: हरिवंश कहिन – भाग (1) : ग्लोबल बनती दुनिया में बाजार सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है. बाजारों के. इर्द-गिर्द ही चीजें घटित हो रही हैं. बाजार को नियंत्रित व संचालित करने का दर्शन प्रबंधन कहलाता है. इसलिए यह प्रबंधन का दौर भी है. जैसे पहले विचारों का दौर होता था. विचार चाहे अराजकतावादी हो या समाजवादी, साम्यवादी हो या मध्यमार्गी या फासिस्ट हों या कोई अन्य, हर दौर में उन विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाले समाज में अग्रणी या चर्चित भूमिका में होते थे. आज इन सबको पीछे छोड़कर बाजार के दौर में सिर्फ एक ही दर्शन रह गया है- मैनेजमेंट का दर्शन.
इसलिए दुनिया में मैनेजमेंट एक्सपर्ट आज सबसे अधिक पैसा पाने वाले सम्मानित और व्यस्त सलाहकार हैं. प्रबंधन की यह
दुनिया मानती है कि किसी भी कंपनी या इकाई को सक्षम तरीके से चलाने के लिए एक विजनरी सीइओ चाहिए. इस सीइओ मापदंड या कसौटियां पूर्व निर्धारित हैं. यानी कम से कम खर्चपर अधिक से अधिक मुनाफा लगातार इनोवेटिव तरीकों से मुनाफा बढ़ाना.
इस तरह एक सीइओ पूरी तरह बाजार के कारकों की देन है और इसके पीछे मैनेजमेंट का दर्शन है. लेकिन अखबार का संपादक इससे भिन्न है. हालांकि आज एक संपादक को मैनेजर की तरह भी काम करना है. प्रतिस्पर्धा के इस दौर में उसे सुनिश्चित करना है कि टेक्नोलॉजी के बेहतर उपयोग, कम से कम खर्च में वह कैसे बेहतर निकाल ले. एक संपादक को आज अखबारों की दुनिया को जानना अनिवार्य है. बाजार में किन कारकों से अखबार का बिजनेस-व्यापार प्रभावित होता है, आज के बाजार के कौन-कौन से तत्व बढ़ाते-घटाते हैं, उसके प्रतिस्पर्धी अखबार किन-किन बाजार योजनाओं को अपनाकर प्रसार, व्यवसाय या अखबार का प्रोफाइल तय कर रहे हैं, आज यह एक संपादक को जानना जरूरी है.
बाजार व अखबारी व्यवसाय को अधिकाधिक. सूचनाओं से वह संपन्न नहीं है तो संपादक प्रभावी नहीं हो पाएगा. अखबार किस विजन के तहत निकले, उसका दर्शन या उसकी पहचान क्या हो, वह समाज के किन सवालों और किन पक्षों के साथ खड़ा होता है, यह सब समाज और बाजार की सूचनाओं से ही संपादक तय करता है. अपने समय की चुनौतियों से वह महज लाभ न कमाए बल्कि उन सामाजिक चुनौतियों के प्रति एक सजग और सकारात्मक दृष्टि विकसित करने की कोशिश होनी चाहिए. इस तरह अन्य संस्थाओं के किसी लीडर या सीइओ की तुलना में अखबार के संपादक की भूमिका भिन्न है. क्या संपादक आज भी अपरिहार्य हैं? संपादक संस्था की अपरिहार्यता के बावजूद उसे गौण करने के पीछे किसके क्या हित रहे होंगे और इससे अखबार को अंततः किस किस्म के नुकसान उठाने पड़े या पड़ेंगे?
