ऐसा क्यों नहीं माना जाए कि हुड्डा सरकार की "अपना घर सेक्स स्कैंडल केस" की बेचैनी की देन है दिल्ली की पानी कलह? यदि हम घटनाओं का तारीखवार विश्लेषण करते हैं तो साफ़ नज़र आता है कि दिल्ली की पानी की किल्लत 9 मई 2012 को अपना घर सेक्स स्कैंडल की पहली रिपोर्ट के बाद ही इतनी गंभीरता से खड़ी हुई है. मीडिया रिपोर्टों पर नज़र डालें तो और साफ़ हो जाता है कि पानी का मुद्दा इस केस के साथ ही जवान हुआ है. हो सकता है कि सौदेबाजियों का दौर जारी हो.
हरियाणा के सेक्स प्रकरण और दिल्ली और हरियाणा के कांग्रेसी राज के पहलुओं पर केन्द्रित मीडिया का ध्यान शायद ही इस तरफ आकर्षित हो लेकिन यह जन आकर्षण को विमुख करने का बहुत बढ़िया खेल नज़र आता है. शायद सीबीआई भी इस नज़रिए से अन्वेषण न कर सके. तो इसका मतलब यह क्यों न लगाया जाए कि यह हुड्डा और शीला आंटी की आपसी समझदारी है, जिसमें जनहित तो ताक पर रख कर सरकार की सेहत बचाई जा सके. जन दबाव के चलते दिल्ली हरियाणा से पानी मागेंगी. क्या हरियाणा दिल्ली को पानी देगा और बदले में सीबीआई और केंद्र सरकार की तरफ से सरकार और हुड्डा बचाव को भी सुनिश्चित किया जायेगा. शायद एक दो लोग आत्म हत्या भी करें. कुछ मर्डर- वर्डर भी हुए तो अखबारों की सुर्खियाँ जरुर बटोर लेंगे लेकिन सरकारें और बड़े रसूखदार लोग इन सब बातों को किसी न किसी थ्योरी में दबा के उसके ऊपर खड़े रहने की कला को ही राजनीति मानें.
अब अगर दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के आस-पास का माहौल देखें तो शायद उन्हें यह समझाते हुए पाया जा रहा है कि पानी की किल्लत आबादी और जल-संसाधनों कि कमी के चलते बनी है. खैर दिल्ली की ज्यादातर रिफ्यूजी (देसी रिफ्यूजी) जनता के लिए यह मानना ही नियति है. खैर जो भी हो खेल बहुत ही चतुराई से खेला जा रहा है. ऐसे खेल से उत्तर प्रदेश को भी कुछ "पनियल" मोहरे बिछाने और दिल्ली और केंद्र से सौदेबाज़ी करने के रास्ते जरुर मिलेंगे. एक और पहलू देखा जाए तो और बातें साफ़ हो जाती हैं कि सेक्स, सौदेबाज़ी और बंदरबांट के चलते दिल्ली सरकार पानी का ठेका किन कंपनियों को दे रही है और उनकी इस खेल में क्या भूमिका हो सकती है? वैसे भी खेल में लड़ते और मरते तो मोहरे ही हैं. खिलाडी तो अक्सर दोस्त ही होते हैं.
राकेश मिश्रा
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