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सुख-दुख...

अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट भारत के गरीबों के सुख से दुखी!

: ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के खिलाफ गिरोह बना रहे हैं धन्नासेठ :  नामी अमरीकी अखबार, वाशिंगटन पोस्ट में आज एक दिलचस्प खबर छपी है. लिखा है कि भारत सरकार के ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के कारण औद्योगिक सेक्टर को अब ज़रूरी मजदूर नहीं मिल रहे हैं. पंजाब और महाराष्ट्र में दूर गाँव से आकर मजदूरी करने वाले लोग नहीं पंहुच रहे हैं इसलिये औद्योगिक इस्तेमाल के लिए गन्ना भी मिलों तक नहीं पंहुच रहा है. बताया गया है कि अखबार के रिपोर्टरों ने देहातों में घूम घूम कर रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) में काम करने वाले जिन मजदूरों से बात की, उन्होंने बताया कि यह काम उन्हें दो जून की रोटी तो देता ही है, सम्मान के साथ अपनी ही ज़मीन पर रह कर जीने का अवसर भी देता है.

: ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के खिलाफ गिरोह बना रहे हैं धन्नासेठ :  नामी अमरीकी अखबार, वाशिंगटन पोस्ट में आज एक दिलचस्प खबर छपी है. लिखा है कि भारत सरकार के ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के कारण औद्योगिक सेक्टर को अब ज़रूरी मजदूर नहीं मिल रहे हैं. पंजाब और महाराष्ट्र में दूर गाँव से आकर मजदूरी करने वाले लोग नहीं पंहुच रहे हैं इसलिये औद्योगिक इस्तेमाल के लिए गन्ना भी मिलों तक नहीं पंहुच रहा है. बताया गया है कि अखबार के रिपोर्टरों ने देहातों में घूम घूम कर रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) में काम करने वाले जिन मजदूरों से बात की, उन्होंने बताया कि यह काम उन्हें दो जून की रोटी तो देता ही है, सम्मान के साथ अपनी ही ज़मीन पर रह कर जीने का अवसर भी देता है.

अब ग्रामीण मजदूर भूखा नहीं सोता और बड़े किसानों के खेतों में कम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर नहीं है. ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के अंतर्गत १०० दिन का काम पाने वाले मजदूरों के परिवार अति दरिद्रता के जीवन से मुक्ति पा चुके हैं और अब उन्हें मिल मालिक या बड़े किसान के सामने काम के लिए गिडगिडाना नहीं पड़ता. वाशिंगटन पोस्ट को इस बात से खासी परेशानी है कि इण्डिया में अब सस्ते मजदूर मिलने कम हो गए हैं.

यहाँ यह ध्यान में रखने की बात है कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत भारतीय ग्रामीण गरीब को दिनभर की मजदूरी के मद में केवल दो अमरीकी डालर मिलते हैं. साथ में कुछ अनाज भी मिल जाता है. वह भी पूरे साल नहीं, साल में केवल सौ दिन. यानी प्रतिदिन के केवल २७ रूपये और ४० पैसे पड़े. अब मानवीय गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सबसे बड़े समर्थक कहलाने के दावेदार अमरीका के एक बहुत बड़े अखबार को इस बात से भी परेशानी है कि भारत में अति गरीबी की ज़िंदगी बसर करने के लिए अभिशप्त एक आदमी २७ रूपये रोज़ क्यों कमा रहा है. अखबार का पूरा टोन यह है कि भारत सरकार ने ग्रामीण रोज़गार गारंटी जैसी योजना शुरू करके भारत के औद्योगिक उत्पादन के लिए मजदूरों की किल्लत पैदा कर दी है. उसे ऐसा नहीं करना चाहिए.

पूंजीवादी आर्थिक सोच के सरगना देश, अमरीका की इस सोच पर दुखी होने की ज़रूरत नहीं है. पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था का ट्रेड मार्क है कि उसमें गरीब इंसान का शोषण होता है. भारत में अमरीकी माडल के सपने देख रहे उद्योगपतियों को इस बात से बहुत परेशानी है कि इस योजना की वजह से मजदूरों को काम में कोई रूचि नहीं रह गयी है. भारतीय उद्योगपतियों के संगठन फिक्की में कृषि सेक्शन के मुखिया भास्कर रेड्डी कहते हैं कि यह योजना सबसे गरीब आदमी को कुछ राहत देने के लिए शुरू की गयी थी, लेकिन अब यह सबसे आसान रास्ता बन गयी है क्योंकि थोड़ी बहुत मिट्टी इधर उधर कर देने से लोगों को आसानी से पैसा मिल जाता है और वे अब कोई भी गंभीर काम नहीं करते.  इस योजना का विरोध करने के लिए कुछ अर्थशास्त्रियों को भी आगे कर दिया गया है .वे कहते हैं कि करीब १०० अरब रूपयों के खर्च वाली यह योजना भारत सरकार की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ है. सरकार को इस योजना को फ़ौरन बंद कर देना चाहिए.  

