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आइए मंजुलेश्वर बाबा की राबिनहुड शैली से दो-चार हो लें

मंजुल थियेटर को ओढ़ने-बिछाने वाले इंसान हैं। रंगकर्म उनके जेहन में हर वक्त गुँथा-सा रहता है। आप उनसे मिलें तो खतरा इस बात का भी हो सकता है कि वे आपको एक ‘कैरेक्टर’ की तरह अपने सूक्ष्म निरीक्षण से तक रहे हों या आपके खड़े होने के अंदाज में उन्हें एक ‘स्टांस’ नजर आ जाये। कभी-कभार वे यह भी भूल सकते हैं कि आप उनके द्वारा निर्देशित किसी नाटक के पात्र नहीं है और वे कुर्सी में बैठने पर होने वाली आवाज़ के लिये आपको हल्की-सी झिड़की लगा दें और उठकर एक बार फिर से बैठने की नागवार-सी सलाह दे बैठें।

मंजुल थियेटर को ओढ़ने-बिछाने वाले इंसान हैं। रंगकर्म उनके जेहन में हर वक्त गुँथा-सा रहता है। आप उनसे मिलें तो खतरा इस बात का भी हो सकता है कि वे आपको एक ‘कैरेक्टर’ की तरह अपने सूक्ष्म निरीक्षण से तक रहे हों या आपके खड़े होने के अंदाज में उन्हें एक ‘स्टांस’ नजर आ जाये। कभी-कभार वे यह भी भूल सकते हैं कि आप उनके द्वारा निर्देशित किसी नाटक के पात्र नहीं है और वे कुर्सी में बैठने पर होने वाली आवाज़ के लिये आपको हल्की-सी झिड़की लगा दें और उठकर एक बार फिर से बैठने की नागवार-सी सलाह दे बैठें।

राह चलते हुए मिलने वाले दरख्तों में उन्हें ‘पोस्चर’ दिखाई पड़ता है और घाटियों वाली किसी पहाड़ी के नजर आने पर वे ‘सीनिक डिजाइन’ की कल्पना करने लगते हैं। इस पर भी तुर्रा यह कि उनसे बातें करते हुए यदि आपकी जुबान जरा-सी भी फिसल जाये तो वे उसे किसी भूले हुए संवाद की तरह ठीक करवाने में जुट जाते हैं। उन्हें ईंट ढोती मजदूर महिला के जिस्म में संतुलन, लय और ताल नजर आती है और वे कहते हैं कि रिदम दरअसल जीवन में है, ढोलक तो सिर्फ उसे अभिव्यक्ति प्रदान करने का माध्यम है।  

मंजुल भारद्वाज नामक यह शख्स एक चलता-फिरता थियेटर है जो वाम आंदोलन का हिमायती होते हुए भी उनके तौर-तरीकों का आलोचक है और कहता है कि वाम राजनीति को यदि ठीक-ठीक परिभाषित करना हो तो किसी किशोर उम्र बालक के एकतरफा मोहब्बत का दृष्टांत लिया जा सकता है, जहाँ चाहे जाने वाले को अपने पसंद किये जाने की खबर भी नहीं होती। वे कहते हैं कि यह वाम आंदोलन की रणनीतिक चूक है कि अपने देश के सर्वहारा को यह पता भी नहीं है कि कोई उससे इतनी मोहब्बत रखता है।

दूसरी तरफ जिसे सर्वहारा, दलित व शोषित का तमगा पहनाया जाता है वह एक हद तक अपनी अवस्था के लिये स्वयं जिम्मेदार है और खुद-ब-खुद बेड़ियाँ लपेटकर बैठा हुआ है। जितनी यातना, जितनी पीड़ा वह सह रहा है, उसका एक फीसदी अंश भी वह अपनी मुक्ति के लिये जाया करे तो सारी व्यवस्थाओं को उलटा जा सकता है। इस तरह की ढेर सारी स्थापनायें उनके ‘मुख-कमल’ से झरती रहती हैं पर इन सारे संदर्भों का केंद्र निर्विवाद रूप से रंगकर्म ही होता है। आप उनसे सारी रात थियेटर पर बात कर सकते हैं और सुबह सिर्फ एक चाय के एवज में – उतनी ही ताजगी के साथ- बच्चों की नाट्य कार्यशाला में कूदने -फाँदने के काम में लगा सकते हैं।  

