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डिंपल यादव का निर्विरोध निर्वाचन तो लोकतंत्र का मर जाना ही है

डिंपल यादव का कन्नौज से इस तरह निर्विरोध जीत जाना क्या लोकतंत्र का मर जाना भी नहीं है? खतरनाक है इस तरह लोकतंत्र का मर जाना। मुक्तिबोध की एक कविता ऐसे में याद आती है, 'मर गया देश, जीवित रहे तुम।' आखिर हम किस लोकतंत्र में आ गए हैं? डिंपल क्या इतनी सर्व-स्वीकार नेता हैं कि उन के खिलाफ़ किसी राजनीतिक दल ने उम्मीदवार ही नहीं खड़ा करना चाहा? बल्कि यह दूसरा सवाल है। पहला सवाल यह है कि क्या डिंपल यादव राजनीतिज्ञ भी हैं? उन की योग्यता यही तो है कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी हैं। मुलायम सिंह यादव की बहू हैं। एक चुनाव फ़िरोज़ाबाद से हार चुकी हैं। कांग्रेस के राज बब्बर से। और फिर क्या डिंपल के अलावा कोई और उम्मीदवार समाजवादी पार्टी में नहीं शेष रह गया था?

डिंपल यादव का कन्नौज से इस तरह निर्विरोध जीत जाना क्या लोकतंत्र का मर जाना भी नहीं है? खतरनाक है इस तरह लोकतंत्र का मर जाना। मुक्तिबोध की एक कविता ऐसे में याद आती है, 'मर गया देश, जीवित रहे तुम।' आखिर हम किस लोकतंत्र में आ गए हैं? डिंपल क्या इतनी सर्व-स्वीकार नेता हैं कि उन के खिलाफ़ किसी राजनीतिक दल ने उम्मीदवार ही नहीं खड़ा करना चाहा? बल्कि यह दूसरा सवाल है। पहला सवाल यह है कि क्या डिंपल यादव राजनीतिज्ञ भी हैं? उन की योग्यता यही तो है कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी हैं। मुलायम सिंह यादव की बहू हैं। एक चुनाव फ़िरोज़ाबाद से हार चुकी हैं। कांग्रेस के राज बब्बर से। और फिर क्या डिंपल के अलावा कोई और उम्मीदवार समाजवादी पार्टी में नहीं शेष रह गया था?

 
या क्या यह मुलायम ब्रिगेड की गुंडई से उपजा परिदृष्य भी है? इसी कन्नौज से लोहिया एक बार संसद पहुंच चुके हैं। और बोफ़ोर्स के असल हीरो टी.एन.चतुर्वेदी जैसे व्यक्ति इसी कन्नौज से चुनाव हार भी चुके हैं। तब जब एक समय वी. पी. सिंह एंड कंपनी के लोग अरुण नेहरु आदि जब कन्नौज जाते थे तब वहां की माटी माथे पर लगाते थे यह कह कर कि यहां कि माटी बड़ी पावन है, पवित्र है, और कि टी. एन. चतुर्वेदी यहीं के हैं और कि उन्हों ने ही बोफ़ोर्स का घपला बतौर सी.ए.जी. सामने किया था। कन्नौज की माटी तब उन्हें बड़ी पवित्र लगती थी। पर वही टी.एन. चतुर्वेदी जब कन्नौज से चुनाव लड़े तो उन की ज़मानत तक ज़ब्त हो गई। इन्हीं मुलायम सिंह यादव एंड ब्रिगेड के चलते। तब टी.एन.चतुर्वेदी को चुनाव में ठीक से प्रचार तक नहीं करने दिया गया था। उन के कार्यकर्ताओं को मारा पीटा गया अलग से। और एक समय केंद्रीय गृह सचिव की कुर्सी पर बैठने वाले टी.एन. चतुर्वेदी आंख में आंसू भरे यह सब देखते रहे थे। तब के दिनों मुलायम सिंह यादव ही मुख्यमंत्री थे। अब उन के पुत्र अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हैं। बाद में जब टी.एन. चतुर्वेदी एक बार एक इंटरव्यू के समय मुझे इस का व्यौरा बताने लगे तो उन की आंखों में खून के आंसू थे। और अब उसी कन्नौज में डिंपल यादव के खिलाफ़ कोई चुनाव लडने की हिम्मत नहीं कर पाया।
 
तो क्या गुंडई और सरकारी मशीनरी जब एक साथ खडी हो जाती है तो यही होता है? अस्सी के दशक के शुरुआती दिनों की बात है। मैं तब दिल्ली में रहता था। एक बार गोरखपुर गया था। गोलघर बाज़ार में कुछ दोस्तों के साथ खड़ा बतिया रहा था कि मेरे गांव के प्रधान जी उधर से गुज़रे। मेरी पट्टीदारी के थे। उम्र में बड़े थे सो संस्कारवश उन को देखते ही उन के पांव छुए। और पास खड़े दोस्तों से उन का परिचय करवाया कि, 'हमारे गांव के प्रधान जी हैं, हमारे भइया हैं।' और फिर जैसे मुझे याद आया तो यह भी बताया कि, 'खासियत यह है कि आज की तारीख में भी निर्विरोध चुने गए हैं।' 
 
