अखबारों एवं चैनल्स द्वारा पेडन्यूज की बात पर काफी बवाल मचता रहा है लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि पेड न्यूज मालिकों का कान्सेप्ट होता है और पत्रकारों को इसे मजबूरी में फॉलो करना पड़ता है। लेकिन आगरा में एक पूर्व पत्रकार ने तो अपनी दुकान चलाने की खातिर यहां के सभी पत्रकारों और संपादकों को बेच दिया है और आश्चर्य की बात है कि बिकने वाले को पता ही नहीं है कि उसे कौन बेच रहा है। कुछ छुटभैये पत्रकारों के कारण यह धंधा चल रहा है। देखते ही देखते इस मीडिया प्रभारी बने पूर्व पत्रकार ने अपनी मासिक कमाई इतनी कर ली है जितनी यहां के बडे अखबारों के संपादकों की भी नहीं है।
कभी अपने जातिसूचक नाम से यह वैश्य पत्रकार बैंकों से भारी भरकम रकम लेकर पचा चुका है। यह दूसरी बात है कि इसके कारण उसे कई बार जेल काटनी पड़ी है। विगत कई साल पूर्व अपनी चाटुकारिता के बल पर अपने जातिसूचक नाम को धता बताकर नाम के आगे कुमार लगाकर यहां के बडे अखबार से जुड़ गया लेकिन जेल जाने के कारण इसे वहां से हटना पडा। इस सच्चाई से यहां के प्रायः सभी वरिष्ठ पत्रकार वाफिक हैं। इसके बाद एक अन्य देशव्यापाी अखबार में भी यह जुड़ गया लेकिन सरकारी बैंक ने पीछा नहीं छोड़ा! अब यह अपने छुटभैये पत्रकार साथियों के सहयोग से मीडिया प्रभारी बन गया है। जब भी कोई धार्मिक, सामाजिक अथवा राजनैतिक समारोह का आयोजक अखबारों में विज्ञप्तियां देने जाता है तो इस कथित मीडिया प्रभारी के समाचार पत्रों में बैठे दलाल साथी आयोजकों को रूबरू अथवा फोन द्वारा बता देते हैं कि फलां को बुक कर लो अगर अपना कार्यक्रम अथवा समारोह सफल कराना है। अखबारों में छपवाना और चैनल्स में प्रसारित कराना है।
अब जो संगठन अथवा आयोजक लाखों का खर्च करके अपना समारोह कर रहा है वह बेचारा इसके पास पहुंच जाता है अथवा यह पूर्व पत्रकार उनके पास पहुंच जाता है फिर होता है यहां के अखबारों के सिटी इंचार्ज और संपादकों की नीलामी और बेचने का काम शुरू। वह कहता है कि अखबारों के छपवाने के लिए अमुक सिटी इंजार्च को इतने रुपये अथवा पार्टी देनी पड़ेगी और दूसरे के लिए तो कुछ अधिक करना पड़ेगा। वह अपनी कमीशन के चक्कर में आयोजकों को अखबारों और लोकल चैनल में विज्ञापन देने पर मजबूर करता है कि इससे तुम्हारे कार्यक्रम का कवरेज शानदार होगा। जब तक किसी कार्यक्रम का समापन नहीं होता, यह आयोजकों को किसी न किसी बड़े पद पर आसीन पत्रकार अथवा संपादक की सेवा के नाम पर पैसे ऐंठता रहता है। यह व्यक्ति अपने धंधे के लिए अपने को विधिवत आयोजनों का मीडिया प्रभारी घोषित करवा लेता है अथवा स्वयं ही उस आयोजन का मीडियाप्रभारी बन जाता है और विधिवत अखबारों में अपने अनुबंधित कार्यक्रम के प्रचार के लिए आना-जाना शुरू कर देता है।
प्रेस वार्ता के नाम पर यह पत्रकारों से परिचय करवाकर आयोजकों पर अपनी पत्रकारिता की पहचान का सिक्का जमा लेता है। फिर आयोजकों से भारी संख्या में उपहार के पैकेट लेकर सम्बन्धित पत्रकारों के घर जाता है। मीडिया प्रभारी की फीस इसकी कम से कम 5000 रुपये है परंतु संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों को खुश करने एवं उन्हें पार्टी देने के नाम पर आयोजकों की अच्छी खासी जेब काट लेता है। ताज्जुब इस बात का है कि इसके द्वारा भेजे गये समाचार संभी अखबार प्रमुखता से छापते हैं। जो कार्यक्रम आयोजक इस खबरों के दलाल को बुक नहीं करते, उनके समाचार अखबारों के कूड़ेदान में फिंक जाते हैं अथवा दो चार लाइनों में सिमट जाते हैं। इसके कारण यहां के सामूहिक विवाह समारोह, धार्मिक और सामाजिक, व्यापारिक तथा राजनैतिक आयोजकों की, जो अधिकांशतः व्यापारी होते हैं, उनकी मजबूरी हो गई है कि वह न चाहते हुए भी इस खबरों के दलाल को अपने कार्यक्रम में मीडिया प्रभारी बनाते हैं। अधिकांश अखबारों के पत्रकारों को यह अपना चेला या पट्ठा बताने से भी नहीं चूकता लेकिन सामने पड़ने पर पैर छूने में भी इसका कोई जबाव नहीं है। इस कथित पत्रकार ने अपना धंधा इतना अच्छा फैला रखा है कि यह लाखों रुपये महीने की कमाई कर रहा है। दुनियां भर की खबरों का दावा करने वाले योग्य संपादकों और सिटी चीफों व प्रेस जर्नलिस्टों को पता ही नहीं है कि उन्हें कौन बेच रहा है। इस व्यक्ति ने अपने धंधे और आयोजकों से धन ऐंठने की खातिर कई शरीफ पत्रकार और संपादकों को सुरापान प्रेमी भी बना दिया है क्योंकि सुरा पार्टी के नाम पर आयोजकों हजारों रुपये सहज ही मिल जाते हैं।
आगरा से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





