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मेहंदी हसन के नाम वो धनतेरस की यादगार शाम

: ग़ज़ल शहंशाह को श्रद्धांजलि : पिछले कई दिनों से जो अंदेशा था, वो आखिर दुखद अफसाने में बदल गया और सुबह अख़बारों में जब ग़ज़ल शहंशाह मेहंदी हसन साहब के इंतकाल का दिल तोड़ने वाला समाचार पढने को मिला तब अचानक समय का पहिया तेजी के साथ पीछे की ओर घूमने लगा और मैं खो गया उन बेशकीमती लम्हों में जो एक पूरी रात मेरे हिस्से आये थे. मेरी खुशनसीबी मुझे यह सौगात देगी, उस रात के चंद रोज़ पहले तक यह मेरे ख्वाबों में भी नहीं था. इसलिए बात आंसुओं की नहीं, उनके साथ बिताये हसीन पलों की ही करूंगा. बात देस की भी नहीं परदेस की है और ३४ साल पुरानी. क्रिकेट सीरीज कवर करने पाकिस्तान गया था.

: ग़ज़ल शहंशाह को श्रद्धांजलि : पिछले कई दिनों से जो अंदेशा था, वो आखिर दुखद अफसाने में बदल गया और सुबह अख़बारों में जब ग़ज़ल शहंशाह मेहंदी हसन साहब के इंतकाल का दिल तोड़ने वाला समाचार पढने को मिला तब अचानक समय का पहिया तेजी के साथ पीछे की ओर घूमने लगा और मैं खो गया उन बेशकीमती लम्हों में जो एक पूरी रात मेरे हिस्से आये थे. मेरी खुशनसीबी मुझे यह सौगात देगी, उस रात के चंद रोज़ पहले तक यह मेरे ख्वाबों में भी नहीं था. इसलिए बात आंसुओं की नहीं, उनके साथ बिताये हसीन पलों की ही करूंगा. बात देस की भी नहीं परदेस की है और ३४ साल पुरानी. क्रिकेट सीरीज कवर करने पाकिस्तान गया था.

शायद ऐसी उपलब्धि पाने वाला देश का पहला हिन्दी क्रिकेट पत्रकार भी था. वो शाम भारतीय दृष्टि से कुछ खास थी, इसकी जानकारी लाहौर के पंच सितारा होटल के भव्य हाल में टेबल पर सजी किसिम किसिम की भारतीय मिठाइयां और पकवान देख कर हुई. असल में गद्दाफी स्टेडियम में चल रहे दूसरे टेस्ट के तीसरे दिन के खेल के दौरान भारतीय हाई कमीशन की ओर से होटल इंटर कांटिनेंटल में दावत का न्योता तो मिला था पर इसकी वजह नहीं बताई गयी थी.

वहां पहुंचने पर मिठाइयां देखी और पूछा कि माज़रा क्या है? तब पता चला कि धन तेरस के अवसर पर है यह पार्टी. यानी दो दिन बाद दिवाली……!  देश के इस सबसे बड़े त्यौहार तक की किसी को याद नहीं आयी, ऐसे देश में थे हम. खैर, वहीं हमें बताया गया कि आज रात मोहम्मद अली के यहां डिनर है और वहां पाकिस्तान का पूरा फिल्म उद्योग मौजूद रहेगा. बताने की जरूरत नहीं कि उस दौर में अली और उनकी बीवी ज़ेबा की हैसियत वहां वही थी जो अपने यहां दिलीप कुमार और मीना कुमारी की हुआ करती थी. हमें निमंत्रण भी शशि भाभी (अभिनेता मनोज कुमार की पत्नी) की ओर से मिला था जो उन दिनों अपने पारिवारिक मित्र मोहम्मद अली के यहां सपरिवार मेहमान थी. शशि भाभी की कृपा से वहां मलिका-ए- तरन्नुम नूरज़हां से भी यादगार मुलाकात हुई…लेकिन इसकी चर्चा फिर कभी….

