चंडीगढ़। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का कहना है कि वे भी पेड न्यूज के भुक्तभोगी रहे है। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान उन्हें पहली बार खबरनुमा विज्ञापनों के चलन का पता चला। ऐसे पेड न्यूज यानि खबरों का विज्ञापन पाठकों के साथ धोखा है। उन्होंने कहा कि टीवी चैनल भी टीआरपी के चक्कर में नाकारात्मक खबरों पर ज्यादा तवज्जो देते हैं जो आदर्श पत्रकारिता के लिए सही नहीं है।
न्यूज चैनलों को ऐसे समाचार नहीं चलाने चाहिए जो देश हित में न हो। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि मीडिया को स्वयं की जवाबदेही तय करनी चाहिए क्योंकि एक राजनैतिक व्यक्ति को भी पांच वर्षों बाद जनता को जवाब देना पड़ता है लेकिन मीडिया के लिए ऐसी कोई जवाबदेही तय नहीं है। इसलिए उन्हें स्वयं आत्मनिरीक्षण से यह जवाबदेही तय करनी चाहिए।
राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर चंडीगढ़ प्रेस क्लब द्वारा जर्नलिस्ट एसोसिएशन आफ इंडिया, नई दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में 'मीडिया- लोगों के प्रति जवाबदेही का एक साधन' विषय पर आयोजित गोष्ठी में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा बोल रहे थे। इस गोष्ठी में पेड न्यूज (खबरनुमा विज्ञापनों) के चलन को लेकर विस्तृत चर्चा की गई और इसे दूर करने के उपायों पर वरिष्ठ पत्रकारों ने अपने सुझाव रखे।
हुड्डा ने लोगों के प्रति मीडिया की जवाबदेही को आवश्यक बताते हुए कहा कि आज भी लोगों का विश्वास प्रिंट मीडिया पर कायम है और इस विश्वास को बनाये रखना होगा क्योंकि अगर लोगों का विश्वास टूट गया तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा होगा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के चारों स्तंभों में आज मीडिया को नियंत्रित करने पर चर्चा छिड़ी हुई है और उनका मानना है कि पत्रकारिता के उच्च मानदंडों को बनाये रखने के लिए कुछ न कुछ तो नियंत्रण होना चाहिए।
यह नियंत्रण सरकारी न होकर मीडिया के भीतर से ही आत्मनिरीक्षण हो सके तो बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि आजादी से पूर्व भारतीय पत्रकार अपनी देशभक्ति, निष्ठा, लगन, परिश्रम एवं त्याग के लिए प्रसिद्ध रहे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू तथा बाल गंगाधर तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये सभी नेता पत्रकारिता से जुड़े हुए थे और देश की आजादी में जनभावना को प्रेरित करने में मीडिया का योगदान अहम रहा।
उन्होंने स्मरण करवाया कि उनका जन्म आजादी से एक माह बाद 15 सितम्बर, 1947 को हुआ था और उन्हें याद है कि उनके पिता चौधरी रणबीर सिंह घर से ही हाथ से लिखा हुआ साइक्लोस्टाइल कर दो पन्नों का एक समाचार पत्र निकालते थे और बाद में बांटा करते थे। उस समय पत्रकारिता को मिशन के रूप में लिया जाता था लेकिन आज तकनीकी युग में समाचार पत्र ने एक व्यवसाय का रूप ले लिया है।
हुड्डा ने कहा कि समाचार पत्र समाज का आइना होता है और समाज बदल रहा है और इसके साथ आइने में भी बदलाव आ रहा है। साहित्यिक एवं पत्रकार श्री गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा कहे गये वक्तव्य दोहराते हुए उन्होंने कहा कि 'जब किसी के विरुद्घ लिखो तो ऐसे लिखो जैसे वह व्यक्ति तुम्हारे सामने बैठा हो और तुमसे कभी भी जवाब तलब कर सकता हो।'