मेरे निजी विचार में संपादक के बगैर अखबार की कल्पना अधूरी है. संपादक नितांत अपरिहार्य इकाई है. वही प्रबंधन की नीतियों और अपने समाज की चुनौतियों के बीच तालमेल बिठाकर अखबार और समाज को आगे ले जाने की पहल करता है. संपादक कई सवालों पर निष्पक्ष तरीके से अकेले भी खड़ा होता है. इसलिए वह सरकार, प्रभावी ताकतों के साथ ही प्रबंधन की दृष्टि में भी कई बार अनावश्यक दिखाई पड़ने लगता है. राह के. रोड़े की तरह. इन सभी तत्वों में मिलकर इस पद के महत्व को कम करने के कोशिश की है. आज बड़े पैमाने पर मालिक ही संपादक की भूमिका में है.
ऐसे मालिक, प्रबंधन और बाजार को कुशलता से नियंत्रित या संचालित करने में माहिर हो सकते हैं. लेकिन अखबार की दुनिया भिन्न है. कंटेंट मैनेजर में ये मालिक उतने ही दक्ष नहीं हैं और अपने हितों को पूरा करने के लिए वे पग-पग पर कंटेंट से समझौता करते हैं. सामाजिक हितों के आगे वे नि.स्वार्थो को प्राथमिकता देते हैं. कुछेक मालिक-संपादक भी अच्छे हुए हैं या हो सकते हैं, पर यह अपवाद जैसा ही है. मैं ऐसा नहीं कहता कि गैर मालिक-संपादक ऐसा बिल्कुल नहीं करते. वे भी सत्ता प्रतिष्ठान से तरह-तरह के. लाभ लेते हैं. फिर भी तुलनात्मक तौर पर उन्हें अपने सामाजिक दायित्व का एहसास होता है. उसका दबाव होता है. यही कारण है कि जो संपादक हितों की राह में आड़े आया, उसे प्रबंधन से मिलकर सरकार या शासक वर्ग या उद्योगपति ने सबसे महत्वहीन बनाने की कोशिश की.
जो संपादक, मालिक, या सरकार या प्रभावशाली लोगों के हित साधने के लिए आज तैयार हैं, वह खुद भी बड़े पैमाने पर अपने हित और स्वार्थ पूरे कर रहा है. लेकिन इससे भविष्य में बननेवाले समाज पर जो गहरा असर हो रहा है, उसे समझने के लिए कोई तैयार नहीं है. संपादक पद खत्म होने का नुकसान अखबार, संपादक और देश सबको उठाना होगा. जहां संपादक कमजोर है या अपनी दुनिया समृद्ध करने की दौड़ में शामिल है, वहां आप देख सकते हैं कि किस तरह सामाजिक हितों के सवाल लगातार गौण होते जा रहे हैं. संपादक विहीन अखबारों में पैसा देकर खबरें या फोटो छपवाने की बातें प्रमुखता से छपीं. चुनाव के दौरान अनेक. बड़े अखबारों ने ऐडटोरियल छाप कर पैसे लिये. पेज थ्री नामक जिस पत्रकारिता का विकास हुआ, वह संपादक विहीनता से ही शुरू हुआ.
मैं यह नहीं कहता कि संपादकों के रहते ऐसे काम नहीं होते या नहीं हो रहे. होते हैं या हो रहे रहे हैं. पर समाज का उसपर दबाव है. पाठकों का दबाव है. जब ब्रांड मैनेजर अखबार निकालने के काम में लगेगा, तो वह हर खबर को पैसे की दृष्टि से तौलेगा या खरीदेगा-बेचेगा. इससे किस तरह का ट्रेंड विकसित होता दिख रहा है. सक्षम वर्ग,शासक. वर्ग और पैसे वाले वर्ग की ही खबरें प्रमुखता से छपेंगी, आत्महत्या करते किसानों की स्थिति ऐसे समाज में या संपादक विहीन अखबार में हाशिये पर ही रहेगा. संपादक विहीन अखबार महज कारोबारी खबर तक ही सिमट जाएंगे.
(देश के जाने-माने पत्रकार और प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश के एक लंबे इंटरव्यू का अंश.)





