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जागरण की छंटनी के शिकार हुए अमरीश त्‍यागी का निधन

दैनिक जागरण से छंटनी के शिकार हुए एक और पत्रकार काल के गाल में समा गए. बताया जा रहा है कि निकाले जाने के सदमे से वे उबर नहीं पाए और हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया. मामला सहारनपुर का है. देवबंद में बरसों से जागरण के लिए काम करने वाले अमरीश त्‍यागी का निधन हो गया. वे 49 साल के थे. वे बीस सालों से दैनिक जागरण से जुड़े हुए थे. परन्‍तु जागरण ने उनके सेवाभाव को सम्‍मान देने की बजाय उनके हिस्‍से में संस्‍थान से बाहर करने का अपमान दिया, जिससे वे उबर नहीं पाए.

दैनिक जागरण से छंटनी के शिकार हुए एक और पत्रकार काल के गाल में समा गए. बताया जा रहा है कि निकाले जाने के सदमे से वे उबर नहीं पाए और हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया. मामला सहारनपुर का है. देवबंद में बरसों से जागरण के लिए काम करने वाले अमरीश त्‍यागी का निधन हो गया. वे 49 साल के थे. वे बीस सालों से दैनिक जागरण से जुड़े हुए थे. परन्‍तु जागरण ने उनके सेवाभाव को सम्‍मान देने की बजाय उनके हिस्‍से में संस्‍थान से बाहर करने का अपमान दिया, जिससे वे उबर नहीं पाए.

अमरीश देवबंद के पास ही स्थित कुलसठ गांव के रहने वाले थे. इनका अंतिम संस्‍कार कुलसठ में ही किया गया. जागरण प्रबंधन ने जिस तरह का व्‍यवहार इनके साथ किया उससे यह काफी डिप्रेशन में चले गए थे और आखिर तक उबर नहीं पाए. प्रबंधन ने इनके समाचार छापने बंद करके इन्‍हें छंटनी का शिकार बनाया. बीस सालों की सेवा के बाद अचानक जागरण प्रबंधन के इस कदम ने इन्‍हें असमय मौत के गाल में ढकेल दिया. अमरीश के निधन के बाद तमाम लोगों के मुंह से जागरण के लिए बददुआएं निकल रही हैं. शायद ताकत के मद में चूर प्रबंधन को इससे फर्क ना पड़े, पर ये बददुआएं खाली नहीं जाएंगी.

जिस तरह जागरण समूह राक्षसी विचारधारा अपनाते हुए मानव संसाधन की बजाय धन संसाधन की तरफ प्रलयंकारी गति से दौड़ रहा है, उसे देखते हुए तो दिन दूर नहीं लग रहा है जब इसे भी अकाल मौत मरना पड़ेगा. 'आज' समूह भी इसी गति को दौड़ते हुए अपनी गति को प्राप्‍त हो गया है. कभी समाज में तूती बोलने वाले इस अखबार का अब नामलेवा तक नहीं रह गए हैं. जागरण को जागरण बनाने वाले लोगों को ही दरकिनार कर यह अखबार खुद ही अपनी कब्र खोद रहा है. अपने कारनामों से यह अखबार बदनाम हो ही रहा है, घटियापने के चलते यह पत्रकार जगत में भी लगातार अविश्‍वसनीय होता जा रहा है. 

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