गोष्ठी के प्रमुख वक्ता के रूप में अपने विचार रखते हुए हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक रमेश विनायक ने प्रेस दिवस को पत्रकारिता की आजादी का दिन बताया और देश में आजादी से पूर्व और बाद के दशकों में मीडिया के विकास के तीन चरणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आजादी से पूर्व मीडिया राष्ट्रवादी भावनाओं का प्रेरित करने का माध्यम बना। आजादी के बाद 50 से 80 के दशक तक पत्रकारिता स्वतंत्र एवं प्रभावी माध्यम के रूप में उभरी।
उस दौरान पत्रकार को कम वेतन मिलता था लेकिन उसे अधिक स मान दिया जाता था। पत्रकारिता का तीसरा दौर 90 के बाद आया। जब देश की अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुआ। आज मीडिया में प्रतिस्पर्धा का माहौल है। देश में इस समय भारतीय भाषाओं में 5 हजार दैनिक समाचार पत्र, 6 हजार पाक्षिक तथा 16 हजार साप्ताहिक समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे है। इसके अलावा, समाचार एवं मनोरंजन के 200 चैनल भी उपकरणों के माध्यम से प्रसारित हो रहे है।
पत्रकारिता में मीडिया हाउस और राजनेताओं के संबंधों पर उन्होंने अरुण शौरी के एक वक्तव्य का हवाला देते हुए कहा कि 'एक कुत्ता के मुंह में अगर हड्डी हो तो वह कभी भौंकता नहीं और भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों के पास मीडिया पर फेंकने के लिए पर्याप्त हड्डियां है।' जर्नलिस्ट एसोसिएशन आफ इंडिया के अध्यक्ष श्री एनके सेठी ने पत्रकार एवं पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा किये जा रहे कार्यों की सराहना की और आभार जताया।
उन्होंने एसोसिएशन की भावी गतिविधियों पर भी प्रकाश डाला। गोष्ठी में वक्ताओं का धन्यवाद करते हुए चंडीगढ़ प्रेस क्लब के अध्यक्ष नवीन एस ग्रेवाल ने कहा कि पत्रकार को एक एसएचओ की भूमिका निभानी चाहिए क्योंकि किसी भी मामले में एसएचओ द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी को ही सर्वोच्च न्यायालय तक आधार माना जाता है। इसलिए तथ्यों पर आधारित समाचार लिखने चाहिए। उन्होंने कहा कि आज मीडिया हाउस सोशल रिस्पॉसबिलिटी मॉडल से बिजनेस मॉडल की ओर जा रहे है और ऐसे मीडिया हाउस को सबक सिखाने के लिए पत्रकारों को ही अहम भूमिका निभानी होगी।
पत्रकारों द्वारा इंग्लैंड में चलाए जा रहे समाचार पत्र 'इंडिपेंडेंट' का उल्लेख करते हुए ग्रेवाल ने कहा कि इंग्लैंड में यह समाचार पत्र काफी सम्मानित है तथा विश्वसनीय माना जाता है। इसलिए हमें भी ऐसा करने की संभावनाओं पर विचार करना चाहिए ताकि मीडिया घरानों पर कुछ दबाव बनाया जा सके।
आज समाज के वरिष्ठ पत्रकार बलवंत तक्षक ने मीडिया घरानों में विज्ञापन को लेकर लगी होड़ पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज समाचार पत्र विशेषकर हिन्दी समाचार पत्रों में आम आदमी पीछे छूटता जा रहा है और समाचार पत्रों की जवाबदेही विज्ञापनदाताओं के प्रति अधिक हो गई है। उन्होंने कहा कि यह विज्ञापन की ही ताकत है, जिसके कारण एक सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष दल को अखबार से बाहर कर दिया था। पहले समाचार पत्रों में कहा जाता था कि समाचार के लिए कहीं तक भी जाना पड़े जाओ लेकिन आज कहा जाता है कि विज्ञापन के लिए कहीं तक भी जाना पड़े जाओ।
संगोष्ठी को वयोवृद्ध पत्रकार बीके चम ने भी संबोधित किया और अपने 60 वर्षों के पत्रकारिता के अनुभवों को साझा किया। चंडीगढ़ प्रेस क्लब की ओर से मुख्यमंत्री को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। गोष्ठी में पत्रकारों ने मुख्यमंत्री से सीधे संवाद भी किया और मुख्यमंत्री श्री हुड्डा ने सभी सवालों का जवाब दिया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव डॉ. केके खण्डेलवाल, शिव रमन गौड़, अतिरिक्त मीडिया सलाहकार केवल ढिंगरा के अलावा बड़ी संख्या में चंडीगढ़ के पत्रकार उपस्थित थे।
चंडीगढ़ से जयश्री राठौड़ की रिपोर्ट