वाकई पाक का सारा फ़िल्मी कुनबा अली के आलीशान बंगले में सिमट आया था. लेकिन आकर्षण थे उस रात तो सिर्फ मेहंदी हसन साहब, जिनकी नशीले सुरों में पिरोई ग़ज़लों को कभी मैं इस अंदाज में आमने-सामने बैठ कर सुन पाऊँगा, नहीं सोचा था. भारत-पाक की टीमे पूरी शिद्दत से वहां हम प्याला, हम निवाला हो रही थीं जबकि कानूनन वहां कड़ी शराब बंदी थी और दारू पीकर पकड़े जाने पर 75 कोड़ों की तात्कालिक सजा मुक़र्रर थी. उन दिनों टेस्ट मैचों के दौरान एक दिन का अवकाश हुआ करता था, यहां भी अगले दिन टीम और पत्रकार दोनों को लम्बी तान कर सोना था. इसलिए हर कोई पूरी रात मेहंदी हसन की शीरीं ग़ज़लों के साये में बिताने के लिए कमर कस के आया था. हसन साहब के तशरीफ लाते ही वहां हलचल सी मच गयी. हर कोई उनसे हाथ मिलाने को आतुर दिखा. वो चौंके तब जब मैं भारतीय परंपरा के मुताबिक अदब में उनके पैर छूने के लिए झुका.

ठेठ मारवाड़ी मेहंदी हसन साहब ने बीच में ही हाथ पकड़ते हुए पूछा, "कहाँ के हो बेटा"? बताया, "बनारस का". अरे…. भाई तुम तो उस्तादों के शहर से आये हो. कैसे हैं बिस्मिल्ला साहब, क्या हाल है पंडित शामता प्रसादजी (गोदई महाराज) का? जब मैंने उन्हें बताया कि मेरी जड़ें भी राजस्थान में हैं, तो सुनते ही उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गयी. खांटी राजस्थानी लहजे में उन्होंने बताया कि वो झुंझनू के हैं और परिवार में आज भी मारवाड़ी ही बोली जाती है. मेरे लिए यह चौंकाने वाली खबर थी. तब तक साज़ सज चुके थे. शुरू हुआ एक से बढ़ कर एक ग़ज़लों का वो यादगार सफ़र जो भोर में कहीं जाकर थमा. हम सभी की फरमाइश की उन्होंने क़द्र की.

पत्ता-पत्ता,  बूटा-बूटा से शुरुआत के बाद ज्यों ज्यों रात जंवा होती गयी, गज़लें भी उसी हिसाब से परवान चढ़ती रहीं. शास्त्रीय गायन का ऐसा रसीला पुट ग़ज़ल गायकी में मैंने पहले नहीं सुना था. सच कहूं तो मेरे लिए मेहंदी  हसन पुरुष लता मंगेशकर ज्यादा लगे, जिनकी गायकी को कोई सीमा में नहीं बांध सकता था. उनके सुर मुक्ताकाश में विचरण करते रहे और तात्कालिक कप्तान बिशन सिंह बेदी, चेतन चौहान, पिता लाला अमरनाथ अपने पुत्रों मोहिंदर- सुरिंदर के साथ अंत तक डेट रहे. वो  फैज़, नासिर काज़मी जैसे शायरों के कलाम अपनी चाशनी सी जुबान में जीवंत करते रहे…  मुझे तुम नज़र से गिरा रहे हो, शोला था, जला बुझा हूँ…….. (सुनने के लिए क्लिक करें- मेहंदी हसन के गाए कुछ गीत-ग़ज़ल) और जब अंत में -अबकी हम बिछुड़े तो शायद ख्वाबों में……गा कर उन्होंने साज़ और आवाज़ को खामोश किया तब एक झटका सा लगा. अरे रात ढल गयी ………एक अतृप्त सी प्यास लिए हम थके कदमो से लौट चले थे होटल हिल्टन की ओर जो हम सबका ठिकाना था. 


–इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

शहंशाह ए ग़ज़ल का यूं जाना…. (लेखक- सिद्धार्थ शंकर गौतम)

बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाकर साइकिल की दुकान पर काम किया मेहंदी हसन ने (लेखक- श्याम रत्न शर्मा)

हसन साहब ने आंदोलन नामक नया सुर बताया जो हारमोनियम की पटरियों में नहीं मिलते (लेखक- आनंद कौशल)


पदमपति शर्मा

पदमपति शर्मा

लेखक पदमपति शर्मा देश के जाने-माने खेल पत्रकार हैं. कई न्यूज चैनलों और अखबारों में संपादक रह चुके हैं. इन दिनों बनारस में रहकर बनारसीपन को जी रहे हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.


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