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अगर आपके पास खुद कहने के लिए कुछ नहीं है तो क्यूं निकालते हैं अखबार?

Pankaj Jha : घिन आती है छोटे-छोटे अखबारों की भीड़ देख कर. सारे अखबारों में केवल विभिन्न साइटों से लिये लेखों को छाप-छाप कर पेज भर दिया जाता है. सवाल ये है कि अगर आपके पास खुद कहने को कुछ नहीं है तो निकालते क्यूं हैं अखबार आप? केवल ब्लेकमेल करने और चरित्रहनन करने के लिए? बस ये सोच कर कि जब गाली देना होगा दे दूंगा बाकी समय के लिए नेट है ना ? और छापने का खर्च देने के लिए सरकार है ही. सीधी अंगुली से नहीं टेढी अंगुली से निकाल लेंगे. कल हो के ज़मीन भी उसी नाम पर ले लेंगे. ब्लेकमेलर कहीं के…उफ़.

Pankaj Jha : घिन आती है छोटे-छोटे अखबारों की भीड़ देख कर. सारे अखबारों में केवल विभिन्न साइटों से लिये लेखों को छाप-छाप कर पेज भर दिया जाता है. सवाल ये है कि अगर आपके पास खुद कहने को कुछ नहीं है तो निकालते क्यूं हैं अखबार आप? केवल ब्लेकमेल करने और चरित्रहनन करने के लिए? बस ये सोच कर कि जब गाली देना होगा दे दूंगा बाकी समय के लिए नेट है ना ? और छापने का खर्च देने के लिए सरकार है ही. सीधी अंगुली से नहीं टेढी अंगुली से निकाल लेंगे. कल हो के ज़मीन भी उसी नाम पर ले लेंगे. ब्लेकमेलर कहीं के…उफ़.

       Ashok Sharma Bilkul sahi kahaa aapne vo sirf vidhayak aur sansad ki chamchagiri karke add aadi hasil karke unki hi khabre chhap chhap kar apni roji roti chalate hain……………..
 
        Keshav Patel ‎.शब्दों का ज्ञान ज्ञानी होने का भ्रम पैदा कर अपने अज्ञानता को छिपाने का साधऩ तलाशा जा रहा है…..वो लोग खतरनाक होते हैं जो दोहरी जिंदगी जीते हुए खुद के साथ साथ समाज के लिए भी खतरा बने रहते हैं…आज वर्तमान परिदृश्य में सब कुछ बदला बदला है नगर बंधुओं की जगह मोहल्लों ने ली है कोठे की जगह दरबारों ने…चरित्रहीन माननीय और पूजनीय हो गये हैं..इस सब मं यदि कोई नहीं है तो वह है कृष्ण अर्जुन…..कहा जा सकता है सब साधन दूषित हो गये तो साधक कैसे बच सकता है ….
   
        Ashish Jha कई चैनल भी ऐसे ही चल रहे हैं। सभी समाचार दिखा डालते हैं और एजेंसी को बताते ही नहीं।
    
        Himanshu Mishra bade akhabar kya kar rahe hain pankaj bhai……..
     
        Suresh Chiplunkar गंदा है पर "धंधा" है ये…। वैसे मुझे भी इस प्रकार की सलाह दी जा चुकी है कि आप अखबार निकालो… कहाँ हिन्दुत्व के चक्कर में पड़े हो… लेकिन मेरी "हिम्मत" नहीं हुई… 🙂 🙂
      
        Kumar Gaurav जब इंडियन एक्सप्रेस जैसे बड़े अखबार भी यही कर रहे हैं , तो फिर फुटपाथी अखबारों को क्यों दोष दें ?
       
        Ashish Jha पंकज भाई की नजर में सभी अखबार छोटे हो गए हैं। बडे अखबार अब छपते कहां है। सबका आकार छोटा हो गया है।
        
        Shreekumar Gudhiyari Menon Chote akhabar un bade akhbaro aur patrakaro se acche hai jo paise aur package lekar jhooti aur biasaed khabare chapte hai
         
        Sunil Roy Baat sirf chhote ya bare ki nahi hai, bahas akhbaro ki staryita per kendrit honi chahiye.aaj jyadatar reporters police-prashasan -neta ke dalal bankar rah gaye hain.sach kaha jaya to aaj pathako ka print media se rujhaan kam hua hai .mere vichar se saare dainik patro ko saptahik me badal dena chahiye isse peir kam kategein aur paryawarn ka bhi fayada hoga.
         
        Dhirendra Giri vigyapan or ugahi ke liye?¡¡
         
        Praveen Pathak dosi koun… jimmedar koun..?

भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय पंकज झा के फेसबुक वॉल से साभार.

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