पिछले महीने आदित्य बिड़ला समूह ने इंडिया टुडे समूह में 27.5 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी। हालांकि सौदे की रकम का खुलासा नहीं किया गया। इस साल जनवरी में मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इनाडु के नेटवर्क 18 के साथ एक जटिल सौदे के तहत किए गए विलय को वित्तीय मदद मुहैया कराई। पिछले साल दिसंबर में अभय ओसवाल की ओसवाल ग्रीन टेक ने एनडीटीवी में 24.24 करोड़ रुपये के निवेश से 14.2 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी।
ऐसा भी नहीं है कि दिग्गज भारतीय कंपनियों ने हाल में ही मीडिया एवं मनोरंजन (एमऐंडई) क्षेत्र में निवेश करना शुरू किया है। भारती एयरटेल डीटीएच, मीडिया आउटसोर्सिंग और संगीत के कारोबार में सक्रिय है। देश की सबसे बड़ी डीटीएच फर्म टाटा स्काई में टाटा समूह की बहुलांश हिस्सेदारी है। कुछ साल पहले इसने फिल्म निर्माण में भी हाथ आजमाए थे। आदित्य बिड़ला समूह भी टेलीविजन और फिल्मों से जुड़ा रहा। महिंद्रा समूह भी प्रकाशन उद्योग के अलावा मुंबई मंत्र के जरिये फिल्म निर्माण में भी लगा है। राजन रहेजा की हैथवे इन्वेस्टमेंट आउटलुक, हैथवे केबल और डाटाकॉम का मालिकाना हक रखती है। लेकिन फिलहाल हम इस उद्योग में जिस तरह अधिग्रहणों की आंधी देख रहे हैं, वैसा सिलसिला पहले कभी नहीं दिखा। आखिर भारतीय उद्योग जगत के तमाम दिग्गज उस क्षेत्र पर क्यों दांव लगा रहे हैं जिसे मुश्किल समझा जाता है?
तकरीबन 80,000 करोड़ रुपये के मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग ने वित्तीय और रणनीतिक दोनों तरह के निवेशकों को निराश किया है। मोटे तौर पर निवेशक इस क्षेत्र से बहुत ज्यादा मुनाफा नहीं बना पाए हैं। मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग की 13 सूचीबद्घ कंपनियों (जी को छोड़कर) के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) की कीमत के 31 मई तक के रुझान से यह साबित हो जाता है। इनमें से केवल छह कंपनियों के शेयरों में सकारात्मक रुख देखा गया जिनकी सालाना चक्रवृद्घि दर (सीएजीआर) ने मुनाफा दर्शाया जबकि शेष में नकारात्मक रुख देखा गया। इन छह कंपनियों में से केवल यूटीवी का सीएजीआर ही दहाई अंकों में रहा जबकि शेष का दायरा एक से नौ फीसदी के बीच में ही रहा। भारत में मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग में निवेशक मुनाफा नहीं बना पा रहे हैं यह समझने के लिए आपको इस विश्लेषण की जरूरत नहीं है।
सौदों का प्रवाह कहानी खुद बयां करता है। वीसीसीऐज डाटा के अनुसार वर्ष 2007 में इस क्षेत्र में जहां 55.3 करोड़ डॉलर का निवेश हुआ था वहीं वर्ष 2012 के पहले पांच महीनों में यह आंकड़ा सिमटकर 9.4 करोड़ डॉलर पर आ गया। निवेशक भारत में मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग को खास तरजीह नहीं दे रहे हैं। क्रय शक्ति वाले 35 करोड़ उपभोक्ताओं वाले बाजार में विज्ञापनों में दहाई की वृद्घि और मीडिया का बढ़ता दखल कहता है कि यह तस्वीर बदली हुई होनी चाहिए। क्या ऐसा नहीं है। जरा डीटीएच प्रसारण पर गौर करिए। करीब छह कंपनियों ने पिछले नौ वर्षों में इस बाजार में 4 अरब डॉलर (22,000 करोड़ रुपये) झोंक