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आडवाणी जी, मीडिया की कृपा से राष्‍ट्रीय नेता बनने वालों से देश को बचाने की जरूरत

नई दिल्ली : बीजेपी में बड़े नेताओं के बीच हमेशा से ही मौजूद रहा झगड़ा सामने आ गया है. लाल कृष्ण आडवाणी ने पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष के काम काज के तरीकों पर सवाल उठाया है. कहते हैं कि मीडिया के लोग केंद्र सरकार पर हमला कर रहे हैं लेकिन उनका अपना गठबंधन भी सही काम नहीं कर रहा है. आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर अपनी तकलीफों को कलमबंद किया है और ६० साल की अपनी राजनीतिक यात्रा को याद किया है. उन्होंने लोगों को याद दिलाया है कि वे बीजेपी की पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ के संस्थापक सदस्य हैं.

नई दिल्ली : बीजेपी में बड़े नेताओं के बीच हमेशा से ही मौजूद रहा झगड़ा सामने आ गया है. लाल कृष्ण आडवाणी ने पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष के काम काज के तरीकों पर सवाल उठाया है. कहते हैं कि मीडिया के लोग केंद्र सरकार पर हमला कर रहे हैं लेकिन उनका अपना गठबंधन भी सही काम नहीं कर रहा है. आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर अपनी तकलीफों को कलमबंद किया है और ६० साल की अपनी राजनीतिक यात्रा को याद किया है. उन्होंने लोगों को याद दिलाया है कि वे बीजेपी की पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ के संस्थापक सदस्य हैं.

उनको याद है कि १९८४ में उनकी पार्टी लोक सभा चुनावों में बुरी तरह से हार गयी थी. २२९ उम्मीदवार खड़े किये गए थे और केवल दो सीटें ही हाथ आई थीं. उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में पार्टी जीरो पर थी लेकिन कार्यकर्ता कहीं भी हार मानने को तैयार नहीं था, वह अगली लड़ाई के लिए तैयार था और हमने आगे चल कर कुशल रणनीति से चुनावी सफलता हासिल की और सरकारें बनाईं.

इस के बाद लाल कृष्ण आडवानी ने पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी के काम की आलोचना शुरू कर दी. उन्होंने लिखा है कि जिस तरह से उत्तर प्रदेश के एक भ्रष्ट नेता को साथ लिया गया उस से पार्टी को बहुत नुकसान हुआ है. झारखण्ड और कर्नाटक में भी पार्टी ने भारी गलती की. यह सारी गलतियाँ नितिन गडकरी ने ही की हैं. तीनों ही मामलों में भ्रष्ट लोगों को साथ लेकर पार्टी ने यूपीए के भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने का नैतिक अधिकार खो दिया है. इसी लेख में आडवाणी जी ने अरुण जेटली और सुषमा स्वराज के काम को एक्सीलेंट बताया है. ज़ाहिर है कि वे नितिन गडकरी के काम काज से संतुष्ट नहीं हैं और वे उनको दूसरा टर्म देने की बात से खासे नाराज़ हैं.

लाल कृष्ण आडवाणी की नाराज़गी के कारण समझ में आने वाले हैं. लेकिन केवल गडकरी की आलोचना करके आडवाणी जी ने अपने आपको एक गुट का नेता सिद्ध कर दिया है. इस सारे घटनाक्रम से साफ़ नज़र आ रहा है कि वे गडकरी गुट के खिलाफ अपने लोगों की तारीफ़ कर रहे हैं. सच्चाई यह है कि उनकी पार्टी जिसमें कभी ज़मीन से जुड़े नेता राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होते थे लेकिन अब नहीं हैं. अब बीजेपी का राष्ट्रीय नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथ में है जिनका अपनी ज़मीन पर कोई असर नहीं है. १९७५ में यही काम कांग्रेस की नेता इंदिरा गांधी ने शुरू किया था और कांग्रेस जो बहुत बड़ी और मज़बूत पार्टी हुआ करती थी, वह रसातल पहुंच गयी थी. १९७१ के लोक सभा चुनाव के बाद इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को अपने बेटे संजय गांधी के हाथ में थमा दिया था.

संजय गांधी भी ज़मीन से जुड़े हुए नेता नहीं थे. उन्होंने दिल्ली में रहने वाले कुछ अपने साथियों के साथ पार्टी को काबू में कर लिया और उसका नतीजा सबने देखा. कांग्रेस १९७७ में कहीं की नहीं रही, इंदिरा गाँधी और संजय गांधी खुद चुनाव हार गए. १९८० में इंदिरा गाँधी की वापसी हुई लेकिन वह जनता पार्टी की हर ज्यादा थी, कांग्रेस को तो नेगेटिव वोट ने सत्ता दिलवा दी थी. उसके बाद केंद्र के किसी भी नेता को बाहैसियत नहीं बनने दिया गया. वीपी सिंह ने जब कांग्रेस से बगावत की तो जनता ने उन्हें तख़्त सौंप दिया. लेकिन उनके साथ भी वही लोग जुड़ गए जो राजीव गांधी को राजनीतिक रूप से तबाह कर चुके थे. बाद में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का झगड़ा हुआ और बीजेपी को धार्मिक ध्रुवीकरण का चुनावी लाभ मिला और बीजेपी वाले अपने आप को बड़ा नेता मानने लगे.

आज देश का दुर्भाग्य है कि दोनों की बड़ी पार्टियों में ऐसे नेताओं का बोलबाला है जो दिल्ली के लुटेंस बंगलो ज़ोन में ही सक्रिय हैं. कांग्रेस में भी जो लोग पार्टी के भाग्य का फैसला कर रहे हैं उनमें से सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अलावा किसी की हैसियत नहीं है कि वह लोक सभा का चुनाव जीत जाए. प्रधानमंत्री से लेकर नीचे तक उन्हीं लोगों की भरमार है जो राष्ट्रीय नेता हैं लेकिन राज्य सभा के सदस्य हैं. यही हाल बीजेपी का है. अपने राज्य से चुनाव जीत कर आने वाला कोई भी नेता राष्ट्रीय नेता नहीं है. जो लोग खुद ताक़तवर हैं उन्हें दरकिनार कर दिया गया है. कुछ लोग जो लोक सभा में हैं भी वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कृपा से चुनाव जीतकर आये हैं. दोनों ही पार्टियों में राज्य सभा के सदस्य राष्ट्रीय नेता मीडिया प्रबंधन में बहुत ही प्रवीण हैं और मीडिया के ज़रिये राष्ट्रीय नेता बने हुए हैं. जो लोग ज़मीन से जुड़े हैं. लोक सभा का चुनाव जीतकर आये हैं वे टाप नेतृव नहीं हैं.

अगर अपने ब्लॉग में आडवाणी जी ने दोनों की पार्टियों के इस मर्ज़ की तरफ संकेत किया होता तो यह माना जाता कि वे देश की राजनीति में कुछ शुचिता लाने की बात कर रहे हैं. उनकी टिप्पणी से यही लगता है कि वे बीजेपी में अपने गुट के दबदबे के लिए कोशिश कर रहे हैं. मीडिया की कृपा से नेता बने लोगों से जब तक राष्ट्रीय राजनीति को मुक्त नहीं किया जाएगा, आम आदमी राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं होगा.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तम्‍भकार हैं. वे एनडीटीवी, जागरण, जनसंदेश टाइम्‍स समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों दैनिक देश बंधु को वरिष्‍ठ पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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