अमरीका के सबसे प्रभावशाली अखबारों में से एक वाशिंगटन पोस्ट ने भारत के गरीबों के पक्षधर सबसे बड़े प्रोग्राम की निन्दा करने की जो योजना बनायी है वह हवा में नहीं है. लगता है कि भारत की पूंजीपति और औद्योगिक लाबी अब पूरी तरह से जुट गयी है कि इस योजना को गरीबों लायक न रहने दिया जाय. बहुत बड़े पैमाने पर कोशिश हो रही है कि ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के अंतर्गत फैक्टरी और बड़े फार्मों के काम को भी ले लिया जाय. संसद में पिछले सत्र में कुछ सांसदों ने यह आवाज़ उठायी थी कि जब खेती में काम का समय हो तो नरेगा की योजना को बंद रखा जाए. यानी मजदूर को बड़े किसानों के यहाँ कम मजदूरी पर काम करने के लिए मज़बूर किया जा सके और इस काम में उनको सरकार की मदद मिले. यह अजीब बात है कि पूंजीपति लाबी गरीब आदमी का शोषण न कर पाने पर पछता रही है. फिक्की ने एक सर्वे करवाया है जिससे पता चलता है कि बहुत सारे कारखाने ऐसे हैं जो अपना टार्गेट नहीं पूरा कर पा रहे हैं. बिल्डरों ने भी शिकायत की है कि उनके प्रोजेक्टों की कीमतें बढ़ रही हैं क्योंकि अब औने पौने दाम पर मजदूर नहीं मिल रहे हैं.

उद्योगपतियों को सरकार से शिकायत है कि वह इस तरह की योजना चलाकर उद्योगों का सर्वनाश कर रही है. पूंजीपति खेमे के पूरी गंभीरता से जुट जाने के खतरे बहुत हैं. जानकार बताते हैं कि इस बात की पूरी आशंका है कि आने वाले दिनों में यह वर्ग नरेगा में ऐसे प्रावधान डलवा देगा जिससे यह मजदूरों की संकटमोचक योजना न रहकर औद्योगिक लाबी के हाथ का खिलौना बन जायेगी. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को भी यही डर है. उन्होंने चिंता जताई है कि उद्योगों में मजदूरों की कमी की बात का कोई मतलब नहीं है. ग्रामीण रोजगार योजना में कोई भी मजदूर को बाँधकर काम नहीं करवाता. वे जहां चाहें, काम करने के लिए स्वतंत्र हैं. लेकिन दुर्भाग्य है कि बड़े उद्योगपति और बड़े किसान उन्हें सम्मानजनक मजदूरी नहीं देते जिसके कारण वे नरेगा की योजनाओं से जीवन यापन करना बेहतर समझते हैं.

नरेगा के खिलाफ अमरीकी औद्योगिक कंपनियों ने भी अभियान शुरू कर दिया है. तमिलनाडु में टी शर्ट के उत्पादन के काम में लगी हुई अमरीका की कई कंपनियों ने प्रस्ताव दिया है कि अगर जिन जिलों में उनका काम चल रहा है, वहां से सरकारी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को हटा दिया जाय तो वे लोग खुद ही अपनी रोज़गार गारंटी योजना लागू कर देंगे. केंद्र सरकार के आला अफसरों का कहना है कि यह बात बहुत ही शर्मनाक है कि खुले कम्पटीशन की वकालत करने वाले अमरीका के बड़े उद्योग, लोगों की मजबूरी से फायदा उठाने के लिए सरकार की मदद चाहते हैं. अमरीकी कंपनियों की इस सलाह पर ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना वाले अफसरों का कहना है कि उन्हें अपनी कोई योजना चलाने के लिए सरकारी मदद क्यों चाहिए. जब वे दुनिया भर में सबसे ज्यादा फायदा कमाते हैं तो उन्हें सरकार की २७ रूपये रोज़ वाली स्कीम को बंद करवाने की क्या ज़रुरत है. उन्हें तो चाहिए कि नरेगा के मुक़ाबिल अपनी योजना चलायें और अधिक से अधिक मजदूरों को नरेगा से ज्यादा मजदूरी दें. मजदूर अपने आप नरेगा को भूल जाएगा.