दिए। अभी तक इनमें से केवल एक ही कंपनी परिचालन मुनाफा बना रही है। एक ओर जहां डीटीएच से इस उद्योग में पारदर्शिता बढ़ी है और यह प्रसारकों के लिए कमाई बेहतर कर रहा है वहीं कीमत नियमन, अधिक कर और बाधित नीतियों की वजह से उनके लिए कमाई मुश्किल हो रही है। पूरे मीडिया और मनोरंजन उद्योग की यही व्यथा-कथा है। औचक नियमन, अत्यधिक बिखराव और कई मामलों में मुनाफा कमाने के लिए जरूरी ढांचा बनाने में नाकाम कंपनियों की अक्षमता कारोबारी योजनाओं को हकीकत का रूप नहीं लेने देती। लगभग 60,000 से अधिक केबल ऑपरेटर, दर्जनों छोटे अखबार, टीवी कंपनियों को अपनी जागीरें बहुत प्रिय हैं, एकीकरण और दायरा बढ़ाने से मुनाफा मुश्किल जो हो जाता है।
1,789 करोड़ रुपये की हैसियत वाला नेटवर्क18 समूह बड़े पैमाने पर क्षमता विस्तार कर रहा है, कंपनियों के अधिग्रहण में व्यस्त है और किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार है। लेकिन आखिरकार क्या हुआ कि पिछले साल इसका कर्ज कंपनी की कमाई के बराबर हो गया। 1,500 करोड़ रुपये के इंडिया टुडे समूह के बारे में कहा जा रहा है कि उसे अपने दैनिक मेल टुडे की वजह से नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि दोनों ही कंपनियों की झोली में कुछ ऐसे नगीने हैं जो निवेशकों के लिहाज से बढिय़ा परिसंपत्तियां हैं। नेटवर्क18 के पास सीएनबीसी, कलर्स, फोब्र्स, मनीकंट्रोलडॉटकॉम सहित जैसे माध्यम हैं तो वहीं इंडिया टुडे के पास उसका पत्रिका प्रभाग और टीवी कंपनी है जो आज तक सहित कई चैनलों का मालिकाना हक रखती है।
इस तरह से इन कंपनियों में निवेश की जरूरत तो रही है। चूंकि वित्तीय निवेशक और वृद्घि के वित्तपोषण के लिए तैयार नहीं हैं, ऐसे में भीमकाय मीडिया कंपनियां बतौर रणनीतिक निवेशक, सबसे बेहतर दांव साबित होंगी। हालांकि भारतीय मीडिया कंपनियां इस तरह के अधिग्रहणों को करने के लिहाज से उतनी बड़ी नहीं हैं, ऐसे में नजर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर जाकर ठहरती है। लेकिन अधिकांश विदेशी मीडिया कंपनियां अपने घरेलू बाजार में आई मंदी सेे जूझ रही हैं। ऐसे में वे भारत जैसे जटिल बाजार में जोखिम लेने में दिलचस्पी नहीं रखतीं। इसके बाद एक ही श्रेणी बचती है और वह है दिग्गज भारतीय कंपनियां।
हो सकता है कि उनकी नजर मुनाफे से परे हो। मसलन प्रभाव या रुआब। लेकिन आप दूसरों की तरह यह तर्क भी दे सकते हैं कि प्रभाव के लिए उन्हें मीडिया कंपनी के सहारे की जरूरत नहीं। यह भी जरूरी नहीं कि मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार में सक्रिय किसी कंपनी को मुश्किलें नहीं झेलनी पड़तीं। यहां आउटलुक मामले में हैथवे इन्वेस्टमेंट पर कर विभाग की सख्ती एक उम्दा मिसाल है। दूसरी और अधिक संभावित वजह यही लगती है कि दिग्गज भारतीय कारोबारी मीडिया कारोबार को समझना चाहते हैं। इसके लिए वे कुछ मुनाफे का त्याग करने को भी तैयार हैं। वित्तीय निवेशकों के लिए सब्र थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन कारोबारी दिग्गज ऐसा कर सकते हैं। यह भारतीय मीडिया मालिकों के लिए भी सुकून देने वाला है। देखिए और इंतजार करिए कि यह नया तरीके कैसे रंग लाता है। साभार : बीएस





