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उत्‍तराखंड में कांग्रेस के लिए आसान, भाजपा के लिए प्रतिष्‍ठा बनी सितारगंज सीट

नैनीताल। सितारगंज की विधानसभा सीट के उपचुनाव में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा फिलहाल बेहतर स्थिति में नजर आ रहे है। वोट डालने के रोज तक मौजूदा हालात कायम रहे तो मुख्यमंत्री बहुगुणा की जीत तकरीबन पक्की मानी जा रही है। उत्‍तराखण्ड क्रान्ति दल, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के चुनाव नहीं लड़ने से बहुगुणा का पलडा़ भारी हो गया है। भाजपा बहुगुणा की जीत को रोकने के लिए पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ रही है। पर चुनावी गणित मुख्यमंत्री के हक में दिख रहा है।

नैनीताल। सितारगंज की विधानसभा सीट के उपचुनाव में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा फिलहाल बेहतर स्थिति में नजर आ रहे है। वोट डालने के रोज तक मौजूदा हालात कायम रहे तो मुख्यमंत्री बहुगुणा की जीत तकरीबन पक्की मानी जा रही है। उत्‍तराखण्ड क्रान्ति दल, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के चुनाव नहीं लड़ने से बहुगुणा का पलडा़ भारी हो गया है। भाजपा बहुगुणा की जीत को रोकने के लिए पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ रही है। पर चुनावी गणित मुख्यमंत्री के हक में दिख रहा है।

इस साल 30 जनवरी को हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर सितारगंज से किरन मंडल चुनाव जीते थे। मंडल ने तेइस मई को विधायकी और भाजपा को अलविदा कह मुख्यमंत्री बहुगुणा के हक में यह सीट खाली कर दी। मंडल के इस्तीफे के चलते सितारगंज विधानसभा सीट में उपचुनाव हो रहा है। इस बार कांग्रेस से विजय बहुगुणा, भाजपा से प्रकाश पंत, उत्‍तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के दीवान सिंह और तीन निर्दलियों समेत छह उम्मीदवार चुनाव मैदान में है। यहॉ आठ जुलाई को वोट डाले जाएंगे।

सितारगंज में करीब बयानबे हजार के आसपास वोट है। इस साल जनवरी में हुए विधानसभा चुनाव में यहॉ 73768 यानी 80.64 फीसदी वोट पडे़ थे। जिसमें से भाजपा के किरन मंडल को 29280, बसपा के नारायण पाल को 16668, कांग्रेस के सुरेश कुमार को 15560 और कांग्रेस के बागी अनवार अहमद को 7085 वोट मिले थे। कुल पडे़ वोटों 73768 में से 68593 यानी करीब 93 फीसदी वोट इन चारों उम्मीदवारों को मिले थे। मौजूदा चुनाव में ये सभी उम्मीदवार मुख्यमंत्री बहुगुणा के साथ है। उनके लिए वोट मॉग रहे है।

सितारगंज बंगाली बहुल इलाका है। यहॉ सबसे ज्यादा वोट बंगाली समुदाय के है। दूसरी बडी़ तादाद मुस्लिम वोटरों की है। कांग्रेस ने विकास को चुनावी मुद्दा बनाया है। कांग्रेस की प्रदेश सरकार नजराने के तौर पर पट्टाधारियों को जमीन का मालिकाना हक देने का 30 मई को शासनादेश जारी कर चुकी है। सरकार के इस फैसले से बंगाली समुदाय को सबसे ज्यादा फायदा होना है। जाहिर है चुनाव में कांग्रेस को भी इसका लाभ मिलेगा।

भाजपा ने पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत को चुनाव मैदान में उतारा है। पंत उत्‍तराखण्ड की अंतरिम सरकार में विधानसभा अध्यक्ष रह चुके है। वे पिछली भाजपा सरकार में नम्बर दो के कैबिनेट मंत्री थे। भाजपा की उत्‍तराखण्ड की सियासत में प्रकाश पंत का नाम प्रदेश के बडे़ नेताओं में शुमार है। वे प्रभावशाली कैबिनेट मंत्री रहते पिथौरागढ़ से कांग्रेस के मयूख महर से पिछला विधानसभा चुनाव हार गये थे। पंत आखिरी दिन बीस जून को अपना नामांकन करा पाये। उनके नामांकन के रोज पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूडी और रमेश पोखरियाल “निशंक“ का नहीं आना भी चर्चा का विषय रहा।

भाजपा ने इस चुनाव में किरन मंडल के विधायकी छोड़ कांग्रेस में जाने के मसले को मुख्य मुद्दा बनाया है। भाजपा के राष्ट्रीय और प्रान्तीय स्तर के कुछ नेता सितारगंज से उनकी पार्टी के विधायक को खरीदकर सीट खाली कराने के आरोपों की शिकायत को लेकर दो बार चुनाव आयोग से मिल चुके है। इस मामले में भाजपा के प्रदेश के सभी बडे़ नेता प्रदेश के गवर्नर से भेंट कर किरन मंडल के विधायकी छोड़ कांग्रेस में शामिल होने के मामले की सीबीआई जॉच और नार्को टेस्ट कराने की मॉग कर चुके है। भाजपा का आरोप है कि किरन मंडल ने विधायकी छोड़ने की एवज में दस करोड़ रुपये लिए है।

इसके जवाब में कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि देवभूमि उत्‍तराखण्ड के भीतर विरोधी पार्टी के विधायक को तोड़ने की परम्परा का सूत्रपात भाजपा ने ही किया है। 2007 में जब भुवन चन्द्र खडूडी़ उत्‍तराखण्ड के मुख्यमंत्री बने तब वे पौडी़ लोकसभा सीट से सांसद थे। उन्होंने धूमाकोट से तब के कांग्रेस के विधायक टीपीएस रावत से इस्तीफा दिला उनकी सीट से उपचुनाव लडा़ और जीते।

प्रयाग पाण्‍डे

इसकी एवज में भाजपा ने टीपीएस रावत को पौडी़ लोकसभा सीट से उपचुनाव लडा़या था। अब किरन मंडल से इस्तीफा दिला विजय बहुगुणा ने पुराना हिसाब चुकता कर लिया है। लिहाजा इस मुद्दे पर भाजपा को हो-हल्ला करने का नैतिक अधिकार नहीं है। कुल मिलाकर सितारगंज में वोटरों का रूझान और चुनावी समीकरण कांग्रेस और मुख्यमंत्री बहुगुणा के हक में है। यहॉ समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार नहीं होने और उक्रांद और बसपा के कांग्रेस के पक्ष में खडे़ होने से बहुगुणा की चुनावी राह बेहद आसान नजर आ रही है।

लेखक प्रयाग पाण्‍डे उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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