मुंगेर। मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और पुलिस महानिदेशक अभयानन्द की अगुवाई में बिहार में आर्थिक अपराधियों के फन को कुचलने का अभियान जोर-शोर से चल रहा है। दूसरी ओर, सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना की त्रुटिपूर्ण ‘‘बिहार विज्ञापन नीति-2008‘‘ के कारण कारपोरेट मीडिया सरकार की बिहार विज्ञापन नीति-2008 का माखौल उड़ा रहा है और सरकार के मुखिया को चिढ़ा-चिढ़ा का संदेश दे रहा है कि ‘‘नीतिश जी, सरकार बिहार में कारपोरेट मीडिया की है। कारपोरेट मीडिया बिहार में सरकार चल रहा है। ‘‘दैनिक हिन्दुस्तान सरकार की विज्ञापन नीति-2008 को अंगूठा दिखाकर अपनी दादागिरी और धौंस के बलपर खगड़िया नगर परिषद से अनाधिकृत रूप में विज्ञापन उठा लिया है और दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित कर दिया है। अब अखबार उस अवैधढंग से अर्जित विज्ञापन के भुगतान के लिए जी तोड़ प्रयास कर रहा है।
बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना के सचिव राजेश भूषण ने वर्ष 2008 में ‘‘बिहार विज्ञापन नीति-2008‘‘ जारी की और बिहार सरकार के सरकारी विज्ञापन के प्रकाशन की कानूनी शर्त्तें तय कीं। बिहार विज्ञापन नीति-2008 में पृष्ठ संख्या-03 पर कंडिका -04 एवं शीर्षक विज्ञापन निर्गम एवं भुगतान की प्रक्रिया में सरकार ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि –‘‘‘बिहार सरकार के समस्त विज्ञापन निर्गम कार्य, बिहार सरकार के स्वामित्व एवं नियंत्रण में पड़नेवाले परिनियत निकाय/निगमों/लोक उपक्रमों/ प्रतिष्ठानों/प्राधिकारों/ समितियों आदि सहित केवल न्यायालय को छोड़कर सूचना सिर्फ सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में केन्द्रीकृत रहेगा एवं समस्त विज्ञापन भुगतान कार्य परिनियत निकाय/ निगमों/ लोक उपक्रमों/प्रतिष्ठानों/ प्राधिकारों/ समितियों एवं न्यायपालिका को छोड़कर सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में केन्द्रीकृत रहेगा।‘‘
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति माननीय मार्कण्डेय काटजू का यह आरोप बिलकुल झूठा प्रमाणित हो रहा है कि बिहार सरकार के दवाब में बिहार में कारपोरेट मीडिया को काम करना पड़ रहा है बल्कि सच्चाई कुछ और है। सच्चाई यह है कि कारपोरेट मीडिया के ही दवाब और गिरफ्त में बिहार सरकार के कुछ विभाग, खासकर सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय और श्रम विभाग काम कर रहे हैं। बिहार सरकार की देश भर में फजीहत कराने में बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की अहम भूमिका रही है। इसका ताजा दृष्टांत यह है।
बिहार विज्ञापन नीति -2008 के आलोक में राज्य सरकार के स्वामित्व और नियंत्रण में चलनेवाले परिनियत निकाय। निगमों को विभागीय विज्ञापन सीधे अखबार के पास प्रकाशन हेतु नहीं भेजना है। परन्तु कारपोरेट मीडिया के दवाब और आन्य लालच में सरकार की विज्ञापन नीति-2008 को ठेंगा दिखाकर बिहार सरकार के नियंत्रणाधीन अनेक निकाय और निगम दैनिक अखबारों को सीधे विज्ञापन प्रकाशन हेतु भेजते आ रहे हैं और अखबार मनमाना आकार में और मनमाना विज्ञापन दर पर प्रकाशन शुल्क वसूल रहा है। इस प्रकार, निकाय और निगम के अधिकारी मीडिया हाउस को अनुचित लाभ पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
सरकारी सूत्र बताते हैं कि बिहार सरकार की बिहार विज्ञापन नीति-2008 के अक्षरशः पालन नहीं होने के पीछे सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की दिमागी कसरत है। विज्ञापन नीति -2008 में विज्ञापन नीति का उल्लंघन करनेवाले सरकारी पदाधिकारियों के विरूद्ध किसी भी स्तर पर विभागीय कार्रवाई या दोषी पदाधिकारियों के वेतन से अवैध ढंग से प्रकाशित विज्ञापन की राशि की वसूली या निलंवन का कोई प्रावधान ही नहीं है। इसका अनुचित लाभ कोरपोरेट मीडिया और विज्ञापन लूट में शामिल सरकारी पदाधिकारीगण उठा रहे हैं।
सबूत के तौर पर दैनिक हिन्दुस्तान के 30 मई, 2012 के मुंगेर संस्करण में पृष्ठ-06 पर नगर परिषद, खगड़िया का छपा विज्ञापन है। विज्ञापन का शीर्षक है ‘‘कार्यालय नगर परिषद, खगड़िया/ विज्ञापन सूचना।‘‘ इस विज्ञापन में पटना के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय का विज्ञापन रिलीज नम्बर का उल्लेख नहीं है। यह प्रमाणित करता है कि यह विज्ञापन अवैध ढंग से कारपोरेट मीडिया के दवाब में सीधे तौर पर प्रकाशन हेतु अखबार को भेजा गया है। बिहार विज्ञापन नीति के अनुरूप यह विज्ञापन नगर परिषद, खगड़िया से सीधे सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना भेजा जाना था जो यह तय करता कि यह विज्ञापन किस अखबार को किस आकार में प्रकाशन हेतु भेजना है। आश्चर्य यह भी है कि विज्ञापन जारी करनेवाले व्यक्ति का पदनाम भी विज्ञापन में नहीं प्रकाशित किया गया है। बिहार विज्ञापन नीति-2008 को ठेंगा दिखाने में हिन्दुस्तान के साथ-साथ बिहार के अन्य हिन्दी और अंग्रेजी दैनिक अखबार भी शामिल हैं।
मुंगेर से काशी प्रसाद की रिपोर्ट।
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