: हरिवंश कहिन – भाग (3) : प्रभात खबर और झारखंड के चयन पर : टाइम्स आफ़ इंडिया समूह (बंबई) के मशहूर और उस दौर में सबसे अधिक बिकनेवाले हिंदी साप्ताहिक धर्मयुग और आनंद बाजार पत्रिका के रविवार हिंदी साप्ताहिक के बाद बंद प्राय प्रभात खबर (कांग्रेसी लेबल अलग) में न संस्थान का नाम-अस्तित्व, न अखबार में जान. न रांची से पहचान. बंबई, कलकत्ता जैसे बड़े शहरों के बाद रांची की पत्रकारिता. राजधानी, राजनीति और महानगरों की पत्रकारिता का ग्लैमर छोड़ कर जंगलों-पहाड़ों की पत्रकारिता! कैरियर-भविष्य से जुड़े अनेक प्रश्न उन दिनों मथते रहते थे.
कई मित्र पत्रकार-कलीग तो मेरे पत्रकारीय जीवन के अंत की बात मुझे बता चुके थे. शुभचिंतक साथी नहीं चाहते थे कि मैं छोटी-अनजान जगह जा कर गुम हो जाऊं. दिल्ली-बंबई के वरिष्ठ पत्रकार (जिनसे पत्रकारिता सीखी) मित्र वहीं आने का प्रस्ताव-सलाह
दे रहे थे. बरसों रांची में गुजारने के बाद भी ऐसे शुभचिंतक मित्र नहीं भूले. पर झारखंड के आदिवासी समाज की सादगी पर मुग्ध था. फ़ादर बुल्के, फ़ादर पीपोनेट, बीपी केसरी जी से मेरी पहले की मुलाकातों (रविवार-धर्मयुग में काम करते हुए) ने इस समाज की ओर खींचा था. महानगरों की पत्रकारिता से सफ़लता की निकली सीढ़ियां (मेरे साथ के कई पत्रकारों ने इन रास्तों को चुना) ही सत्ता, धन, यश (सही शब्द अपयश) ग्लैमर और संसद तक पहुंचती हैं, यह मामूली सच समझता था. पर अपना गणित अलग था. लेक्चरर, रिजर्व बैंक व अन्य कई महत्वपूर्ण नौकरियां छोड़ कर पत्रकारिता चुना था, बदलते समाज का हिस्सा बनने के लिए.
युवा दिनों में लगता था कि पत्रकारिता, सामाजिक ठहराव-सड़ांध तोड़ने की सशक्त विधा है. सिक्यूरिटी, घर, गाड़ी, संपत्ति और संभावित बैंक बैलेंस के गणित और कैलकुलस से नौकरी के ऑफ़र तय करने की शिक्षा, मेरी पृष्ठभूमि ने नहीं दी थी. इन चीजों के प्रति आदतन लापरवाह हमारी पीढ़ी थी. जिनसे संस्कार, सामाजिक सरोकार ग्रहण किये, जिनकी सोहबत में रहा, वे सब एक उद्देश्यपूर्ण ईमानदार जीवन के पुंज थे. गरीब रहे हों, पर आत्म-सम्मानवाले लोग थे. एक रचनात्मक बेचैनी, हमेशा कुछ नया करने का उत्साह, जोखिम-चुनौतियों में जीने का मनोबल, स्वाभिमान से समझौता नहीं, हमारी पीढ़ी को हमारे गांवों से, जेपी आंदोलन से, विरासत में मिले थे. ग्लोबल दुनिया की बाजार-व्यवस्था के सूत्रों (पद, पैसा, भविष्य में सत्तारूढ़ होने की जगह) से भविष्य-नौकरी, पर विचार करने का मौजूदा दौर होता, तो मैं रांची नहीं होता. प्रभात खबर का अनुभव नहीं होता. हर किस्म के संगठन में कोई लीडर या सीइओ होता है.
प्रभात खबर की पूरी यात्रा पर : प्रभात खबर हिंदी पत्रकारिता में एक प्रयोग है. जब पाठकों-हॉकरों-एजेंटों को करोड़ों-करोड़ के उपहार-गिफ्ट देकर. एग्रेसिव मार्केटिंग से पाठक बनाये जाते हों, तब प्रभात खबर ने ऐसा कुछ भी नहीं किया. अखबारों की कीमत कम करके नये पाठक मिलते हों, उस दौर में पूंजी अभाव (Capital Starved) वाले प्रभात खबर ने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया. पत्रकारिता में जब मान लिया गया हो कि इंटरटेनमेंट (मनोरंजन) और इनफ़ारमेशन (सूचना) ही पत्रकारों-अखबारों के धर्म हैं, तब प्रभात खबर ने पब्लिक इश्यूज (जनमुद्दों) को उठाया. जब इस बात पर मौन सहमति हो गयी हो कि बाजार और ग्लोबलाइजेशन एरा के इस दौर में, विचार और मूल्य के लिए जगह नहीं है, तब प्रभात खबर ने विचारों-मूल्यों को पत्रकारिता का आधार माना. खासतौर से हिंदी पत्रकारिता का कंटेंट एनालिसिस (विषयवस्तु विश्लेषण) करें, तो पायेंगे कि रूयमर(अफ़वाह), गॉसिप (झूठ), क्राइम (अपराध), और सेनसेशन (सनसनीखेज चीजें) का ही बाहुल्य है. हालांकि बहुत धीरे-धीरे चीजें बदल रही हैं.