खुली अर्थव्यवस्था के पक्षधर अमरीका और उनके समर्थक अर्थशास्त्रियों को इसलिए परेशानी हो रही है कि देश के गरीब मजदूरों से वे अपनी शर्तों पर काम नहीं करवा पा रहे हैं. जब भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था की राजनीतिक सोच सरकारी कामकाज की नियंता होती थी तो उदारीकरण की अर्थव्यवस्था के वकील कहा करते थे कि सरकारी कंट्रोल से बाहर हो जाने के बाद पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के राजनीतिक अर्थशास्त्र के चल जाने के बाद खुला कम्पटीशन होगा लेकिन एक साधारण सी सरकारी योजना के चल जाने के बाद इन लोगों को सारा कम्पटीशन भूल गया. अब सरकारी अर्थशास्त्री, उद्योगपति, बड़े किसानों के संगठन सब उसी नरेगा को ख़त्म करने पर आमादा हैं. देखना यह है कि जयराम रमेश जैसे अर्थशास्त्री इस योजना को चला पाते हैं या बड़ी पूंजी के चाकर अर्थशास्त्री अपनी मनमानी करवाने में सफल होते हैं.

इस बात को समझने के लिए सरकारी सब्सिडी के निजाम को भी समझना पड़ेगा. कई औद्योगिक क्षेत्रों में भारी सरकारी सब्सिडी का इंतज़ाम होता है. लेकिन देखा यह गया है कि उद्योगपति सब्सिडी को अपनी आमदनी का हिस्सा मानते हैं. ज़्यादातर  मामलों में सब्सिडी का लाभ उपभोक्ता तक नहीं पंहुचता है. नरेगा से हो रही बड़े उद्योगपतियों की असुविधा को सब्सिडी के बरक्स देखना चाहिए. खाद की कीमतें आज आसमान छू रही हैं. उससे किसानों को बहुत नुकसान हो रहा है रासायनिक खाद के  कमरतोड़ दाम की वजह से किसान अपनी खेती को ठीक से नहीं कर पा रहे हैं. तुर्रा यह कि खाद बनाने वाली कंपनियों को बहुत बड़े पैमाने पर सरकारी सब्सिडी दी जाती है. लेकिन सब्सिडी को कम्पनियां किसान तक नहीं पहुंचाती. उसे वे अपने पास ही रख लेती हैं. आम आदमी दोनों तरफ से मारा जाता है. टैक्स देने वाली जनता के पैसे से ही सब्सिडी दी जाती है और जब वही जनता किसान के रूप में खाद खरीदती है तो उसे उनका हक नहीं मिलता.

अक्सर खबर आती रहती है कि सरकार निजी कंपनियों क बेल आउट पैकेज देती है. यानी  टैक्स देने वालों का पैसा निजी कंपनियों को दिवाला पिटने से बचाने के लिए दिया जाता है. यह दिवाला इसलिए निकल रहा होता है कि कंपनी कुप्रबंध की शिकार होती है. इस बात को किंगफिशर एयरलाइन के ताज़ा मामले से समझा जा सकता है. किंगफिशर पर करीब सात हज़ार करोड़ का घाटा है . कंपनी के मालिक कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें सरकारी मदद मिल जाए और वे कंपनी को फिर से चला सकें  .उद्योगजगत में सबको मालूम है कि किंगफिशर के मालिक बहुत ही राजसी शैली में जीवन जीते हैं . कंपनी के घाटे में एक बड़ा हिस्सा उनके बेमतलब के खर्चों का भी है. उन्होंने बैंकों से भी बहुत ज्यादा रक़म बतौर क़र्ज़ ले रखी है.

उनके बारे में कहा जाता है कि वह बहुत ही ज्यादा पैसे लेने वाली माडलों के साथ समुद्र में पानी के जहाज़ में महीनों घूमते रहते हैं और फोटो खिंचाते हैं जिसके बाद में कैलेण्डर बनता है. ज़ाहिर है यह खर्च भी कंपनी के खाते से होता है और अब उस खर्च को पूरा करने  के लिए सरकार से मदद मांग रहे हैं. हो सकता है कि उनको मदद मिल भी जाए. इसी तरह से बहुत सारे और भी मामले हैं जहां सरकार की सब्सिडी पर ऐश करने वाले उद्योगपति मिल जायेंगे. डीज़ल पर आज बहुत भारी सब्सिडी है और डीज़ल का इस्तेमाल सबसे ज्यादा बड़े उद्योगों में ही होता है. हालांकि एक बहुत मामूली प्रतिशत में डीज़ल की खपत करने वाला किसान डीज़ल की कीमतों के कारण सबसे ज्यादा प्रभावित होता है.

इसलिए ज़रूरी यह है कि बड़े उद्योगपति, पूंजीपति और उनको समर्थन देने वाले देश और अखबार इन उद्योगपतियों को यह सलाह दें कि उद्योग चलाने के नाम पर बेमतलब खर्च करने से बाज़ आयें और उन मजदूरों को जिंदा रहने भर के लिए मजदूरी दें. नरेगा को हटाकर गरीब आदमी को मजबूर करके काम करवाने की मानसिकता से बचना आज के उद्योग जगत की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं. एनडीटीवी समेत कई चैनलों अखबारों में काम कर चुके शेष नारायण इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के दिल्ली ब्यूरो चीफ हैं.

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