मुझे लगा कि यह उन की तारीफ़ तो होगी ही अपने गांव की भी तारीफ़ होगी कि जहां ग्राम प्रधानी के चुनाव में जगह-जगह से खून-खच्चर की खबरें आने लगी थीं, उस दौर में हमारे गांव में निर्विरोध प्रधान चुना जा रहा है। पर मेरा यह कहना भर था कि, 'निर्विरोध चुने गए हैं।' प्रधान जी की आंखों में खून उतर आया। फ़ुल वाल्यूम में भड़क पडे। गांव भर की मादर-फ़ादर की। और बमके, 'कवने सारे क हिम्मत रहल जवन हमरे आगे खड़ा होत?' हम सब को सांप सूंघ गया उन के इस बमकने से। मैं पछताया कि काहें भला इन का परिचय दोस्तों से करवाया। खैर वह बमक कर चले गए। हम लोग दूसरी बातों में लग गए। लेकिन मैं सोच में पड़ गया। इस लिए भी कि प्रधान जी की छवि गुंडई की तो हरगिज़ नहीं थी। तो फिर ऐसा क्यों कहा उन्हों ने? बाद में मैं ने गांव में पता किया तो दूसरी ही बात पता चली। लोग उन से इस लिए डरते थे कि वह सूदखोरी का धंधा करते थे। और कि गांव जवार में ज़्यादातर लोग उन के कर्ज़दार थे। सब की पुरनोट उन के पास थी।
 
 
तो क्या यहां भी सभी राजनीतिक पार्टियों की पुरनोट अखिलेश यादव के पास है? गुंडई और सरकारी मशीनरी का ज़ोर तो खैर है ही। कम से कम कांग्रेस की पुरनोट तो है ही समाजवादी पार्टी के पास। बाहर से ही सही समर्थन तो है ही केंद्र सरकार को। पहले भी यू.पी.ए.-1 के समय वाम दलों के समर्थन वापसी के समय यही समाजवादी पार्टी सजीवनी बूटी बन कर सामने आई थी और सरकार बच गई थी। अब यू.पी.ए.-2 में भी ममता की धौंस के समय भी यही समाजवादी पार्टी ढाल बन कर खड़ी होती है सरकार बचाने को। और तिस पर राष्ट्रपति चुनाव सिर पर है। तो कांग्रेस की पुरनोट तो है ही समाजवादी पार्टी के पास।
 
पर बहुजन समाज पार्टी? जिसे अभी एक दिन पहले ही समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने ऐन विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष कहने के बजाय नेता शत्रु पक्ष कह कर संबोधित किया है और आन रिकार्ड कहा है। वह बसपा भी क्यों नहीं आई कन्नौज में डिंपल के खिलाफ़ चुनाव मैदान में? और पार्टी विथ डिफ़रेंस भारतीय जनता पार्टी भी? कभी हां, कभी ना कहती हुई सो क्यों गई भाजपा?
 
तो क्या यह कोई बड़ी राजनीतिक मजबूरी थी? या सिर्फ़ और सिर्फ़ समाजवादी गुंडई का भय ही है? राजनीतिक पंडित और प्रेक्षक इस के चाहे जो मतलब या कयास लगाएं और बताएं पर सच यही है कि यह लोकतंत्र के लिए कतई शुभ नहीं है। संसदीय जनतंत्र वैसे भी इस समय दांव पर है। संसदीय गरिमा संसद में ही अब विलुप्त हो रही है। लगभग सभी राजनीतिक दल अब प्राइवेट लि. कंपनी भी नहीं, कारपोरेट सेक्टर में तब्दील हैं। तो ऐसे समय में डिंपल यादव का कन्नौज संसदीय सीट से निर्विरोध चुना जाना आतंक पैदा करता है जनतंत्र के खिलाफ़। आप मान लीजिए कि जैसे हमारे गांव में अस्सी के दशक में उस प्रधान जी का आतंक था, भले ही सूदखोरी का सही, अब वह आतंक एक दूसरे रुप में उत्तर प्रदेश में भी फैल गया है। तब प्रधान जी ने निर्विरोध चुनाव जीता था, अब डिंपल जीत गई हैं। बात एक ही है। बस आतंक फैल कर एक गांव से देश की संसद में पहुंच गया है।
 
