: छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता : ‘पार्टी मेरी मां है, मैं पार्टी से बड़ा कैसे हो सकता हूं? गुजरात चुनाव में दुबारा जीत मिलने के बाद बड़े ही भावुक अंदाज़ में नरेंद्र मोदी का तब का यह बयान वास्तव में भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए जीत की खुशी के सोने पर सुहागे जैसा ही था. उस एक बयान से न केवल भाजपाइयों के मन में आशंका के बादल छंटे थे बल्कि खुद मोदी ने भी पार्टी में अपने कद को कई गुना बड़ा कर लिया था. लेकिन प्रभुता का अभिमान कहें या कुछ और, भाजपा की हालिया कार्यसमिति में संजय जोशी को इस्तीफा देने पर मजबूर कर भले मोदी खुद को विजेता समझ रहे हों लेकिन उन्होंने अपना नैतिक कद काफी छोटा कर लिया है.
सवाल बार-बार यही उठ रहे हैं कि आखिर कसूर क्या था संजय जोशी का ? घोषित तौर पर तो ऐसा कोई भी आरोप सामने नहीं आया है जिसके कारण जोशी को इतना अपमानित होना पड़े. समाज के नायकों की तो प्रकृति ही यह होनी चाहिए कि वह अपने निर्णयों में व्यक्तिगत राग-द्वेष को कभी प्रश्रय नहीं दें. अगर वे राजनीति में हो तो सबसे पहले देश, उसके बाद अपनी पार्टी के हित को सर्वोपरि रख कर ही किसी तरह का निर्णय करना वांछनीय होता है. सवाल यह है कि भाजपा कार्यकर्ताओं को कभी मोदी इस बात के लिए संतुष्ट कर पायेंगे कि आखिर कौन सा ऐसा संकट आ गया था जिसके कारण उन्हें ‘तू नहीं या मैं नहीं’ का फतवा देना पड गया.
निश्चित ही इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि नरेंद्र मोदी आज भाजपा के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं. आगामी गुजरात चुनाव का निर्णय न केवल मोदी के खुद के कद के लिए, बल्कि संपूर्ण भाजपा के लिए लिटमस टेस्ट जैसा होगा. विचाधारा से लेकर पार्टी की शासन पद्धति, विकास को लेकर उनकी सोच आदि सभी चीज़ों का प्रयोग स्थल हो गया है गुजरात. यह भी निर्विवाद सत्य है कि वहां पार्टी को लगातार मिलती जा रही सफलता में सबसे बड़ा योगदान खुद मोदी का ही है. लेकिन इतनी उपलब्धि के कारण ही यह उचित है कि नदी खुद को किनारे से ऊंचा समझने लगे? भाजपा के लिए तो उत्तर प्रदेश के चुनावों में दो महीने तक मोदी का इंतज़ार किया जाना या पिछली कार्यसमिति में सारे मुद्दों पर केवल एक मुद्दे को भारी पड़ना कि मोदी बैठक में आयेंगे या नहीं, ये शर्मनाक ही था.
निश्चित ही लोकतंत्र की आत्मा इसी में सन्निहित है कि यहां कोई एक सबसे बड़ा नहीं होता. भाजपा की तो सबसे बड़ी ताकत (और कमजोरी भी कभी-कभार) यही है कि यहाँ कभी भी व्यक्ति या वंश के आधार पर निष्ठा तय नहीं होता है. आप इसे यूं भी कह सकते हैं कि समूचे देश में (वामदल और जदयू को छोड़ कर) आज भाजपा के अलावा कोई भी दल ऐसा नहीं बचा जहां एक व्यक्ति या परिवार का वर्चस्व न हो. बस भाजपा इस मामले में ज़रूर अलग है. आज भी यहां दरी बिछाने वाला कार्यकर्ता कल को राष्ट्रीय अध्यक्ष तक बनने का सपना पाल सकता है या वार्ड पार्षद से शुरू कर कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बन प्रधानमंत्री बनने का मंसूबा भी संजो सकता है. देखा जाय तो यही ‘लोकतंत्र’ का सौंदर्य भी है.
नरेंद्र मोदी की कई उपलब्धियों के बावजूद यह कहना होगा कि देश में ऐसी सफलता हासिल करने वाले वे कोई इकलौते व्यक्ति नहीं हैं. भाजपा की ही अगर बात करें तब भी पार्टी के अन्य मुख्यमंत्री भी अपनी-अपनी सीमा में रह कर अच्छा काम कर रहे हैं. निश्चित ही गुजरात आज विकास और सुशासन के लिए जाना जाता है लेकिन उसी कार्यसमिति में एक अन्य भाजपा शासित प्रदेश छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का पीडीएस समेत अन्य अच्छे कार्यों के लिए अभिनन्दन होने का सन्देश भी साफ़ ही है. निश्चित ही राष्ट्रवाद की विचारधारा को मोदी रास आते हैं लेकिन ये भी गौर करना होगा कि नक्सल समस्या आज राष्ट्र के लिए मजहबी आतंक से बड़ा संकट है. खुद केन्द्र भी यह मान रहा है कि आंतरिक सुरक्षा को सबसे बड़ी चुनौती माओवाद से है. और इस संकट से दृढ़ता से निपटते हुए भी रमन सिंह का भले मानुष की अपनी छवि बना कर रखना महत्वपूर्ण बात है. कम से कम ऐसा संतुलन मोदी में तो नहीं दिखता. तो इस मुद्दे से भी बेहतर ढंग से निपटने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के सम्मान की बात हो या फिर बेहतर कार्य निष्पादन के लिए मध्यप्रदेश का बार-बार संघ द्वारा पीठ थपथपाने की बात. भाजपा का सन्देश साफ़ है कि काम बेहतर मोदी ‘भी’ कर रहे हैं लेकिन मोदी ‘ही’ नहीं.
