एक हिंदी दैनिक के रांची संस्करण के कर्मी अपने नए प्रधान संपादक बैचू बाबा की तानाशाही और गैर संसदीय भाषा से त्रस्त हैं. अभी तक सम्पादकीय विभाग से लेकर विज्ञापन और प्रशासनिक विभाग तक के आधे दर्जन लोग निकाले जा चुके हैं या फिर इस्तीफा देकर संस्थान छोड़ चुके हैं. हद तो यह है कि संस्थान को एक व्यवस्थित रूप देने वाले महाप्रबंधक को भी आजिज़ आकर इस्तीफा देने को विवश हो गए.
बैचू बाबा के इशारे पर उनका दो माह से वेतन भुगतान रोक रखा गया था. सबसे बुरा हाल संस्थान में कार्यरत महिला कर्मियों की है. संपादक उनके पीछे पड़े हैं और लगातार उनके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं. एक महिला कर्मी ने तो क्षुब्ध होकर यहां तक स्वीकार किया कि अब तो नौकरी बचाने के लिए बाबा को खुश करना होगा या फिर इज्ज़त बचाकर संस्थान को अलविदा कहना होगा. एक महिला कर्मी को उन्होंने काम पर नहीं आने का फरमान सुना दिया था. इसपर माहौल गरम हो गया था. बाद में किसी तरह उसकी वापसी हुई.
बाबा संस्थान को अपने कीमती समय के चार घंटे देते हैं. इसके एवज में मात्र ५० हज़ार रूपये और बाकी सुविधाएं लेते हैं. इनका समय शुरू होता है सुबह के ११ बजे जब वे रिपोर्टर्स की मीटिंग लेते हैं. मीटिंग में वे सिर्फ सभी लोगों से उस दिन फ़ाइल की जाने वाली खबर की जानकारी लेकर डायरी में नोट कर लेते हैं. खुद से कोई सुझाव या मार्गदर्शन नहीं देते. एक घंटे की मीटिंग के बाद वे घर चले जाते हैं.
फिर शाम को दो तीन घंटे के लिए अवतरित होते हैं. अखबार का लीड क्या होगा. कितने कॉलम में उसे पेश किया जायेगा. अखबार का अपना विशेष क्या होगा. इन बातों से उन्हें कोई मतलब नहीं रहता. इसे समाचार संपादक देखते हैं. बैचू बाबा की शाम की पाली खतरनाक होती है क्योंकि वे शाम होते ही भोले शंकर की बूटी चढ़ा लेते हैं. इसके बाद वे किसको क्या बोल दें कुछ पता नहीं रहता.
वैसे बैचू बाबा को रांची में उनकी पत्रकारिता के लिए नहीं बल्कि जोगाड़ टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ पत्रकार के रूप में जाना जाता हैं. उनके इसी गुण के कारण प्रभात खबर ने एक बार उन्हें रांची एक्सप्रेस से प्रभात खबर का स्थानीय संपादक बनाकर बुलाया था. उस समय उन्हें ऐसे पत्रकारों की ज़रूरत थी. यह उस समय की बात है जब हरिनारायण सिंह प्रभात खबर के तीन दर्जन लोगों को लेकर अचानक हिंदुस्तान में चले गए थे और प्रभात खबर को बंद कराने की पूरी व्यवस्था कर गए थे. अपने इसी गुण के कारण वे पिछली बार सूचना आयुक्त बनने में सफल रहे थे.
उनके अब इस हिंदी दैनिक में आने के बाद अख़बार की आय घट गयी है. अब तो संस्थान के डायरेक्टर चाहकर भी कर्मियों को समय पर वेतन नहीं दे पा रहे हैं ज्यादातर लोगों का किस्तों में भुगतान हो रहा है. बैचू बाबा अपना वेतन तो समय पर ले लेते हैं. बाकि लोगों को वेतन के सन्दर्भ में बात उठाने पर झिड़क देते हैं. वे टीम के लोगों की परेशानियों से मतलब नहीं रखते. सिर्फ आदेश जारी करते हैं. उन्होंने कई लोगों को निकालने के लिए एक सूची तैयार कर ली है. इस सूची में दो समाचार संपादक भी शामिल हैं.
कानाफूसी कालम के लिए एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित





