्ट्रेशन) है. सारी समस्या की जड़ यही है. पर, सवाल यह है कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने अब तक क्या किया है? भ्रष्टाचार आज भारत के अस्तित्व से जुड़ा सवाल बन गया है. अर्थनीति के बिगाड़ में इसकी निर्णायक भूमिका है. पर बड़े भ्रष्टाचारी, बड़े घोटालेबाज जेल से छूट कर आते हैं, ताव देकर संसद जाते हैं. राजनीति करते हैं. केंद्र असहाय दिखता है. यूपीए सरकार लोकायुक्त बिल की बात करती है, उसके समर्थक घटक उसे न पास होने देने की हुंकार भरते हैं, फिर भी दोनों साथ रहते हैं. मुस्कुराते हैं, सरकार चलाते है.

क्या कांग्रेस या केंद्र सरकार में साहस नहीं है कि वह इन मुद्दों को लेकर 1969 की तरह जन अदालत में जाये. आखिरकार देश के प्रमुख आर्थिक सलाहकार डॉ कौशिक बसु तो यही संकेत दे चुके हैं कि 2014 के चुनावों के बाद शायद अर्थनीति पटरी पर आये? ऐसी स्थिति में अब कांग्रेस या केंद्र सरकार अर्थ चुनौतियों के प्रति गंभीर और ईमानदार है, तो ये भ्रष्टाचार से लेकर अराजकता बढ़ानेवाले हर कदम को सख्ती से रोके , कठोर कदम उठाये या चुनावों में जाये. देश को तबाही के भंवर में न डाले.

दोषी कौन?

यूपीए के तीन वर्ष के जश्न पर यूपीए के बड़े नेता विपक्ष को कोस रहे थे. देश के मौजूदा हालात के लिए. पर सच यह है कि विपक्ष खुद बिखरा है. सरकार में शामिल लोग ही, पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका में हैं. विपक्ष कारगर होता, तो यूपीए के लिए भारी मुसीबत होती. सच है कि यह लुर, क्षमता, प्रतिभा, इफिशियेंसी, जवाबदेही के अभाव ने यूपीए को इस हाल में पहुंचा दिया है. दोष घर का, गाली पड़ोस को. यही हाल है. 22 मई 2012 को तड़के सुबह आंध्र प्रदेश में हांपी एक्सप्रेस (ट्रेन) की दुर्घटना हुई. 25 लोग मारे गये. पिछले तीन वर्षों में ट्रेन दुर्घटनाओं की संख्या और असुरक्षित ट्रेन यात्राओं को गौर करें.

पिछले दो वर्षों में ट्रेन दुर्घटनाओं में 200 से अधिक लोग मारे गये, असुरक्षा और लापरवाही के कारण. 2007-11 के बीच 1600 लोग मारे गये. खतरनाक रेलवे लाइनों और असुरक्षित क्रासिंग के कारण 2010 में 12,972 और 2011 में 14,670 लोग मारे गये हैं. इन मरनेवालों की जिम्मेवारी किसकी है? इसी कांग्रेस के लाल बहादुर शास्त्री ने एक मामूली रेल दुर्घटना के कारण इस्तीफा दे दिया था, रेलमंत्री के पद से. जिम्मेदारी लेते हुए. आज इस हांपी एक्सप्रेस दुर्घटना या अन्य रेलवे दुर्घटनाओं में मारे गये लोगों की दो लाइन चर्चा तक नहीं होती. लगता है, ये मरनेवाले कीड़े-मकोड़े हैं. ऊपर से रेलवे सुरक्षा के 1.26 लाख पद खाली पड़े हैं. हाल की कैग रिर्पोट के अनुसार, टक्कर रोकने वाले संयंत्र घटिया दर्जे के लगे हैं.

यहां भी लोगों की जान जाने के पीछे भ्रष्टाचार है. कहावत है कि एक तो पहले से ही घोर अंधेरा, ऊपर से कालिख पोतना. वही हाल है. राजनीतिक व्यवस्था की लापरवाही, अक्षमता और काहिली के कारण रेलवे की यह दुर्दशा है. एयर इंडिया की तरह या सरकार की अंध अर्थनीति की तरह. पिछले दो वर्षों में तृणमूल के समर्थक-नेताओं का शरणस्थल ही बन गया है, रेल मंत्रालय. अलग-अलग रेल समितियों में तृणमूल के लोग सदस्य बन गये हैं. पिछले दो वर्षों में इन समितियों पर पांच करोड़ खर्च किये गये हैं. जो पार्टी सत्ता में होती है, वह अपने अक्षम, काहिल और बोझ समर्थकों को सरकारी खर्चे पर पांच सितारा जीवन मुहैया कराती है.

एक तरफ सरकार अर्थसंकट का रोना रो रही है, दूसरी ओर पिछले वित्तीय वर्ष में फ्री पास, कंपलीमेंट्री पास देने पर 1436 करोड़ के खर्च किये गये हैं. पचास तरह के लोगों पर यह खर्च हुआ है. क्या यही व्यवस्था है? टैक्स से जनता का खून चूसा जाये, पेट्रोल-डीजल, गैस के दाम बढ़ाये जायें और सरकारी काहिली से रेल दुर्घटना में जनता को ही मारा जाये? ऊपर से कोई जवाबदेही भी न ले. यूपीए की मूल समस्या यही है कि सरकार में न कार्यसंस्कृति रह गयी है, न भ्रष्टाचार पर अंकुश है, न किसी को मालूम है कि क्या हो रहा है? इस तरह अराजकता पांव पसार रही है.

सत्ता पूरी चाहिए पर जवाबदेही रत्ती भर नहीं !

राजा, रजवाड़े या जमींदार क्यों गये? क्योंकि व्यवहार में सभी सत्ता उनके पास थी, पर जवाबदेही नहीं. हालांकि चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, हर्षवर्धन, अकबर जैसे अनेक राजा हुए, जो इस सिद्धांत के अपवाद रहे. पर निरंकुश राजाओं-जमींदारों से तबाह होकर लोगों ने लोकतंत्र की शरण ली. अब लोकतंत्र के नये राजा हैं, विधायक-सांसद, मंत्री-मुख्यमंत्री वगैरह. अब इन नये राजाओं को रोज नये अधिकार चाहिए, पर जवाबदेही रत्ती भर नहीं. गृह मंत्रालय ने सभी सांसदों को गाड़ी पर लाल बत्ती लगाने का प्रस्ताव मान लिया था. कानून बनने के अंतिम क्षणों में सोनिया जी को लगा कि राजनेताओं-सांसदों-विधायकों के प्रति बढ़ती अनास्था-नफरत (जो गलत है, क्योंकि राजनीति से ही सुधार संभव है) के दौर में हर सांसद को लालबत्ती लगाने का अधिकार देना, आग में घी डालने जैसा काम होगा. इसलिए फिलहाल ये प्रस्ताव रुक गया है. सत्ता की यह भूख है, सांसदों की. विशिष्ट से अतिविशिष्ट बनने की भूख.

फर्ज कीजिए, जिन सांसदों पर गंभीर अपराध के आरोप हैं, वे भी लाल बत्ती लगा कर चलेंगे और अफसर व पुलिस के लोग भी लाल-पीली बत्तियों में घूमेंगे, तब कैसा दृश्य होगा? पिछले दिनों सारे सांसदों ने एक मत में कहा कि रेलवे के बड़े अफसर या डीआरएम हमारी बात नहीं सुनते, बात नहीं मानते, इसलिए उनके ऊपर समिति बना कर हमें उनके ऊपर डाल दिया जाये. इसका अपरोक्ष मतलब है, रेलवे का ठेका-पट्टा (टेंडर) वगैरह में हस्तक्षेप करना. यह सच है कि सांसदी का काम संभल नहीं रहा, पर ये अब शासन की बागडोर भी सीधे अपने हाथ लेना चाहते हैं. ये सांसद, कार्यपालिका-विधायिका का फर्क मिटाने पर तुले है? इतना ही नहीं, सावधान हो जाइए, 21 मई 2012 को एक संसदीय समिति ने चुनाव आयोग के अधिकार में कटौती की मांग की है.

चुनाव संहिता न मानने पर चुनाव आयोग की कार्रवाई के अधिकार में कमी की बात कही गयी है. पार्टियों के पंजीकरण रद्द करने से लेकर फर्जी चुनाव रद्द करने के चुनाव आयोग के अधिकार पर पाबंदी की रिपोर्ट आयी है. लोक भाषा में कहें, तो सांसद नख-दंत विहीन चुनाव आयोग चाहते हैं. जब चुनाव आयोग ने (टीएन शेषन के समय से) चुनावों में सफाई का काम किया, तब चुनाव आयोग के ही पर कतरने की तैयारी हो रही है. आखिर सांसद चाहते क्या हैं? निरंकुश राजनीतिक अधिकार सिस्टम, लाल बत्ती की गाड़ी, पर कर्तव्य शून्य? जो संस्थाएं इन नेताओं के कामकाज पर महज सवाल करें (आंदोलन तो दूर की बात है) वह भी इन्हें सहन (सह्य) नहीं. पर महंगाई बेतहाशा बढ़े, रोज भ्रष्टाचार हो. कभी 2जी, कभी कामनवेल्थ गेम्स, कभी हथियार खरीद में गड़बड़ी, कभी रेलवे संयंत्र खरीदने मे हेराफेरी.

अभी कैग की ताजा रपट है कि कोयला आबंटन को निजी कंपनियों को किये गये फेवर से हुआ घोटाला. उधर देश में बुनकर-किसान आत्महत्या कर रहे हैं. महाराष्ट्र में, मंत्री रोज नये-नये घोटालों में लिप्त पाये जा रहे हैं. अर्थव्यवस्था बुरी स्थिति में है. रोजगार घट गये हैं. तीन महीनों में 2600 फ्लाइट रद्द हुई हैं, पूरे देश में. रेल यात्राओं में असुरक्षा है. सड़क अनसेफ है. ब्लैकमनी के सामने संसद-सरकार असहाय है. क्रिकेट मैच खुलेआम अपसंस्कृति फैला रहे हैं. पर संसद इन बड़े सवालों से बेचैन नहीं है, उसे तो लाल बत्ती चाहिए, पंगु चुनाव आयोग चाहिए, अफसरों के अधिकार चाहिए. आखिर किसलिए? संसद को तो प्रभावी नीतियां बना कर देश चलाने का अधिकार है. क्या यह काम ईमानदारी से संसद कर रही है? संसद में सैकड़ों महत्वपूर्ण बिल अटके हैं, ज्वलंत मुद्दों पर गंभीर बहस लगातार घट रही है. ये सांसदों के बुनियादी काम हैं, जिनको लेकर सांसदों को चिंतित होना चाहिए था.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. यह खबर प्रभात खबर में छप चुका है वहीं से साभार लिया गया है.

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