जैसे हर सफल पुरुष के पीछे किसी नारी का हाथ होने की बात कही जाती है वैसे ही हर नाटककार-फिल्मकार के सफल होने के पीछे किसी ‘ट्रेजिडी’ का होना अनिवार्य है। लानत है ऐसे फिल्मकार-नाटककार पर जो किसी ट्रेजिडी से न गुजरा हो और मंजुल की ट्रेजिडी यह है कि वह तमाम नये नाटककारों की तरह अपने ख्वाबों, अपने सपनों का बोझ उठाये हुए रंगकर्म के मक्का-मदीना पृथ्वी थियेटर में जा पहुंचा और पृथ्वी थियेटर ने चार प्रदर्शनों की मुख्तसर-सी नवाजिश के साथ बड़ी ही बेरहमी से मय सेट मंजुल को उठाकर सड़क पर फेंक दिया।

कोढ़ में खाज यह कि यह कि इस नवोदित व संभावनाशील नाटककार का एक खोमचे वाला वाला पड़ोसी गाहे-बगाहे यह सवाल दाग देता कि ‘साहब! आपके नाटक-वाटक का क्या हुआ।’ मंजुल की ही भाषा में इस संवाद की यदि ‘सीनिक डिजाइन’ करनी हो तो मैं किसी चालू हिंदी फिल्म के बिजली के कड़कने जैसे किसी दृश्य का सहारा लूंगा, जिसके जरिये यह दिखाया जा सके कि किस तरह अपने नाटककार के दिमाग की बत्ती अचानक जल उठी। मंजुल के जेहन में यह सवाल कौंधा कि यह खोमचेवाला हमेशा ‘आपका’ नाटक क्यों कहता है? यह हमारा नाटक क्यों नहीं कहता और नाटक इसका क्यों नहीं हो सकता?

मंजुल भारद्वाज

मंजुल भारद्वाज

लब्बो-लुआब यह कि यहीं से मंजुल ने थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ अथवा ‘प्रासंगिकता के थियेटर’ की शुरूआत की जो मनोरंजन अथवा सुधारने की नहीं बल्कि आमूल बदलाव की बात कहता है। मंजुल अपना यह काम ‘एक्सपेरिमेंटल थियेटर फाउंडेशन’ के तहत करते हैं और थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ उनका नाट्य दर्शन है, जिससे कोलकाता के प्रोबीर गुहा इत्तफाक नहीं रखते। वे कहते हैं कि मंजुल का काम अच्छा है पर उनका दर्शन कोई नयी स्थापना नहीं है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो व्यवस्था में बदलाव के लिये थियेटर कर रहे हैं। मंजुल का कहना है कि केवल इप्टा ही एक ऐसी नाट्य संस्था है जिसका कोई वैचारिक-सैद्धांतिक आधार है अन्यथा बाकी लोग केवल ‘फार्म’ पर ही काम कर रहे हैं और कभी-कभार वे संयोग से कोई ऐसा नाटक खेल देते हैं जिनमें कुछ सरोकार ‘दुर्घटनावश’ निकल आते हैं। जबकि ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ के तहत नाट्य लेखन की शुरूआत ही इस मकसद के साथ होती है कि वह समाज के किस वर्ग के बदलाव के लिये काम करेगा और यहाँ नाट्य प्रदर्शन कलात्मक सरोकारों के साथ नहीं बल्कि बदलाव के लिये रणनीतिक कौशल के साथ होता है। मंजुल कहते हैं कि उनके नाटक ‘मेरा बचपन’ के 12 हजार प्रदर्शन हुए और उनकी वजह से कोई 50 हजार बच्चे बालश्रम के अभिशाप से मुक्त होकर स्कूल जा सके। नाटक ‘दूर से किसी ने आवाज दी’ ने बाबरी मसजिद के ध्वंस के बाद मुंबई के कर्फ्यूग्रस्त क्षेत्रों में दो समुदायों के बीच तार-तार हो चुके संबंधों को एक बार फिर से जोड़ने का काम किया।