आप देखिए कि अभी हो रहे निकाय चुनाव से भी उत्तर प्रदेश में सत्ता पक्ष और मुख्य प्रतिपक्ष अनुपस्थित है। और कि ऐलानिया तौर पर अनुपस्थित है। तो क्या इन पार्टियों का जनतंत्र में यकीन है भी भला? आखिर जो राजनीतिक दल निकाय चुनाव को हेय समझता हो उसे आखिर क्या अधिकार है विधान सभा या लोकसभा का भी चुनाव लड़ने का और वहां बैठने का भी? बसपा और सपा का यह रंग उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृष्य को बदरंग करता है। बसपा तो खैर शुरु ही से निकाय चुनाव में अनुपस्थित रहती आई है। और अब की सपा भी बसपा की ही राह चल पडी है। जाने यह संयोग है कि प्रवृत्ति सपा और बसपा दोनों ही की प्राथमिकताएं हमेशा ही से एक जैसी रही हैं। तानाशाही, भ्रष्टाचार, बेशर्मी और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रख देना, सिद्धांत में कुछ और व्यवहार में कुछ सर्वदा ही से दोनों ही पार्टियों के मूलभूत सिद्धांत रहे हैं। बसपा राज आता है तो दलित उपनिवेश में उत्तर प्रदेश तब्दील हो जाता है। हर जगह दलित अफ़सर नज़र आने लगते हैं। और जब सपा का राज आता है तो पूरा प्रदेश यादव उपनिवेश में तब्दील हो जाता है। हर जगह यादव अफ़सर और उन की हनक दिखाई देने लगती है।
 
और जब दोनों पार्टियां संग साथ थीं, तब की याद कीजिए। दोनों की मिली जुली सरकार थी। दोनों ही पार्टियां दबे-कुचलों, गरीब-गुरबों की बात करती थीं। पर जब राज्यसभा में किसी को भेजने की बात आई तो बसपा ने उद्योगपति जयंत मल्होत्रा को भेजा और सपा ने राज बब्बर को। इन की प्राथमिकताएं शुरु से ही यही और ऐसी ही रही हैं। आय से अधिक संपत्ति की सी.बी.आई. जांच इन्हीं दोनों के मुखिया लोगों मुलायम और मायावती पर ही है। उत्तर प्रदेश में आयुर्वेद से ले कर अनाज घोटाले तब के मुलायम राज में हुए तो मायावती राज में मंडी घोटाला, कृषि फ़ार्म घोटाला, फ़ायर घोटाला से लगायत एन. आर.एच. एम. और पत्थर घोटालों की अनंत फ़ेहरिस्त है। स्थिति क्या भूलू, क्या याद करूं वाली है।
 
और जो यह निर्विरोध डिपल यादव का चुना जाना है, संसदीय राजनीति के पतन की पराकाष्ठा कहिए, रसातल कहिए या चाहे कोई और विशेषण दीजिए पर हो यही गया है। और यह भी अनायास नहीं है कि अविभाजित उत्तर प्रदेश में वह पहली निर्विरोध सांसद चुने जाने का तमगा हासिल किए जाने पर समूची विधान सभा इस पर मनन करने के बजाय ध्वनि-मत से प्रस्ताव पास कर देती है। और अखबारों या चैनलों पर भी अहा-अहा ही होता है। यहां बुद्धिनाथ मिश्र का एक गीत याद आता है :
ऊपर-ऊपर लाल मछलियाँ
नीचे ग्राह बसे।
राजा के पोखर में है पानी की थाह किसे।
 
तो इस जनतंत्र में बड़ी तेज़ी से फिर से उपज रहे राजतंत्र की यह आहट आखिर हमारे संविधान पंडित या राजनीतिक पंडित क्या नहीं देख पा रहे? कि समाजवादी गुंडई और सरकारी मशीनरी के वशीभूत इन सब की आंख पर भी मोतियाबिंद की मोटी परत जम गई है? पूछने को मन होता है कि हे मुलायम सिंह यादव ! अब आप की बहू लोकसभा तो पहुंच गईं। तो क्या आप को महिला आरक्षण के विरोध में बल्कि कहूं कि महिलाओं के अपमान में दिया गया वह अपना बयान क्या आज भी याद है कि ऐसी औरतें जब लोकसभा में आएंगी तो लोग सीटी बजाएंगे ! आखिर डिंपल जी पढी-लिखी भी हैं और अपने पिता के घर से सवर्ण भी हैं।
 
मुक्तिबोध और कि बुद्धिनाथ मिश्र को अब एक साथ याद करना फिर ज़रुरी है : 'मर गया देश, जीवित रहे तुम।' और कि, 'ऊपर-ऊपर लाल मछलियाँ /नीचे ग्राह बसे।/राजा के पोखर में है पानी की थाह किसे।' अब इन राजा बने राजनीतिज्ञों और उन के पोखर के

 पानी की थाह लेना सचमुच बहुत ज़रुरी हो गया है। कोई माने या न माने। क्यों कि अब यह देश तो मार ही चुके हैं और मार कर उसे परिवारवाद, भ्रष्टाचार और कारपोरेट के पिंजड़े में कैद कर चुके हैं। अब जनता त्राहि-त्राहि करे या त्राहिमाम ! इन को कोई फ़र्क नहीं पडने वाला।

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्‍यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. इनका यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

 

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