यह उस दौर की परिघटना है, जब घोषित कर दिया गया कि अखबार प्रोडक्ट बन गये हैं, वे मिशन नहीं रहे, प्रोफ़ेशन (व्यवसाय) बन गये हैं. उस दौर में प्रभात खबर ने विज्ञान, आइटी (हिंदी में पहली बार सूचना तकनीक पर सप्ताह में एक पेज प्रभात खबर ने देना शुरू किया. कई वर्षों बाद आज भी यह क्रम जारी है) अर्थव्यवस्था, विभिन्न राज्यों की तुलनात्मक आर्थिक प्रगति, वगैरह पर सामग्री देना आरंभ किया. साथ ही, समाज में मूल्य आधारित आंदोलनों का वाहक बना.
प्रभात खबर ने बाजार से यह नहीं सीखा कि कंज्यूमर इज किंग (उपभोक्ता ही राजा है), बल्कि गांधी द्वारा तय पत्रकारिता के मूल्य को माना कि पाठक ही मालिक हैं. लगभग बंद प्रभात खबर को जब हमारी टीम ने पटरी पर लाने का काम शुरू किया, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन यह हिंदी पत्रकारिता का एक सफ़ल एवं उल्लेखनीय प्रयोग होगा. उस दौर में (1990-91) प्रभात खबर ने. पाठकों की अदालत कार्यक्रम चलाये. बड़े शहरों, छोटे-बड़े कस्बों में पाठकों की अदालत बैठकें कीं. लंबी चलने वाली इन बैठकों में पाठक बोलते थे, अखबार के लोग अपनी कमियां और उनके सुझाव सुनते. सीधा पाठकों से प्रभात खबर के बारे में संवाद क्रम चला. बड़े-बड़े होर्डिग लगा कर, अखबारों में विज्ञापन देकर, ग्लोसी पेपर पर खूबसूरत ब्रोशर बना कर, उपहार व सब्सर्किप्शन रिबेट (शुल्क में छूट) देकर,
हमने पाठक नहीं बनाये, बल्कि पाठकों से सीधा संवाद किया. गांव-ब्लॉकों में प्रभात खबर आपके द्वार. कार्यक्रम चला कर लोगों को एकत्र किया गया, उनकी समस्याओं-आकांक्षाओं से अखबार को जोड़ा गया. जन आंदोलनों (पीपुल्समूवमेंट) से अखबार को जोड़ा. चुनावों में मतदाता जागरुकता अभियान चला कर, प्रभात खबर ने चेतना जागरुकता अभियान चलाया. अखबार शहर के साथ-साथ गांवों के जीवन के हिस्सा बने. इस तरह के अनेक जनोन्मुख कार्यक्रमों को चला कर प्रभात खबर (1990-2003) बहुत कम पूंजी के बल पर झारखंड का सबसे बड़ा अखबार बना. मामूली पूंजी और जन मुद्दों के बल, प्रभात खबर ने अपनी पहचान उस दौर में बनायी, जब बड़ी पूंजी के अखबार अपने आक्रामक तौर-तरीकों से कम पूंजी वाले अखबारों को खत्म कर रहे थे.
1990-2000 के दौर में देश के बड़े-बड़े घरानों ने अखबार निकाले, पर विजुअल मीडिया के इस दौर में वे चल नहीं सके. अंबानी और डालमिया से लेकर थापर तक…. ऐसे घरानों की लंबी फ़ेहरिस्त है, जो अखबार-पत्रिका लेकर एग्रेसिव मार्केटिंग के साथ बाजार में उतरे. अखबारों को उन्होंने प्रोडक्ट बनाया. बढ़िया पैकेजिंग की, एग्रेसिव मार्केटिंग की, पर वे अपार पूंजी होने के बाद भी टिक नहीं पाये. उसी दौर में बिहार के सबसे पिछड़े हिस्से रांची से शुरू हआ बंद प्रायः प्रभात खबर आगे बढ़ा. अब वह सात जगहों और तीन राज्यों से छप रहा है.
अखबार विज्ञापन से चलते हैं. विज्ञापन हमेशा आर्थिक विकास का बाईप्रोडक्ट है. पर बिहार और झारखंड के इस इलाके में आर्थिक विकास की गति धीमी होने से विज्ञापन कम थे. ऐसी विपरीत परिस्थितियों में देश के सबसे पिछड़े इलाके से निकल कर एक अखबार फ़ैला, यह एक सक्सेस स्टोरी है.एबीसी, एनआरएस और आइआरएस के आंकड़े भी यह पुष्ट करेंगे.
(देश के जाने-माने पत्रकार और प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश के एक लंबे इंटरव्यू का अंश.)