एक नाटककार होने के नाते वे स्वयं को बदलाव की प्रक्रिया का सूत्रधार मानते हैं जो सुधार का नहीं बल्कि निर्माण का कार्य करता है। उन्हें इस बात की गहरी पीड़ा है कि अपने मुल्क में कोई एक जर्मनी या आठ-नौ आस्ट्रेलिया की आबादी के बराबर के बच्चे केवल मध्यमवर्ग की साजिश से बाल श्रम के लिये अभिशप्त हैं। वे कहते हैं कि यह उन्हें गुलाम बनाने की प्रक्रिया है और यह बेहद त्रासदीपूर्ण है कि जब किसान अपने बीज को नहीं खाता है तो पढ़ा-लिखा इंसान यह काम कैसे कर पाता है?

कैसी विडंबना है कि रिलायंस प्रायोजित महान समाज सुधारक आमिर खान के कन्याभ्रूण हत्या वाले प्रथम शो पर जिस तरह समूचा मीडिया नियोजित रूप से बिछा-बिछा-सा नजर आता है वही मीडिया इसी विषय पर मंजुल के कामों की व उनके जैसे अन्य लोगों के सतत् व लंबे कामों की जानबूझकर उपेक्षा करता है। हालांकि मंजुल इस मीडिया की बहुत ज्यादा परवाह नहीं करते और कहते हैं कि यह मृत मीडिया है और अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। वे कहते हैं कि यदि कोई सबसे प्राचीन, सबसे लाइव, सबसे जीवतं मीडिया है तो वह थियेटर है और इसके जरिये आप जीवन की जटिलतम समस्याओं के समाधान ढूंढ सकते हैं। इन अर्थो में मंजुल ‘मंजुलेश्वर बाबा’ हैं जिनके काम करने की शैली रॉबिनहुड की है। मसलन वे लाखों रुपयों की फीस वसूल कर उड़नखटोले से मैनेजमेंट संस्थान जाते हैं और वहाँ प्रबंधकों को ‘दृष्टि’ प्रदान करने की ‘किरपा’ बरसाते हैं। बेशक यह कार्य थियेटर के सिद्धातों के जरिये ही होता है। यही मंजुल ट्रेन में धक्के खाते हुए छत्तीसगढ़ के एक छोटे-से कस्बे में आते हैं और बच्चों व युवाओं की निःशुल्क कार्यशाला संचालित करते हैं।

मंजुल के साथ होना, थियेटर के साथ होना है। वे चौबीसों घंटे थियेटर की ही बाते करते हैं और दुनिया को एक नाटककार की निगाह से देखते -परखते हैं। आप अगर नाटक के दर्शक हैं तो मंजुल के लिये सर्वोपरि हैं, अन्यथा उनकी निगाह में आपका कोई मोल नहीं है। वे दर्शक को सबसे बड़ा रंगकर्मी मानते हैं और कहते हैं कि भोगवादी व्यवस्था आज के नाटककार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। आज के नाटककार को किस्सागोई की जरूरत नहीं है और उसे क्रांति का सूत्रधार बनना है। बकौल संजय मासूम, ‘‘ ऐ मेरे पाँव के छालो लहू उगलो/ जमाना तुमसे चलने का सबूत मांगता है।’’

दिनेश चौधरीलेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं. सरकारी नौकरी से कुछ समय पहले रिटायर हुए. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. दिनेश के लिखे से साक्षात्कार के लिए यहां क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश 

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