अगर बात केवल मुख्यमंत्री बने रहने की हो तो वास्तव में मोदी अपने प्रदेश में अजेय हो सकते हैं. हालांकि कार्यकर्ताओं में वहां भी पनप रहा आक्रोश गौर करने लायक है और इस आक्रोश को संजय जोशी के अपमान ने बढ़ाया ही है. पर प्रधानमंत्री पद के लिए तो इनकी राहें इतना आसान नहीं है. हाल के इन कुछ अड़ियल रवैये के कारण उन्होंने अपना रास्ता निश्चय ही और भी मुश्किल कर लिया है. अव्वल तो यह कि खुद पार्टी में ही उनकी वैसी स्वीकार्यता नहीं है जैसा कभी अटल-आडवानी का हुआ करता था. उसके बाद एनडीए के कई घटक को भी मोदी फूटी आंख नहीं सुहाते. भाजपा के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगी जदयू के नितीश कुमार के साथ इनके कटु संबंधों पर कोई मलहम लग पाया हो ऐसा देखने में नही आया है. अगर इन्होंने दक्षिण के कुछ दलों को साध भी लिया हो तो ऐसे संबंध हाल के दिनों में अन्य भाजपाई मुख्यंत्रियों ने भी बखूबी किया है भले ही उसका प्रचार उन्होंने इतना न किया हो.
अगर बात संख्या बल की बात हो तो कुल 15 सांसद अभी गुजरात से भाजपा के हैं. इन सभी का समर्थन मोदी के साथ हो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. फिर अगले चुनाव के बाद भी इन सीटों को कायम रखना एक चुनौती ही है. जबकि इसके उलट मध्यप्रदेश से भाजपा के 16 सांसद या छत्तीसगढ़ से पार्टी के एकजुट 10 सांसद या फिर बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान आदि से आने वाले सदस्यों में कितने को मोदी स्वीकार्य होंगे यह कहा नही जा सकता. इसी तरह अगर संगठन की बात की जाय तो आज संजय जोशी को बाहर करा कर मोदी ने खुद की तूती भले बुलवा भी लिया हो लेकिन ये वक्त की नजाकत से ज्यादा कुछ नहीं है. ज़ाहिर है भाजपा संगठन कम से कम इतना तो मानता ही है कि सामने उपस्थित गुजरात चुनाव में मोदी अपरिहार्य होंगे. इसके अलावा पार्टी एक साथ ढेर सारे मोर्चे नहीं खोलना चाह रही होगी. अभी-अभी राजस्थान में वसुंधरा के विद्रोह की बात हो या फिर कर्नाटक में येदुरप्पा की इन सबसे जूझते हुए निश्चय ही भाजपा फिलहाल एक और संकट मोल लेना नहीं चाहती थी. खास कर इसलिए भी क्यूंकि खुद नितिन गडकरी के दुबारा अध्यक्ष बनने हेतु पार्टी के संविधान में संशोधन की ज़रूरत थी. तो ज़ाहिर है मोदी की जिद्द पर, आसान शिकार संजय जोशी का इस्तीफा ले लेना ही ठीक लगा. बहरहाल.
लोकतंत्र की आलोचना करने वाले समूह हमेशा हिटलर का उदाहरण देते हुए इस प्रणाली को गलत ठहराने का प्रयास करते रहे हैं. शायद ही यहाँ संयोग हो कि कांग्रेस ने मोदी की तुलना हिटलर के ही प्रचार प्रमुख गोयबल्स से किया है. लेकिन भाजपा को जानने वाले यह समझते हैं कि वहां संगठन ही एक ऐसी नैतिक सत्ता है जो जनादेश पाये किसी नेता को तानाशाह बनने से रोकता है. अभी तक के ढेर सारे उदाहरण इसी बात की गवाही देते हैं कि कम से कम भाजपा में कोई व्यक्ति पार्टी से बड़ा नहीं हो सकता चाहे उसे कैसा भी जनादेश मिला हो. बात चाहे अभूतपूर्व बहुमत के साथ सत्ता में आयी उमा भारती की हो या हिंदू ह्रदय सम्राट कहा चुके कल्याण सिंह की, गुजरात में ही शंकर सिंह बाघेला की हो या झारखंड में बाबूलाल मरांडी की. पार्टी लाइन से निकलने के बाद सभी अंततः बियाबान में जाने को मजबूर हुए थे. भाजपा के झोले में सैकड़ों सीट दिलाने वाली उमा भारती तो खुद की सीट तक नही बचा पायी थी. उमाश्री जैसा जनादेश तो मोदी को मिला भी नही है. कम से कम अभी तक का अनुभव तो यही कहता है कि भाजपा में किसी व्यक्ति का शरद पवार, लालू यादव, नीतिश कुमार आदि बन पाना तो संभव नही है. नरेंद्र मोदी को अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपना ‘मन’ अपने ‘कद’ से बड़ा रखना होगा, उस कद से बड़ा जिसे हालिया प्रकरण ने फिलहाल काफी छोटा कर दिया है.
लेखक पंकज झा भाजपा से जुड़े हुए हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं.






