: हरिवंश कहिन – भाग (2) : मेरी निजी धारणा है कि हिंदी पत्रकारिता में कम लोगों ने बदलती दुनिया के साथ सामंजस्य बनाने की कोशिश की है. इकीसवीं सदी की दुनिया भिन्न तरीके से बन रही है. बदलाव की गति बहुत ही तेज है. 1991 के आसपास दुनिया की जानी-मानी पत्रिका द इकोनोमिस्ट की एक पत्रकार ने पुस्तक लिखी थी- द डेट ऑफ डिस्टेंस इसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह तकनीक या संचार माध्यमों के आर्विभाव या तेज यातायात ने दुनिया को व्यापक पैमाने पर बदला है.
इस बदलाव के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक कई पहलू हैं. ग्लोबलाइजेशन से एक नया समाज उभर रहा है, नई अर्थव्यवस्था उभर रही है. इन चीजों को गहराई से जानने-समझने वाले लोग आज हिंदी में कितने पत्रकार हैं? यह आर्थिक समृद्धि से संचालित दौर
कहा जाता है. लेकिन किस तरह की नई अर्थव्यवस्था उभर रही है. इसकी जानकारी कितने हिंदी संपादकों और पत्रकारों को है. इन बदलावों पर लगातार अनेक. महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी जा रहीं हैं. लेकिन क्या अखबारनवीस उन पुस्तकों को पढ़ते हैं? दरअसल अपने समय और काल को समझकर ही कोई संपादक पत्रकारिता में अपनी भूमिका निभा सकता है.
संपादक और अखबारनवीसों में पढ़ने की प्रवृत्ति का बड़े पैमाने पर क्षय हुआ है. बेहतर होता अगर संपादक. हिंदी पत्रकारिता से जुड़े अखबारनवीस बदलते समय को गंभीरता से समझने की कोशिश करते. 1980 तक स्थिति भिन्न थी. हिंदी पत्रकारिता में बड़े पैमाने पर ऐसे पत्रकार आते थे, जिनकी व्यापक दृष्टि होती थी और वे लगातार अलग-अलग किस्म के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विषयों से जुड़ा साहित्य पढ़ा करते थे. फिलहाल यह प्रवृत्ति कमजोर हुई है.
भारतीय परिवेश में संपादकों को समाज और लोगों ने भिन्न दृष्टि से देखा है. आजादी की लड़ाई में गांधी, तिलक और अरविंद जैसे लोगों ने भी पत्रों का संपादन किया. मेरी निजी मान्यता है कि ऐसे लोग मूलतः पत्रकार नहीं थे. ये सहस्त्राब्दियों में पैदा होनेवाले दृष्टिसंपन्न लोगों में से थे. इन्होंने अपने व्यापक काम के लिए पत्रकारिता को हथियार बनाया और पत्रकारिता की कसौटी भी इन महापुरुषओं ने तय की. इनके अलावा प्रतिबद्ध संपादकों की एक अलग परंपरा है, जो मूलतः पत्रकार थे. मैं उन्हें महर्षि संपादक. या पत्रकारिता का पथप्रदर्शक मानता हूं.
इस परंपरा में गणेश शंकर विद्यार्थी, विष्णु राव पराडकर, गर्दे जी, अंबिका प्रसाद वाजपेयी, माखनलाल चतुर्वेदी वगैरह थे. यह सूची लंबी है. इन दिनों अंगरेजी या बांग्ला और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी ऐसे संपादकों की बड़ी सूची मिलती है. इन्हीं लोगों ने अपने कामकाज से संपादकों की एक ऐसी छवि पेश की, जिसे समाज ने आदर के साथ देखा और सम्मान दिया. उस युग में पत्रकारिता के इन धारा प्रवत्तर्कों के कारण प्रेरित होकर अनेक मूर्धन्य संपादक और पत्रकार निकले. जिले-जिले में भी उन दिनों ऐसे संपादक और पत्रकार हुए, जिन्होंने उन महान लोगों से प्रेरित होकर स्थानीय स्तर पर भी पत्रकारिता की एक गौरवमयी छवि बनायी. इससे ही यह धारणा निकली कि संपादक या पत्रकार सत्ता के आगे नहीं झुकते. सच को वरीयता देते हैं, सामाजिक हितों के लिए निजी लाभ की परवाह नहीं करते.
पत्रकारिता को अपनी निजी प्रगति का हथियार नहीं बनाते. उन दिनों यह सोचना भी नामुमकिन था कि कोई पत्रकार या संपादक अपनी कुर्सी का उपयोग सत्ता पाने या ब्लैकमेल के जरिये पूंजी कमाने के लिए करेगा. इस तरह भारतीय पत्रकारिता की बुनियाद बड़े आदर्शो, सर्वश्रेष्ठ मूल्यों और व्यापक जीवन दृष्टि से समृद्ध हुई. यह भारतीय पत्रकारिता का गौरवपूर्ण अतीत है. आजादी के बाद भी यह परंपरा अपवाद नहीं बनी. लेकिन पिछले दस-पंद्रह वर्षो के दौरान भारत में पत्रकारिता और पत्रकार अपनी साख खोते नजर आ रहे हैं. आज देश में बड़े पैमाने पर जनमत सर्वेक्षण होते हैं.
इन रिपोर्टो में यह तथ्य सामने आया है कि जनता की निगाह में आज पत्रकार और पत्रकारिता दोनों को भ्रष्ट संस्थाओं की सूची में शामिल किया जा रहा है. यह निराधार नहीं है. अगर अपने आसपास हम पत्रकारिता को देखें और संपादकों के काम पर नजर डालें, तो लगेगा कि भारतीय पत्रकारिता का मौजूदा दौर क्षय या पतन का है. दंगा करानेवाले संपादक बनते हैं, ब्लैकमेलिंग में भूमिका निभानेवाले पत्रकार बनते हैं. सिर्फ प्रेस कार्ड के लिए बिना वेतन काम करने वाले लोग पत्रकार बनते हैं और बदले में उस कार्ड से समाज को ब्लैकमेल करते हैं. आज की तारीख में मौजूदा पत्रकार बौद्धिक या नैतिक रहनुमा नहीं रह गया है. स्वाभाविक है कि समाज उसे दागदार या भ्रष्ट की सूची में ही मानेगा. आश्चर्य है कि.
पत्रकारिता में इस गिरावट पर कोई चिंता नहीं है. हम राजनीति में, उद्योग में, संस्कृति में या समाजिक जीवन में पतन का रोना रोते हैं, लेकिन अपने ही प्रोफेशन को पतनोन्मुख होते देखकर हम बिल्कुल चिंतित नहीं हैं. आज जरुरत है कि एडिटर्स गिल्ड या प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्था को सशक्त बनाने के लिए पत्रकार समूहों या जाने-माने संपादकों की ओर से कोशिश हो. फिर सरकार एवं अन्य राजनीतिक दलों से बातकर इन संस्थाओं को कानूनी ढंग से मजबूत किया जाय. इस संस्थओं को यह अधिकार मिलना चाहिए कि संपादकों के चयन में संबंधित अखबार घरानों से मिलकर वे संपादकों और पत्रकारों का चयन योग्यता के आधार पर होना सुनिश्चित कराएं.
यह भी अनिवार्य किया जाना चाहिए कि संपादक अपनी और अपने परिवार की संपत्ति का विवरण अपनी संस्था और प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड को दें. पत्रकारों, संपादकों को आचार संहिता तब होनी चाहिए. यह कठिन काम है. लेकिन इसके बगैर पत्रकारिता की नैतिक आभा वापस नहीं आने वाली. व्यवसाय की दृष्टि से पत्रकारिता बहुत बड़ी हो सकती है, लेकिन नैतिक दृष्टि से वह साख खोती जा रही है.
विकसित और पश्चिमी देशों में भी पत्रकारों को लोग मित्र, मार्गदर्शक और एक नैतिक ताकत के बतौर देखते रहे हैं. यूरोप में अखबरों की परंपरा या अमेरिकी अखबारों में काम, मसलन वाटरगेट प्रकरण को लोग अब भी भूले नहीं हैं. दरअसल समाज या भारतीय पाठक संपादक या पत्रकारिता को आज भी एक उम्मीद और अपेक्षाकी दृष्टि से देखता है. वह मानता है कि राजनीति में पतन हुआ है तो दूसरा दीप-स्तंभ उसे तथ्यों से रू-ब-रू करायेगा. बेखौफ होकर हकीकत बतायेगा. लेकिन पत्रकारिता में आज उल्टी धारा चल रही है. समाज के ताकतवर और शासकवर्ग लोगों के साथ संबंध बनाना संपादकों और पत्रकारों का मकसद हो गया है. यह बड़ा खतरनाक और गंभीर गठजोड़ है. पूंजी, सरकार, नौकरशाही और पत्रकारिता का गठजोड़ हिंदी इलाकों में कई जगहों पर साफ दिखाई देता है. लेकिन सब कुछ स्वच्छंद तरीके से चल रहा है न कोई अंदरूनी अकाउंटीबिलिटी है और न इसे ठीक करने की कोशिश. सब कुछ भगवान भरोसे है. इससे संपादक या पत्रकारिता लोगों की निगाह में संदिग्ध बनेगी ही.
(देश के जाने-माने पत्रकार और प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश के एक लंबे इंटरव्यू का अंश.)





